राष्ट्रमंडल खेलों के 'वॉलंटियर्स' की है अहम भूमिका

राष्ट्रमंडल कार्यकर्ता प्रशिक्षण

जहाँ राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन पर तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं वहीं नोएडा के एक निजी विश्वविद्यालय में 'जोश से भरे युवाओं का सैलाब' नज़र आता है.

ये लोग महज़ युवक नहीं हैं बल्कि इनमें हर उम्र और हर क्षेत्र के लोग शामिल हैं. इनमें बुज़र्ग, अधेड़ उम्र, घर संभालने वाली गृहणी, स्कूल और कालिजों के छात्र-छात्राएं हैं लेकिन इन्हें युवा इनके उत्साह और जोश को देख कर कहा जा सकता है.

ये न तो खिलाड़ी हैं और न ही प्रबंधक हैं. वे वॉलंटियर्स यानी कार्यकर्ता हैं जो राष्ट्रमंडल खेलों के लिए दुनिया के कोने कोने से दिल्ली आने वाले मेहमानों की अच्छी देख-भाल और बेहतर ख़ातिर के लिए इन दिनों यहां प्रशिक्षण ले रहे हैं.

बीएसएनएल यानी भारतीय संचार निगम लिमिटेड के एनके मलिक का कहना है, "मुझे इसमें जो रोल दिया जाएगा उसे अच्छी तरह निभाने की कोशिश करुंगा ताकि दुनिया में ये संदेश जा सके कि भारत एक अच्छा देश है और यहां बड़े खेलों का आयोजन हो सकता है."

उन्होंने ये भी कहा, "जिस तरह से हमें ट्रेनिंग दी जा रही है मुझे पूरा भरोसा है कि यह खेल सफल होगा और भारत का नाम रौशन होगा."

तीस हज़ार लोगों को प्रशिक्षण का ज़िम्मा नोएडा की एमिटी युनिवर्सिटी को मिला है.

उत्साह के आगे..

इन्हें प्रशिक्षण देने वाले प्रोफ़ेसर आनन्य बासु ट्रेनिंग का विवरण देते हुए कहते हैं कि शुरू में हमें ये काम बहुत मुशकिल दिख रहा था क्योंकि इतने सारे लोगों और वह भी विभिन्न उम्र और क्षेत्रों से आने वाले लोगों की ट्रेनिंग मुश्किल होगी लेकिन इनकी लगन और जोश के सामने वह कोई चुनौती नहीं रह गई.

उन्होंने कहा, "हमने तीन चरणों में ट्रेनिंग रखी है. अभी जो ट्रेनिंग चल रही है ये है जनरल ट्रेनिंग जिसमें हम राष्ट्रमंडल खेलों की उम्मीदों और वॉलंटियर्स की उम्मीदों को मिलाते हैं, उनमें तालमेंल पैदा करते हैं."

"दूसरे चरण की ट्रेनिंग भी शुरू हो चुकी है और इसे हम नियम विशिष्ट ट्रेनिंग कहते हैं इसमें कार्यकर्ताओं को काम के हिसाब से अलग-अलग किया जाएगा और उन्हें उनके काम या विशेष खेल के हिसाब से प्रशिक्षण दिया जाएगा."

उन्होंने बताया, "प्रशिक्षण के तीसरे और अंतिम चरण में कार्यकर्ताओं को स्थल विशिष्ट ट्रेनिंग दी जाएगी कि कौन सी चीज़ कहां है. इसे हम वैन्यू स्पेसिफ़िक ट्रेनिंग कहते हैं."

Image caption दिल्ली में पहली बार राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन हो रहा है.

इसमें महज़ सामान्य लोग नहीं हैं बल्कि इन कार्यकर्ताओं में ऐसे लोग भी शामिल हैं जो पहले से बच्चों को प्रशिक्षण देते आ रहे हैं.

दिल्ली के गुरु तेग़बहादुर ख़लसा कॉलेज के प्रिंसपल डॉक्टर जस्विंदर सिंह भी वॉलंटियर हैं और वे कहते हैं, "इससे हमें भी लाभ हो रहा है कि हम इस टीम स्पीरिट को अपने बच्चों में पैदा करेंगे और इसके साथ-साथ बिना अपने हित को सामने रखे सेवा का मौक़ा भी मिल रहा है."

इतिहास का हिस्सा

दिल्ली विश्वविद्यालय की लेडी श्रीराम कॉलेज की छात्रा पूजा सिंह कहती हैं कि वे इसलिए ख़ुश और उत्साहित हैं कि उन्हें 'इतिहास का हिस्सा बनने का मौक़ा मिल रहा है.'

वहीं मीरांडा हाउस में स्नातक फ़ाइनल की छात्रा सुनाली का कहना है कि वह यहां इस लिए आई हैं ताकि वह इस बड़े मौक़े पर अपने देश की सेवा कर सकें.

पूर्व ओलंपियन अजीत पाल सिंह भी कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने आए थे और उनका कहना था कि "राष्ट्रमंडल खेल की कामियाबी वॉलुंटियर्स पर निर्भर होती है."

उन्होंने कहा, "ये वो लोग हैं जो भारत का चेहरा बनेंगे. यही वे हैं जो पहली बार एथलीट्स या डेलिगेट्स को मिलेंगे. एयरपोर्ट हो या स्टेडियम हो या खेल गांव हों हर जगह यही लोग उनसे संपर्क में रहेंगे."

राष्ट्रमंडल खेलों की सफलता को लेकर ये वॉलुंटियर्स काफ़ी आश्वस्त नज़र आ रहे हैं.

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