खेल के नाम पर बिकता राष्ट्रगौरव

दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के बाहर काम करते मज़दूर

मैं जवान और बूढ़े, हर किसी में एक असहाय आक्रोश को बढ़ते देख रहा हूँ जो उस आईने का सामना नहीं कर पा रहे जो हमें और हमारे समाज की विचलित कर देने वाली वास्तविकता दिखला रहा है.

जब आईपीएल विवाद सामने आया, तो सबसे पहली प्रतिक्रिया ये हुई कि उन पर ऊँगली उठाई गई जिन्होंने इस विवाद को उजागर किया, ना कि उन पर जो किसी गोरखधंधे में लिप्त हो सकते रहे होंगे.

लेकिन जैसे-जैसे इस गंदे क़िस्से के फैले छोरों की गहराई सामने आती गई, उन लोगों ने जिन्होंने एक नए, दमकते, आत्मविश्वास से भरे हुए भारत की बातों पर विश्वास करना शुरू कर दिया था और जिन्हें वो भारत, इस नकद से नहाए क्रिकेट में दिखाई देने लगा था, उन लोगों ने ख़ुद को ठगा हुआ पाया, लेकिन वे हताश नहीं हुए.

सारा दोष एक व्यक्ति या फिर स्वयँ सेवा करने वाले अधिकारियों की एक जमात पर डाल दिया गया जो खेल को दाँव पर लगाकर अपना बैंक-बैलेंस बढ़ाते रहे.

इस नाकामी को उस व्यवस्था की नाकामी माना गया जिसमें ख़ामियों को पकड़ने और दुरूस्त करने का इंतज़ाम नहीं था, ना कि इसे किसी बड़े रोग का लक्षण माना गया.

आईपीएल बनाम कॉमनवेल्थ

मगर आईपीएल में हुआ घोटाला तब एक मामूली मामला बन जाता है जब उसकी तुलना कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों से की जाए.

आईपीएल से अलग, जहाँ कि आसानी से कुछ लोगों की पहचान की जा सकती थी जिनसे कि शर्मिंदगी उठानी पड़ी, यहाँ हर कोई, वो चाहे ठेकेदार हों, बिल्डर हों, छोटे कर्मचारी हों, बड़े अधिकारी हों, मंत्री हों, राजनेता हों, सारे के सारे जनता की निगाह में गिरे हुए दिखाई दे रहे हैं.

भारतीयों के लिए सबसे पीड़ादायक बात ये है कि - पहले अपना भला, फिर कुछ और – की महामारी इतनी व्यापक दिखाई दे रही है कि “राष्ट्र गौरव” जैसी भावना भी एक बिकाऊ चीज़ होकर रह गई है.

यहाँ कौन है जिसे दुश्मन समझा जाए? किस पर आरोप लगाया जाए? जब खेलों के आयोजन से जुड़े सारे के सारे लोग ही लूट-खसोट में लिप्त हों, तो किसके पास गुहार लगाई जाए कि वो इस सबसे अधिक प्रताड़ित शब्द – "राष्ट्र गौरव" – की रक्षा करे.

भ्रमित जनमानस

मैंने देखा है कि युवा लड़के-लड़कियाँ इस दलील का समर्थन करते हुए तालियाँ बजाते हैं कि ऐसा देश जो दुनिया के सबसे ग़रीब देशों में से एक है, उसे ऐसे तमाशे पर पैसा बर्बाद नहीं करना चाहिए.

मैंने साथ ही ऐसी दलीलों पर भी तालियाँ बजती देखी हैं कि ये खेल दुनिया को हमारी संस्कृति और हमारी नई आर्थिक ताक़त को दिखाने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण हैं.

मुझे पता नहीं कि हमारे युवा भ्रमित हैं या वे बस ज़ोर-शोर से लगाए जा रहे नारों में ऐसे बह जाते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि उन्हें किस पाले में होना चाहिए?

मेरे जैसे, अति शंकालु लोगों की प्रतिक्रिया तो जानी-पहचानी होगी, जो कि मणिशंकर अय्यर द्वारा खेलों की आलोचना करते समय टी एस इलियट के वेस्टलैंड से उद्धृत इस कथन से मिलती-जुलती होगी – "मैं टाइरेसियस, झुर्रियों भरे शरीर वाला बूढ़ा, मैंने सारा दृश्य तैयार किया और भविष्य अपने-आप लिख दिया गया."

ये एक पराजयवादी प्रतिक्रिया है, जिससे युवा और स्वप्नदर्शी बचना पसंद करेंगे.

उनके लिए वास्तविक तस्वीर अभी भी बननी बाक़ी है और वे मानते हैं कि अपनी तकदीर के निर्माता वे ख़ुद हैं और देश का भविष्य वही लिख सकते हैं.

उनकी इस योजना में खेल किस जगह दिखाई देता है, एक राष्ट्र के हिसाब से, ना कि ब्रांड इंडिया के हिसाब से?

दीवार पर लगा आईना यदि इस वास्तविकता का एक बदसूरत चेहरा दिखाता है, तो उनका आक्रोश, अगर सही दिशा में नहीं मोड़ा गया, तो बिना-बात की हिंसा में बदल सकती है.

या फिर निराश होकर, दूसरे लोगों की ही तरह, वे भी मुख्यधारा में शामिल हो जाएँगे और "राष्ट्रगौरव" से वो सब जुटाना शुरू करेंगे जिससे ज़िंदगी आसान हो सकती है.

(लेखक हिन्दुस्तान टाइम्स अख़बार के खेल सलाहकार हैं)

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