नज़र मेडल परः कृष्णा पूनिया

परिचय

प्रस्तुति: आदेश गुप्त

कृष्णा पूनिया, डिस्कस थ्रो खिलाड़ी

कृष्णा पूनिया का जन्म हरियाणा के हिसार ज़िले के अगरोहा गाँव में हुआ था.

बचपन में कृष्णा को डिस्कस थ्रो के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था. कृष्णा वही खेल खेलती थीं जो और बच्चे खेला करते थे.

कृष्णा की बुआ उनकी लम्बाई देखकर उनको इस खेल में लाईं. शादी होने के बाद भी कृष्णा का संबंध इस खेल से नहीं टूटा.

सुनिए कृष्णा पूनिया का परिचय

ससुराल में खेल के प्रति जागरूकता थी जिसकी वजह से उन्हें काफ़ी प्रोत्साहन मिला. उनके पति वीरेंदर पूनिया ही उन्हें कोचिंग देते हैं. कृष्णा आज जिस मुकाम पर है उसका श्रेय वह पति को देती हैं.

इंटर कॉलेज में लगातार हर वर्ष उनके अच्छे प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें नेशनल कैंप में शामिल किया गया, तब से लेकर आज तक कृष्णा इस खेल के प्रति समर्पित हैं.

इस साल कृष्णा को एथलेटिक्स में अर्जुन पुरस्कार देने की घोषणा हुई है.

कृष्णा को वर्ष 2006 में दोहा एशियाई खेलों में कांस्य पदक मिला था.

खेलों की तैयारी


कृष्णा पूनिया, डिस्कस थ्रो खिलाड़ी

कृष्णा कहती है कि राष्ट्रमंडल खेलों के लिए उनकी तैयारी काफ़ी अच्छी है. राष्ट्रमंडल खेल और उसके अगले महीने चीन में एशियाई खेल, दोनों को ध्यान में रखकर तैयारी चल रही है. राष्ट्रमंडल खेल में उन्हें स्वर्ण पदक की उम्मीद है.

एशियाई खेलों की तैयारियों के बारे में कृष्णा का कहना है, "राष्ट्रमंडल खेल में जो स्तर दिखेगा उसी को अगले एक महीने तक बना कर रखने पर एशियाई खेल में भी पदक मिलने की उम्मीद है."

कृष्णा विदेश में भी ट्रेनिंग ले चुकी हैं. उनका मानना है कि वहां मिली ट्रेनिंग से उन्हें काफ़ी फ़ायदा होगा. राष्ट्रमंडल खेलों में मिलने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए कृष्णा मानसिक और शारीरिक रूप पूरी तरह फीट हैं.

कृष्णा कहती हैं कि उनका मुक़ाबला ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीकी खिलाड़ियों से रहेगा विशेष कर ऑस्ट्रेलिया से.

वहीं अपने ही देश की सीमा ऐंतिल और हरमीत कौर को कृष्णा अपना प्रतिस्पर्द्धी मानती हैं जबकि उनके मुताबिक़ नीलम जय सिंह उनकी मार्गदर्शक भी हैं और प्रतिस्पर्द्धी भी.


तस्वीरें

  • कृष्णा पूनिया, डिस्कस थ्रो खिलाड़ी
    कृष्णा पूनिया का जन्म हरियाणा के हिसार ज़िले के अगरोहा गाँव में हुआ.
  • कृष्णा पूनिया, डिस्कस थ्रो खिलाड़ी
    इंटर कॉलेज में उनके अच्छे प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें नेशनल कैंप में शामिल किया गया.
  • कृष्णा पूनिया, डिस्कस थ्रो खिलाड़ी
    कृष्णा को वर्ष 2006 में दोहा एशियाई खेलों में काँस्य पदक मिला.
  • कृष्णा पूनिया, डिस्कस थ्रो खिलाड़ी
    इस खेल को जारी रखने के लिए कृष्णा को परिवार का भरपूर सहयोग मिला.
  • कृष्णा पूनिया, डिस्कस थ्रो खिलाड़ी
    इस साल कृष्णा को एथलेटिक्स में अर्जुन पुरस्कार देने की घोषणा हुई है.
  • कृष्णा पूनिया, डिस्कस थ्रो खिलाड़ी
    कृष्णा पूनिया को बीजिंग ओलंपिक के दौरान काफ़ी तारीफ़ मिली
  • कृष्णा पूनिया, डिस्कस थ्रो खिलाड़ी
    कृष्णा से भारत को राष्ट्रमंडल खेलों में काफ़ी उम्मीदें हैं
  • कृष्णा पूनिया, डिस्कस थ्रो खिलाड़ी
    जीवन के काफ़ी उतार-चढ़ावों से गुज़रती हुई कृष्णा इस मुक़ाम तक पहुँची हैं

कुछ खट्टा-मीठा

कृष्णा पूनिया, डिस्कस थ्रो खिलाड़ी

कृष्णा ने डिस्कस थ्रो खेलने की शुरुआत वर्ष 2003 में की थी. खेल को लेकर उनके जीवन में कई बार काफ़ी उतार-चढ़ाव आए लेकिन वह आगे बढ़ती गईं. इसे जारी रखने के लिए उन्हें मायके और ससुराल दोनों ही परिवारों का समर्थन मिलता रहा. इसी सफ़र में वे माँ भी बनीं जो उनके लिए किसी पदक से कम नहीं था.

इस खेल में बने रहने के लिए वह कहती हैं, "जब तक मैं कैंप में होती हूं तब तक सब कुछ ठीक चलता है लेकिन घर पर रह कर तैयारी करना बहुत मुश्किल होता जाता है, रिकवरी के लिए जो भी सामान की जरूरत होती है, वो बहुत मंहगी पड़ जाती है."

उनका कहना है कि मौसम के हिसाब से कैंप नहीं होने से सालों भर खेल से जुड़ा रहना मुश्किल हो जाता है.

कृष्णा पूनिया कहती है कि भारत जैसे देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खिलाड़ी को तैयार होने में तकरीबन 10 साल का समय लग जाता है. इतना समय कोई जूनियर खिलाड़ी नहीं देते हैं. ऐसे में कुछ जूनियर लड़कियां 40 से 45 मीटर डिस्कस फेंकने के बाद भी दूसरे करियर के विकल्प की ओर रूख करने लगती है, यह देखकर दुख होता है, ऐसा नहीं होना चाहिए.

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