इंडिया के लिए खेलता हूँ - लिएंडर

लिएंडर पेस
Image caption विंबलडन सेंटर कोर्ट पर अपना 12वाँ ग्रैंड स्लैम जीतने के बाद ख़ुशी जताते लिएंडर पेस

भारत के स्टार टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस ने विंबलडन 2010 का मिक्स्ड डबल्स मुक़ाबला जीतकर अपना 12वाँ ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीत लिया है. विंबलडन की इस जीत के तुरंत बाद लिएंडर पेस के साथ बीबीसी संवाददाता अपूर्व कृष्ण ने विशेष बातचीत की -

लिएंडर एक नहीं, एक दर्जन ग्रैंड स्लैम हो गए हैं आपके, आज की ये जीत कितनी बड़ी है?

ये ग्रैंड स्लैम में हमारा 23वाँ फ़ाइनल था, हमने एक दर्जन ग्रैंड स्लैम जीते ये ठीक है, लेकिन इतने साल में हमने 23 फ़ाइनल खेला, ये मेरे लिए ख़ुशी की बात है. ये सही है कि हमलोग यहाँ अपने लिए खेलते हैं, लेकिन यहाँ भी हम भारत के लिए खेलते हैं. और विंबलडन के सेंटर कोर्ट पर अपने लिए और इंडिया के लिए खेलते और जीतते हुए बहुत ख़ुशी होती है.

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पिछले साल कारा ब्लैक के साथ आप विंबलडन के फ़ाइनल तक पहुँचे थे और उपविजेता रहे, उसके पहले 2003 में आपने विंबलडन मिक्स्ड डबल्स जीता था, तो सात साल के बाद फिर से जीतना कैसा लगा?

पिछले साल फ़ाइनल में मैं इतना अच्छा नहीं खेल सका. और हमारे ख़िलाफ़ खेल रही जोड़ी ने भी शानदार खेल दिखाया तो उनको भी बधाई देनी चाहिए. ऐसे विंबलडन से मेरा नाता पुराना है, मैंने मिक्स्ड डबल्स में पहला ख़िताब 1999 में जीता था लीसा रेमंड के साथ...

ये दिलचस्प है क्योंकि 1999 में लीसा रेमंड आपके साथ खेल रही थीं, इस बार आपके ख़िलाफ़?

हाँ बड़ा अजीब लग रहा था, कि एक समय लीसा मेरे साथ थी, लेकिन इस बार वो नेट के दूसरी तरफ़ थी. लेकिन इस बार लीसा रेमंड के साथ वेस्ली मूडी थे जिनकी जोड़ी के साथ हम पहले भी खेल चुके हैं, तो हम भी उनके खेल जानते थे और वो भी, लेकिन फ़ाइनल में काफ़ी दिमाग़ से खेलना होता है, क्योंकि दिमाग़ से खेलने पर आपको टेंशन महसूस नहीं होता, अपनी ख़ूबी के साथ जीत सकते हैं, पिछले साल मैं फ़ाइनल में केवल ताक़त से शॉट लगा रहा था, लेकिन इस बार मैं दिमाग़ से खेला.

पहले के समय में जब विजय अमृतराज और रमेश कृष्णन जैसे खिलाड़ी जमा-जमाकर खेला करते थे, लोग लिएंडर को ऐसे खिलाड़ी के रूप में जानते थे जो काफ़ी ताक़त वाला, दौड़-भाग वाला खेल खेलता है, तो उस लिएंडर और आज के लिएंडर के खेल में क्या कुछ अंतर आया है?

जब भी हमलोग खेलते हैं कोर्ट पर तो हमारे सारे प्रशंसक सोचकर आते हैं कि टेनिस में जो आक्रामक खेल होता है, जो जूझनेवाला खेल होता है, वो देखने को मिलेगा, अभी कोर्ट से बाहर मैं बहुत शांत हो गया हूँ, अनुभवी भी हो गया हूँ, 20 साल से खेल रहा हूँ, मगर कोर्ट पर मैं वही खेलता हूँ, जैसे नडाल खेलते हैं ताक़त लगाकर, यही हमारा स्टाइल है.

Image caption विंबलडन मिक्स्ड डबल्स विजेता लिएंडर पेस और कारा ब्लैक

ये साल तो अच्छा जा रहा है आपके लिए, ऑस्ट्रेलियन ओपन का मिक्स्ड डबल्स जीत चुके, फ्रेंच ओपन में डबल्स में फ़ाइनल और मिक्स्ड डबल्स में क्वार्टर फ़ाइनल तक पहुँचे, और अब विंबलडन, आगे क्या तैयारी है और सपना क्या है?

तैयारी तो लग रहा है सही चल रहा है सब, सपना क्या है, यही सवाल है. मगर मेरे ख़याल में जिंदगी ने मुझे इतना अच्छा मौक़ा दिया है कि टेनिस मेरा प्रोफ़ेशन है. जितने लोग घर से आते हैं, काम करके, नौ-दस घंटे काम करके, तो वो जब टेनिस कोर्ट पर आते हैं मुझे समर्थन देने के लिए तो उनका मनोरंजन होना चाहिए. लोग आते हैं मनोरंजन करने के लिए, मेरा काम है मनोरंजन देना, यही मेरा शौक है, सपना है कि जितने भी हमारे प्रशंसक हैं उनके आँखों में ख़ुशी देखूँ.

इस बार कोर्ट पर परिवार वाले लिएंडर दिखाई दे रहे थे, पत्नी (रिया पिल्लै) भी थी और बिटिया (अयाना पेस) भी थी, तो टेनिस में ये घरेलू माहौल कैसा होता है?

सबसे पहले तो मैं अपनी पत्नी, अपने माता-पिता, अपनी बेटी को बहुत-बहुत शुक्रिया कहना चाहता हूँ, क्योंकि उनके बग़ैर मैं कुछ भी नहीं हूँ. इतने साल से मेरे मम्मी-डैडी ने मुझे सपोर्ट दिया है, मुझे सिखाया है जीवन के बारे में, अभी मेरी पत्नी सिखाती है छुटियाँ को पालने में, छुटियाँ से भी बहुत कुछ सीखता हूँ, काफ़ी शरारती है वो हमारी तरह...

छुटियाँ? क्या आपकी बेटी का घर का नाम छुटियाँ है?

नहीं, घर पर उसको कुट्टी कहते हैं, दक्षिण भारत में छोटी बच्ची को कुट्टी कहते हैं, अयाना ने मेरे जीवन में काफ़ी ख़ुशियाँ बिखेरी हैं. लोग कहते हैं कि परिवार के बाद टेनिस थोड़ा नीचे चला जाता है, मेरे मामले में तो उल्टा हुआ है, मेरा करियर ऊपर जा रहा है, इसलिए मैं भगवान को धन्यवाद देता हूँ कि उन्होंने हमारे परिवार को इतना आशीर्वाद दिया है.

इस बार विंबलडन डबल्स में आप पहले ही मैच में बाहर हो गए, क्या हैरानी हुई इससे आपको?

काफ़ी मुश्किल होती है जब आप फ़्रेंच ओपन में क्ले कोर्ट पर खेलने के बाद घास पर खेलने उतरें. इस बार हमलोग फ़्रेंच ओपन में फ़ाइनल तक पहुँचे थे तो वहाँ से जब विंबलडन आए तो केवल 10 दिन मिला कोर्ट के हिसाब से खेल बदलने के लिए, तो शायद यही एक गड़बड़ हुई. अब यूएस ओपन के लिए तैयारी करनी है. मैंने देखा है कि पिछले तीन साल से हम वहाँ बहुत बढ़िया खेलते हैं, डबल्स और मिक्स्ड डबल्स, दोनों के फ़ाइनल में पहुँच जाते हैं, इस बार भी मेरा सपना है कि यूएस ओपन के दोनों फ़ाइनल तक जाऊँ.

इस बार भारतीय टीम का प्रदर्शन कैसा रहा विंबलडन में, कैसा आँकेंगें आप भारतीय खिलाड़ियों को?

मैं तो मिक्स्ड डबल्स में जीत गया, रोहन बोपान्ना डबल्स में क्वार्टर फ़ाइनल तक पहुँचे, महेश भूपति तीसरे दौर में बाहर हो गए, सोमदेव देवबर्मन ने भी क्वालिफ़ाई किया जो बड़ी बात है क्योंकि क्वालिफ़ाइंग में भी पूरी दुनिया से खिलाड़ी आते हैं, टेनिस क्रिकेट जैसा नहीं है जिसमें 12 देश खेलते हैं, यहाँ पूरी दुनिया से खिलाड़ी आते हैं और प्रतियोगिता बहुत कड़ी होती है, विंबलडन के क्वालिफ़ाइंग मैच भी बहुत कठिन होते हैं.

क्या मैच से पहले आप किसी तरह की कोई प्रार्थना आदि करके आते हैं, क्योंकि आप कोलकाता के हैं, वहाँ सौरभ गांगुली के बारे में सब जानते हैं कि वो कालीघाट जाया करते हैं.

ज़रूर, मेरी पत्नी बहुत आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाली है, हर सुबह घर पर हम ध्यान, आसन आदि करते हैं, घर में हमारी ज़िंदगी भी बड़ी नियमित है जो टेनिस के लिए बढ़िया है, लोग सोचते हैं कि मैं जिम जाकर फ़िटनेस रखता हूँ, 12 घंटे कोर्ट पर जाकर अभ्यास करता हूँ, मगर मेरे ख़याल में चैंपियन बनना है तो अपनी जीवन शैली को सही रखना चाहिए, क्या खाते हैं, क्या पीते हैं, कितनी ट्रेनिंग करते हैं, कितनी बुरी आदतों से बचते हैं, जैसे मैंने आज तक शराब और सिगरेट को हाथ नहीं लगाया, शौक भी नहीं है, मेरे ख़याल में गंदी आदत है, मैं ये नहीं कहता कि ये सही है या ग़लत, दूसरे लोग दूसरी सोच रखते होंगे, लेकिन मुझे लगता है कि एक चैंपियन को अपनी जीवन शैली को नियमित और साधारण रखना चाहिए.

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