क्यों है दुनिया दीवानी फ़ुटबॉल की

Image caption दुनिया भर में फ़ुटबॉल क्रिकेट के मुक़ाबले कहीं अधिक लोकप्रिय है

केवल गोल करने के उद्देश्य से ग्यारह ग्यारह खिलाड़ियों की दो टीमों का एक गेंद के पीछे भागना जिस तरह पूरी दुनिया को मंत्रमुग्ध करता है शायद दूसरा कोई खेल नहीं करता.

आंकड़े बताते हैं कि टेलिविज़न पर विश्वकप देखने वालों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है. भारत जैसे देश में जहां क्रिकेट की दीवानगी जग जानी है वहां भी हर चार साल बाद फ़ुटबॉल का बुख़ार चढ़ता है.

ये वो समय है जब क्रिकेट पृष्ठभूमि में चला जाता है और सब तरह के लोग टेलिविज़न सैटों से चिपक जाते हैं.

खिलाड़ियों की तरल, आक्रामक और तीव्र चाल से खेल के मैदान पर जो चमत्कारी नमूने बनते हैं हम उसे मंत्रमुग्ध हो देखते रहते हैं.

लेकिन अगर आप मैच के बीच में दूसरे चैनल देखने के लिए रिमोट कंट्रोल के बटन दबाएं तो आपको जाने पहचाने चेहरे एक जाना पहचाना खेल खेलते दिखाई दे जाएंगे. इस खेल में एक टीम रन बनाने की कोशिश में लगी रहती है और दूसरी उसे रोकने में.

फ़ुटबॉल की तुलना में ये अधिक जटिल है क्योंकि इसे खेलना और इस खेल के क़ायदे क़ानून समझना आसान नहीं हैं. बशर्ते कि दर्शक ने औपचारिक रूप से इसका प्रशिक्षण न लिया हो.

इसलिए ये समझना मुश्किल नहीं है कि फ़ुटबॉल की लोकप्रियता क्यों बढ़ती जा रही है और क्रिकेट के चाहने वालों की संख्या क्यों सीमित है.

लियॉन मैसी का कौशल और नियंत्रण, उनकी फुर्तीली चाल, ग्राउंड की समझ और निष्काम खेल उन्हे गेंद का हिस्सा बना देते हैं और इसका लाभ मिलता है उनकी टीम को.

रॉबिनो के गेंद कौशल की प्रशंसा करना मुश्किल नहीं है लेकिन वो गेंद के साथ लम्बे समय तक चिपके रहते हैं जिससे टीम के अन्य सदस्यों को गोल करने का मौक़ा नहीं मिल पाता.

दूसरी तरफ़ आप तब तक क्रिकेट का आनंद नहीं उठा सकते जब तक आपको ये समझ में न आ जाए कि गेंद हवा में किस तरह रुख़ बदलती है, कितनी तरह की स्पीड से उसे फेंकी जा सकती है और कितनी तरह से बल्लेबाज़ उसे मार सकता है जिससे न केवल विकेट बचा सके बल्कि उसे विभिन्न दिशाओं में फेंक सके.

फ़ुटबॉल एक ऐसा खेल है जो आपको शुरु शुरु में अपने शारीरिक बल के कारण भयभीत कर सकता है लेकिन एक बार खेल शुरु हो जाए तो वही लहीम शहीम, दमदार खिलाड़ी गेंद को किक नहीं मारते.

यह 90 मिनट तक चलने वाला प्रणय निवेदन है जिसमें गेंद को उसके अंतिम लक्ष्य तक यानि गोल तक पहुंचाने के लिए कभी फुसलाया जाता है कभी प्यार से बस छुआ भर जाता है कभी विनती की जाती है तो कभी आग्रह किया जाता है.

इसीलिए शायद मेरेडोना को दुनिया पूजती हैं जबकि सचिन तेंदुलकर के प्रशंसक सीमित हैं.

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