कभी न भूलने वाला अनुभव

रस्टेनबर्ग स्टेडियम में मौजदू दर्शक

विश्व कप के कोई मैच हों, स्टेडियम में आम दर्शकों के साथ बैठकर मैच देखने का जो आनंद है, वो अपने आप में एक ख़ास अनुभूति होती है. तो मैंने सोचा, क्यों न किसी मैच में आम दर्शकों के बीच मैच का मज़ा लिया जाए.

जोहानेसबर्ग के क़रीब 150 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण अफ़्रीका का ख़ूबसूरत रस्टेनबर्ग शहर है. प्रकृति का वादियो में बसे इस शहर की छटा देखते ही बनती है. दोनों ओर पहाड़ी, जंगल और छोटे-छोटे ख़ूबसूरत घर- सब आपका मन मोह लेते हैं.

खूबसूरत शहर

मैं जब जोहानेसबर्ग से चला तो सोचा नहीं था कि रस्टेनबर्ग इतना ख़ूबसूरत शहर होगा. मैक्सिको और उरुग्वे के मैच की अहमियत इस हिसाब से ज़्यादा था कि इस मैच के नतीजे पर फ़्रांस और मेज़बान दक्षिण अफ़्रीका का भविष्य भी टिका हुआ था.

रास्ते में बड़ी संख्या में मैक्सिको और उरुग्वे समर्थक अपनी टीम के लिए नारे लगाते स्टेडियम की ओर जा रहे थे. लेकिन रास्ता अपेक्षाकृत शांत था और ट्रैफ़िक की भी कोई समस्या नहीं हुई.

लेकिन रस्टेनबर्ग शहर में पहुँचते ही सड़क पर थोड़ा-थोड़ा जाम लगने लगा. फिर भी घंटो जाम वाली स्थिति नहीं थी. दक्षिण अफ़्रीकी सरकार की सराहना करनी होगी, क्योंकि विश्व कप के लिए जैसी व्यवस्था उन्होंने की है, वो काफ़ी अच्छी है.

Image caption रस्टेनबर्ग स्टेडियम शहर से बाहर बना है.

हमें रुककर स्टेडियम का रास्ता पूछना पड़ा, क्योंकि स्टेडियम शहर से बाहर है और साइन बोर्ड्स की कमी शहर में ज़रूर खली. स्टेडियम के पास आते-आते सुरक्षा व्यवस्था और ट्रैफ़िक व्यवस्था काफ़ी व्यवस्थित नज़र आने लगा.

स्टेडियम से क़रीब आठ किलोमीटर पहले गाड़ी पार्क करने का स्थान नियत किया गया था और वहाँ से शटल बसें लोगों को स्टेडियम ला-जा रही थी. मैं भी एक शटल बस पर सवार होकर स्टेडियम पहुँचा.

समर्थकों का उत्साह

वहाँ बड़ी संख्या में लोग जमा थे. लेकिन व्यवस्था यहाँ भी चाक-चौबंद थी. सुरक्षा जाँच कड़ी थी और दो बार मुझे मेटल डिटेक्टर से होकर गुज़रने को कहा गया क्योंकि मेरे पास एक छोटी सी चाबी थी, मैं बार-बार पकड़ में आ रहा था.

ख़ैर जब हम स्टेडियम की परिधि में घुसे, तो पूछिए मत. चारों ओर संगीत का आलम, वुवुज़ेला का शोर और मैक्सिको-उरुग्वे समर्थकों का जश्न. जो दक्षिण अफ़्रीकी समर्थक अपने देश के मैच में नहीं जा पाए थे, वे भी बफ़ाना-बफ़ाना के नारों से माहौल को रंगीन बनाए हुए थे.

मैच शुरू होने में कुछ ही देर बची थी इसलिए मैं भागते-भागते अपने स्टैंड में पहुँचा. स्टेडियम तो बहुत बड़ा नहीं थी, लेकिन मैक्सिको, उरुग्वे और दक्षिण अफ़्रीकी समर्थकों ने स्टेडियम में जो रंग भरा था, पूछिए मत.

हर ओर गाना-बजाना, शोर-शराबा, वुवुज़ेला की ध्वनि और अपनी भाषा में नारेबाज़ी- यही स्टेडियम का आलम था. थोड़ी देर बाद टीमें मैदान में पहुँची और फिर उनका राष्ट्रगान बजने लगा. सोचा, काश किसी दिन भारत का भी राष्ट्रगान विश्व कप मैचों के दौरान बजता.

अपने-अपने देश के राष्ट्रगान पर मैक्सिको और उरुग्वे के समर्थकों ने सुर में सुर मिलाया. फिर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ मैच शुरू हुआ. प्रशंसकों की ज़ोर आज़माइश शुरू हुई, रेफ़री के फ़ैसलों पर नाराज़गी भी होती थी.

हार की निराशा

Image caption दक्षिण अफ़्रीकी सरकार ने विश्वकप को देखते हुए काफी अच्छी व्वस्था की है.

लेकिन जैसे ही उरुग्वे ने गोल किया, मैक्सिको समर्थक निराश हो गए. बीच-बीच में कोई बहादुर दक्षिण अफ़्रीकी फ़्रांस के ख़िलाफ़ मैच में गोल का पता करके आता और फिर दक्षिण अफ़्रीकी कैंप भी बफ़ाना-बफ़ाना के नारे लगाने लगता.

हमारे आस-पास कुछ ऐसे भी प्रशंसक मौजूद थे, जिनको बीयर पीने से फ़ुरसत नहीं थी. एक ख़त्म होती, तो दूसरी आ जाती. उनकी मैच पर कितनी नज़र थी, लेकिन इतना ज़रूर था कि किसी कोने से शोर मचने पर वे भी हो-हल्ला करने लगते.

स्टेडियम में मैक्सिको समर्थकों की संख्या ज़्यादा थी. इसलिए मैक्सिको ही हार पर उनकी निराशा समझ में आ रही थी. लेकिन सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात ये थी कि कई मैक्सिको समर्थकों को पता नहीं चल पा रहा था कि उनकी टीम क्वालीफ़ाई कर पाई है या नहीं.

दूसरी ओर बफ़ाना समर्थक भी समझ नहीं पा रहे थे कि उनकी टीम जीतकर भी दूसरे दौर में पहुँची या नहीं. ख़ैर कई लोगों को मैंने जानकारी दी कि कौन सी टीम दूसरे दौर में पहुँची है. जहाँ मैक्सिको समर्थक ख़ुश हुए जा रहे थे, वहीं दक्षिण अफ़्रीकी निराश थे.

लौटने का समय हुआ, तो शटल बस पर सवार होने के लिए भारी भीड़ स्टेडियम के बाहर जमा थी. काफ़ी देर के बाद हमारा नंबर आया. कार पार्किंग तक पहुँचने में भी समय लगा और जोहानेसबर्ग पहुँचते-पहुँचते तो देर रात हो गई.

लेकिन आम लोगों के साथ विश्व कप के मैच देखने का अनुभव कभी न भूलने वाला था.

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