वीके मल्होत्रा और राजपाल सिंह की यादें

विश्व कप 2010 दक्षिण अफ़्रीका में हो रहा है. विश्व कप फ़ुटबॉल का इतिहास बहुत पुराना है. हमने इस साल के विश्व कप के मद्देनज़र कुछ चर्चित चेहरों से विश्व कप से जुड़ी उनकी यादों को टटोलने की कोशिश है.

इसी कड़ी में भारतीय हॉकी टीम के कप्तान राजपाल सिंह और सांसद और तीरअंदाज़ी संघ के अध्यक्ष वीके मल्होत्रा अपनी यादें हमसे बाँट रहे हैं.

राजपाल सिंह (भारतीय हॉकी टीम के कप्तान)

Image caption राजपाल सिंह भारतीय हॉकी टीम के कप्तान हैं

मेरा लगाव प्रत्येक खेल के प्रति है और ये जुड़ाव न सिर्फ़ देखने तक सीमित है बल्कि मैं उसे खेलने में यक़ीन रखता हूं. जहां तक फ़ुटबॉल का सवाल है तो यह खेल भारत में हर जगह और अधिकतर स्कूलों, कॉलेजों और गली-कूचों में खेला जाता है.

मैं भी स्कूल के ज़माने में स्पोर्ट्स पीरियड में हॉकी के साथ-साथ फ़ुटबॉल भी खेलता था. जहां तक विश्वकप फ़ुटबॉल की बात है तो मैंने वर्ष 1994 से विश्वकप के मैचों का बाक़ायदा देखना शुरू किया. इस साल ब्राज़ील ने विश्वकप पर चौथी बार अपना क़ब्ज़ा जमाया था.

विश्वकप फ़ुटबॉल का रोमांच सारी दुनिया में होता है और मुझे भी ये आयोजन काफ़ी रोमांचित करता है. वैसे भी विश्वकप फ़ुटबॉल, आलंपिक के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खेल आयोजन है.

वैसे सभी टीमें अच्छी हैं लेकिन मेरी पसंदीदा टीम ब्राज़ील है, क्योंकि उनका खेल लाजवाब होता है. लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि मैं ब्राज़ील टीम का प्रशसंक होने के नाते फ़ुटबॉल का प्रमी हूं बल्कि असल बात यह है कि मैं खेल का प्रेमी हूं, टीम की बात दूसरे नंबर पर आती है.

जिन खिलड़ियों ने अधिक प्रभावित किया उनमें माराडोना का नाम सबसे पहले है. हालांकि उनके खेल को मैं बहुत अधिक नहीं जानता लेकिन जो फ़ुटेज़ देखी हैं वो मुझे काफ़ी रोमांचित करता है.

मेरा मानना है कि भारत के लोग प्रत्येक खेल से उतना ही प्रेम करते हैं जितना दुनिया के अन्य देशों के लोग करते हैं और यही वजह है कि भारत में लोगों का फ़ुटबॉल के प्रति ख़ासा लगाव है.

वीके मल्होत्रा (राजनेता और भारतीय तीरअंदाज़ी संघ के अध्यक्ष)

Image caption वीके मल्होत्रा कहतें हैं कि वो फ़ुटबॉल के दीवाने हैं.

दुनिया के 98 फ़ीसदी देशों में फ़ुटबॉल खेला जाता है जबकि तीरअंदाज़ी केवल 20-25 देशों में खेली जाती हैं. क्रिकेट तो केवल 10-15 देशों में खेली जाती है. सच बात यह है कि केवल फ़ुटबॉल ही ऐसा खेल है जो सारी दुनिया में खेला जाता है.

वैसे तो फ़ुटबॉल के प्रति लोगों में दीवानगी रहती ही है, लेकिन विश्वकप का इंतज़ार तो हर कोई करता है. विश्वकप फ़ुटबॉल को ओलंपिक से भी अधिक देखा जाता है. मुझे विश्वकप फ़ुटबॉल का इंतज़ार है और उस दौरान मैं बाक़ी काम छोड़कर मैच ही देखूंगा.

मैं फ़ुटबॉल के मैच देखने पर विशेष ध्यान देता हूं. जब मैं संसद के लोक लेखा समिति (पीएसी) का चैयरमैन था तो मैंने इस बात का ध्यान रखा कि बैकठें उस दिन न हो जिस दिन मैच हों.

फ़ुटबॉल के प्रति मेरी दीवानगी का आलम यह है कि कई बार रात-रात भर जागकर मैंने मैच देखे हैं.

अब तक के रिकॉर्ड को देखने से पता चलता है कि यूरोपीय और दक्षिण अमरीकी देश विश्वकप विजेता होते हैं, बीच में एक बार कोरिया ज़रूर आगे आ गया था और एशिया का नाम ऊंचा किया था. एशिया में जापान और कोरिया अच्छी फ़ुटबॉल खेलते हैं लेकिन अफ़सोस की बात है कि भारत में स्थिति अब भी अच्छी नहीं है.

ब्राज़ील, दक्षिण अफ़्रीक़ा, इटली, इंग्लैंड और जर्मनी की टीमें अच्छा खेलती हैं और किसी की जीत के बारे में कुछ भी कहना असंभव है.

भारत में फ़ुटबॉल को बढ़ावा देने की ज़रूरत है. इस खेल को आगे बढ़ाने के लिए स्कूल स्तर से लेकर कॉलेज स्तर पर विशेष ध्यान देना होगा. क्लब प्रणाली पर ध्यान देने की ज़रूरत है.