मदन लाल और प्रदीप मैगज़ीन की यादें

विश्व कप 2010 दक्षिण अफ़्रीका में हो रहा है. विश्व कप फ़ुटबॉल का इतिहास बहुत पुराना है. हमने इस साल के विश्व कप के मद्देनज़र कुछ चर्चित चेहरों से विश्व कप से जुड़ी उनकी यादों को टटोलने की कोशिश है. इसी कड़ी में पूर्व क्रिकेटर मदन लाल और वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप मैगज़ीन अपनी यादें हमसे बाँट रहे हैं.

मदन लाल (पूर्व क्रिकेटर)

फ़ु़टबॉल से मेरी काफ़ी दिलचस्पी है और मुझे विश्वकप फ़ुटबॉल के अनेक मुक़ाबले देखने के अवसर भी मिले हैं. इंग्लैंड में क्रिकेट मैच खेलने के दौरान फ़ुटबॉल के कई बड़े अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों से मिला हूं. इंग्लैंड के कई खिलाड़ियों के साथ फ़ुटबॉल खेला भी है.

जहां तक फ़ुटबॉल से जुड़े किसी यादगार लम्हे की बात की जाए तो वर्ष 1986 के विश्वकप का वो पल आज भी याद है जब अर्जेंटीना के डिएगो माराडोना ने इंग्लैंड के ख़िलाफ़ हैंड ऑफ़ गॉड गोल के ज़रिए जीत दर्ज की थी. जर्मनी ने जब विश्वकप जीता था उस दौरान बेकमबार का शानदार प्रदर्शन याद है. ब्राज़ील ने जब विश्वकप जीता था उसकी भी यादें मेरे ज़ेहन में आज भी मौजूद हैं. ये यादें विश्वकप फ़ुटबॉल के शुरुआत के साथ एक बार फिर ताज़ा हो जाती हैं.

यूं तो अधिकतर फ़ुटबॉल प्रेमी ब्राज़ील के समर्थक होते हैं या इस टीम से उनकी उम्मीदें जुड़ी होती हैं, लेकिन मेरा मानना है कि प्रत्येक विश्व कप में अर्जेंटीना और जर्मनी एक मज़बूत टीम के तौर पर सामने आती हैं. स्पेन भी एक बेहतरीन टीम है. इन्हीं टीमों में से किसी के विजेता बनने की उम्मीद है.

विश्वकप फ़ुटबॉल ओलंपिक के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा खेल आयोजन है ऐसे में इसका जुनून देखने लायक़ होता है. फ़ुटबॉल पूरी दुनिया में खेला जाती है और सारी दुनिया इसे देखने के लिए चार साल तक इंतेज़ार करती है ऐसे में इसके देखने का मज़ा भी अधिक होता है.

जहां तक भारत में इस खेल के प्रति जुनून की बात है तो टेलीविज़न ने इसके प्रति झुकाव पैदा किया है और यहां भी इसका दायरा बढ़ रहा है, लेकिन आज भी जिस तेज़ी के साथ इसे बढ़ना चाहिए वो नहीं हो सका है.

प्रदीप मैगज़ीन (वरिष्ठ खेल पत्रकार)

मैं जिस तरह क्रिकेट का बहुत ही बड़ा प्रशंसक हूं उसी तरह फ़ुटबॉल का दीवाना नहीं हूं. लेकिन एक पत्रकार होने के नाते फिर भी फ़ुटबॉल का प्रेमी ज़रूर हूं.

फ़ुटबॉल मैचों से जुड़ी मेरी यादों का सिलसिला कोई 30 साल पहले शुरू होता है जब इटली के खिलाड़ी पावलो रोसी पर प्रतिबंध लगा. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि उनपर प्रतिबंध लगने के कुछ महीनों बाद जब वर्ष 1982 में विश्वकप की शुरुआत हुई तो पाओलो रोस्सी ने शानदार खेल का प्रदर्शन किया और इटली को विश्व विजेता बनाया. इसके बाद माराडोना का हैंड ऑफ़ गोड गोल तो सबको याद है.

अधिकतर भारतीयों की तरह मैं भी ब्राज़ील का समर्थक हूं. रोनाल्डो या रोनाल्डिन्हो का खेल सबको पसंद है और मुझे भी उनका खेल देखना अच्छा लगता है. ब्राज़ील टीम जिस तरह से खेलती है उससे तो ऐसा लगता है कि इस बार भी वो कड़ा टक्कर देगी.

जिन खिलाड़ियों का खेल देखना मज़ेदार होता है उनमें दिएगो माराडोना और पेले सबसे अहम हैं. जब उन्हें टेलीविज़न पर खेलते देखते हैं तो पुराने दौर के खेल की यादें उभर जाती हैं.

आजकल अर्जेंटीना के लियोनेल मेसी स्टार स्ट्राइकर हैं और उनपर दुनियाभर की नज़रें हैं और लोगों को उम्मीद है कि वो माराडोना की याद को ताज़ा करेंगे. लेकिन फिर भी कहना पड़ेगा माराडोना तेरा जवाब नहीं.

मेरे पसंदीदा खिलाड़ी लियोनेल मेसी हैं और अर्जेंटीना की टीम भी अच्छा खेल रही है, लेकिन ब्राज़ील की टीम भी अच्छा खेलती है. इसलिए पसंदीदा टीम के बारे में चुनाव करना मुश्किल है.

भारत में फ़ुटबॉल बहुत ही लोकप्रिय है और गांव के स्तर पर भी खेला जाती है. यह बात भी सही है कि भारत का मध्यवर्ग फ़ुटबॉल खेलता नहीं है लेकिन टेलीविज़न पर खूब मज़े के साथ देखता है.

लेकिन जब भी विश्वकप शुरू होता है तो भारतीयों को मायूसी हाथ लगती है, क्योंकि हमारी टीम विश्वकप का हिस्सा नहीं होती है.

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