अफ़्रीकी फ़ुटबॉल की दुर्दशा क्यों...

Image caption विश्व कप में अफ़्रीकी टीमों के ख़राब प्रदर्शन से समर्थक निराश हैं

मौजूदा विश्व कप का थीम म्यूज़िक दक्षिण अफ़्रीका में ख़ूब लोकप्रिय है. शकीरा के इस अलबम में गाने की लाइन कुछ यूँ है-दिस टाइम फ़ॉर अफ़्रीका यानी अब अफ़्रीकी टीम की बारी है.

लेकिन क्या हो गया....अफ़्रीकी टीमों की दुर्दशा का ये आलम कि दूसरे दौर में घाना को छोड़कर कोई भी टीम क्वालीफ़ाई नहीं कर पाई.

कैमरून हो, आइवरी कोस्ट हो, नाइजीरिया हो, अल्जीरिया हो या फिर मेज़बान दक्षिण अफ़्रीका की टीम- सबको पहले ही दौर में हार का सामना करना पड़ा. ये टीमें प्रतियोगिता से बाहर हो गईं.

कैमरून जिसकी टीम में सैमुएल एटो जैसा खिलाड़ी है, तो आइवरी कोस्ट जिसके कप्तान दिदिए द्रोगबा जैसे फ़ुटबॉल की दुनिया के महारथी खिलाड़ी हैं.

वैसे भी अपने महाद्वीप में खेल रही इन टीमों के पास ये भी तर्क नहीं है कि वे ये कह दें कि यहाँ का माहौल उन्हें रास नहीं आ रहा था.

रास नहीं आया माहौल

जिस तरह इन अफ़्रीकी टीमों का बोरिया बिस्तर बंद हुआ है, उससे तो यही लगता है कि कहीं न कहीं कुछ न कुछ गड़बड़ है.

दक्षिण अफ़्रीका में मैच देखने आए एक ब्राज़ीलियाई समर्थक कहते हैं, "अफ़्रीकी खिलाड़ियों को मिलकर खेलना चाहिए, ये व्यक्तिगत फ़ुटबॉल खेलते हैं. उन्हें एक टीम की तरह खेलना चाहिए. हर कोई सुपर स्टार बनना चाहता है. अब द्रोगबा को ही देख लीजिए....उनका क़द बहुत बड़ा है शायद टीम से भी बड़ा."

कुछ ऐसी ही बात कही भारतीय राजीव ने, जो यहाँ पिछले पाँच वर्षों से एक दूरसंचार कंपनी में काम करते हैं.

राजीव का कहना है, "दक्षिण अफ़्रीका में यह विश्व कप हो रहा है. इसमें कई अच्छी अफ़्रीकी टीम हिस्सा ले रही थी. कैमरून, आइवरी कोस्ट, नाइजीरिया और दक्षिण अफ़्रीका. घाना को छोड़कर किसी ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है. फ़ुटबॉल टीम गेम है. समस्या ये है कि स्टार प्लेयर होने के बावजूद अफ़्रीकी टीमों में टीम प्ले नहीं है, व्यक्तिगत खेल है. अगर आप द्रोगबा, एटो, एसियन की बात करें, तो ये यूरोपीय लीग में बहुत अच्छा खेलते हैं लेकिन अपने देश के साथ नहीं."

बात गंभीर है. बहुत लोग इस बात से सहमत भी होंगे. चाहे वो द्रोगबा हों या सैमुएल एटो- सब पर ये आरोप लगता है कि वे क्लब के लिए बहुत अच्छा खेलते हैं लेकिन बात जब देश की आती है तो पिछड़ जाते हैं.

चलिए इतिहास के पन्ने के पलटते हैं और थोड़ा पीछे चलते हैं.

आज से 20 साल पहले कैमरून के रोजर मिल्ला ने अफ़्रीकी फ़ुटबॉल की दिशा बदल दी थी. 1990 के विश्व कप में मिल्ला ने न सिर्फ़ अफ़्रीकी फ़ुटबॉल के प्रति लोगों का नज़रिया बदला बल्कि जश्न मनाने का नया तरीक़ा भी दुनिया को दिखाया.

उस समय ब्राज़ील के महान पेले ने भविष्यवाणी की थी कि 10 साल के अंदर कोई अफ़्रीकी टीम विश्व कप जीतेगी. लेकिन दस साल नहीं 20 साल बाद भी ऐसी स्थिति नहीं दिखती.

पिछड़ने की वजह

दक्षिण अफ़्रीकी में मौजूद ज़ाम्बिया के डिफ़ेन्डर टोनी का मानना है कि इसके कई कारण हैं.

वे कहते हैं कि जिस माहौल में अफ़्रीकी खिलाड़ी पनपते हैं, वो यूरोपीय देशों से बिल्कुल अलग है. अफ़्रीकी देशों में अच्छे फ़ुटबॉल ढाँचे की भी कमी है. जिससे खिलाड़ियों को पनपने में दिक़्कत होती है.

लेकिन उनका क्या जिन्होंने इस विश्व कप में अपनी टीम से इतनी उम्मीदें जोड़ रखी थी.

निराश दक्षिण अफ़्रीकी समर्थकों में से एक ग्रैम कहते हैं, "यूरोपीय फ़ुटबॉल में पासिंग बहुत देखने को मिलता है, जबकि दुर्भाग्य की बात ये है कि दक्षिण अफ़्रीकी गेंद को अपने पास ज़्यादा रखना चाहते हैं. वे मैच का स्टार बनना चाहते हैं और यही हमारी सबसे बड़ी समस्या है."

लेकिन जहाँ तक अच्छी शैली और स्टैमिना की बात है, तो अफ़्रीकी खिलाड़ी किसी भी खिलाड़ी से पीछे नहीं. उन्होंने समय-समय पर इसे साबित भी किया है. लेकिन समस्या सिर्फ़ ये है कि उन्हें अपनी कला ज़्यादा से ज़्यादा अपने देश के साथ साबित करनी होगी और ख़ासकर विश्व कप जैसी प्रतियोगिता में.

यूरोपीय लीग में खेलकर उन्हें ज़्यादा पैसे तो मिल सकते हैं, लेकिन जब देश द्रोगबा, एटो, एसियन या मिख़ेल जैसे खिलाड़ी अपने देश के नाम इस ख़िताब को नहीं करते, उनकी प्रतिभा पर सवाल उठते रहेंगे.

यूरोपीय फ़ुटबॉल के एक प्रशंसक गैरी कहते हैं, "आप द्रोगबा, मिख़ेल, एसियन को देखिए....ये लीग के बड़े खिलाड़ी हैं...लेकिन उन्हें अपनी टीम के साथ मिलकर खेलना होगा. आप स्पेनिश लीग को देखिए, बार्सिलोना और रियाल मैड्रिड की ओर से स्पेन के आधे खिलाड़ी खेलते हैं और इससे उन्हें आपसी समझ विकसित करने में आसानी होगी है."

कैमरून, आइवरी कोस्ट, नाइजीरिया जैसी टीमों के पिट जाने के बाद घाना के साथ अफ़्रीकी देशों की उम्मीदें जुड़ी हैं.....उम्मीद अफ़्रीकी देश के कप जीतने की....उम्मीद पर दुनिया क़ायम है....अफ़्रीकी भी इसी उम्मीद पर वुवुज़ेला का शोर न थमने दें कि शायद कोई चमत्कार हो जाए.

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