ब्राज़ील बिन सब सूना...

ब्राज़ील का एक फ़ैन

....तो इस बार भी सांबा नहीं होगा. ब्राज़ील की बहुचर्चित और दुनिया के कई देशों में लोकप्रिय टीम विश्व कप से बाहर हो गई. नीदरलैंड्स से मुक़ाबला तो होगा....ऐसा सबने सोचा था.

लेकिन ये किसी ने नहीं सोचा था कि एक गोल की बढ़त लेने के बाद टीम की ये दुर्दशा होगी. ख़ैर टीम हारी और बहुतों का दिल टूट गया. मेरे सामने एक ब्राज़ीलियाई समर्थक इतना रोया कि पूछिए मत.

मुश्किल होता है किसी टीम से इतनी उम्मीदें लगाना और फिर उन उम्मीदों का टूटना. और बात जब ऐसे देश की हो, जहाँ फ़ुटबॉल एक धर्म है, तो उनकी पीड़ा समझी जा सकती है.

अलविदा की शक्ल में हिलता उसका हाथ बहुत कुछ कह रहा था, एक देश नहीं, एक टीम नहीं....बहुतों की उम्मीदें ब्राज़ील के साथ जा रही थी. दरअसल ब्राज़ील उन देशों के लिए अपना है, जहाँ फ़ुटबॉल लोकप्रिय तो है लेकिन वहाँ की टीम विश्व कप में नहीं आती.

ब्राज़ील और भारत

और ये बात भारत से ज़्यादा कौन समझ सकता है. समय के साथ भारत में भी लोगों का स्वाद बदला है. सिमटती दुनिया के बीच लोग अब हर देश के खिलाड़ियों को पहचानने लगे हैं और उनकी रुचि भी बदली है.

Image caption ब्राज़ील की हार से दुखी फ़ैन

लेकिन वर्षों से भारत का एक बड़ा तबका विश्व कप में ब्राज़ील के साथ जागता है, सोता है, जश्न मनाता है और फिर रोता भी है. दरअसल तीसरी दुनिया के देश आसानी से ब्राज़ीलियाई खिलाड़ियों से अपने आप को जोड़ लेते हैं.

उन्हें लगता है कि ब्राज़ील के रूप में फ़ुटबॉल की दुनिया में उनका कोई प्रतिनिधि मौजूद है, जिसकी धाक है, जिसका दम है और जिसकी खेल की ख़ूबसूरती हर मुल्क के लोगों को मुग्ध कर देती है.

इसलिए जब भी ब्राज़ील के साथ बुरा होता है, टीम हारती है, बाहर होती है, तीसरी दुनिया के देशों के बड़ी संख्या के लोग दुखी हो जाते हैं. लेकिन अब भी उस ब्राज़ीलियाई समर्थक का चेहरा मेरी नज़रों से नहीं हट पा रहा.श

उदासी

विश्व कप की प्रतियोगिता होती ही ऐसी है, जिसमें हार बहुत पीड़ादायक होती है. मुझे वो क्षण याद आ गया जब वर्ष 2003 के विश्व कप क्रिकेट में भारतीय क्रिकेट टीम फ़ाइनल में हार गई थी.

Image caption बैनर पर लिखा है,"जुबुलानी का दोष है." जुबुलानी इस वर्ल्ड कप में इस्तेमाल हो रही गेंद का नाम है.

कुछ ऐसा ही नज़ारा भारत में था. लेकिन उस फ़ाइनल में जहाँ भारत की जीत शुरू से मुश्किल लग रही थी. वहीं फ़ुटबॉल में कभी भी पासा पलट सकता है. 90 मिनट का खेल जो है.

ब्राज़ील की टीम क्यों हारी....इस पर बहुत विश्लेषण आएगा...ग़लतियों पर सवाल होंगे...शायद कोच पर गाज भी गिरे...लेकिन इन सबसे अलग सच यही है कि ब्राज़ील के बिना विश्व कप सूना-सूना लगेगा.

दक्षिण अफ़्रीका के स्थानीय लोग भी ब्राज़ील के लिए उदास हैं. जोहानेसबर्ग के कई इलाक़ों में सांबा करते, मस्ती करते, अपना राष्ट्रगान गाते, ढोल-नगाड़े बजाते ब्राज़ीलियाई लोगों की कमी कइयों को खलेगी.

लंबे समय तक मेरे दिमाग़ पर फूट-फूट कर रोता ब्राज़ीलियाई समर्थक और कुछ दिन पहले मुझे अपने साथ खींच कर जश्न में शामिल करने वाले लोगों के लटके चेहरे की कल्पना मुझे भी थोड़ा उदास करेगी.

....लेकिन खेल बदस्तूर जारी रहेगा…. ‘शो मस्ट गो ऑन.’

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