निशानेबाज़ नारंग कितने सदमे में हैं?

गगन नारंग

भारत के जाने माने निशानेबाज़ गगन नारंग के राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा ने लेने के बयान ने कई सवाल उठाए हैं.

गगन नारंग इस वर्ष प्रतिष्ठित राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार पाने की दौड़ में शामिल थे लेकिन उन्हें इस पुरस्कार के लिए नहीं चुना गया. बीबीसी के साथ ख़ास बात-चीत में वे इस बात पर काफ़ी क्षुब्ध नज़र आए.

गगन जी आप भारत के जाने माने निशानेबाज़ हैं और लंदन ओलंपिक्स के लिए क्वालिफ़ाइ करने वाले पहले भारतीय निशानेबाज़ हैं, क्या कहेंगे आपको जो निराशा हुई है खेल रत्न नहीं मिल पाने से?

निराशा तो बहुत हुई है. तीसरी बार मेरे साथ ऐसा हुआ है.

ये भी कहा जा रहा है कि वर्ल्ड चैम्पियनशिप के दौरान ही आपको पता चल गया था और आप वहां भी अपनी भावनाओं को छुपा नहीं सके थे?

निराश तो मैं बुहत था. मुझे पता था कि मुझे तीसरी बार इस सम्मान से वंचित किया गया है. उस वक़्त मैं काफ़ी निराशाजनक स्थिति में था और काफ़ी सारे विचार मेरे मन आ रहे थे. लेकिन मैं इस बात से ख़ुश हूं कि चार साल में होने वाली इस प्रतियोगिता में मैं मेडल जीत सका.

क्या आपको ये नहीं लगता कि जब पूरा देश खिलाड़ियों की ओर देख रहा है एसे में आपका निर्णय आपके चाहने वालों को ज़्यादा ही सख़्त नहीं लग सकता है?

यहां मैं एक बात साफ़ करना चाहता हूं कि मैंने ये नहीं कहा है कि मैं राष्ट्रमंडल खेलों में भाग नहीं लुंगा. मैं ने ये कहा है कि मैं अभी मोटिवेटेड महसूस नहीं कर रहा हूं. मुझमें प्रेरणा की कमी है और मैं नहीं चाहता कि मैं राष्ट्रमंडल खेलों में आधे-अधूरे मन से उतरूं.

वर्ल्ड चैंपियनशिप के बाद मैं मांसिक और शारिरिक दोनों रूप से काफ़ी थका हुआ हूं. मैं नहीं समझता की मैं राष्ट्रमंडल खेलों में अपना सौ फ़ीसदी दे सकता हूं. अभी मैं सिर्फ़ आराम करना चाहुंगा.

अगर आपको कोई प्रेरणा दी जाए तो अभी जो आप को निराशा मिली है उससे उबरने में आपको कोई मदद मिलेगी?

Image caption नारंग लंदन ओलंपिक्स के लिए क्वालिफ़ाई करने वाले पहले भारतीय हैं.

हर बार मेरे साथ यही होता है. कोई आख़िर कितना अपने आपको मोटिवेट करे. वे यही कहते हैं करते रहो करते रहो. आख़िर वे मुझसे और कितना मेडल चाहते हैं. मेरे पास सारे मेडल हैं सिर्फ़ एक मेडल नहीं है.

हमारे स्तर पर एथलीट्स के लिए एक ही मोटिवेशन होता है और वह मेडल और पुरस्कार होता है. कौन नहीं चाहता कि अपने देश का झंडा ऊंचा करे लेकिन मैं नहीं कह सकता की आगे मेरा क्या क़दम होगा.

लेकिन जो भी क़दम होगा वह सब अपने फ़ेडरेशन, माता-पिता, अपने कोच, अपने स्पॉनसर्स की राय लेकर ही होगा.

जैसे ही आपने अपना ब्यान दिया आपके शुभ चिंतकों में निराशा की लहर दौ़ड़ गई, मीडिया में खलबली मची, क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि अब देश में कम से कम माहौल तो ऐसा कि अब खिलाड़ियों को माना जाता है. इस संकट की घड़ी में भी आपने लोगों को अपने साथ पाया होगा तो उससे आपको कितना मोटिवेशन मिला?

मेरे विचार से ये काफ़ी मायने रखता है. और ये सपोर्ट सिस्टम होना चाहिए. मुझसे वह लोग सहमत होंगे जिन्होंने मुझसे ज़्यादा कठिनाइयों से लड़ते हुए मेडल जीता होगा.

मगर फिर भी मेरे हिसाब से भारतीयों खिलाड़ियों को जो सम्मान मिल रहा है वह काफ़ी नहीं.

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