राष्ट्रमंडल के आयोज पर मिलखा सिंह

मिलखा सिंह

भारत के सबसे चर्चित एथलीट मिलखा सिंह के साथ राष्ट्रमंडल खेलों के विभिन्न पहलुओं पर बीबीसी की ख़ास बात.

मिलखा सिंह पहले भारतीय हैं जिन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता और यह भी सत्य है कि उसके बाद से भारत को उसमें कोई स्वर्ण पदक मिला भी नहीं.

मिलखा सिंह जी आप क्या कहना चाहेंगे जिस प्रकार भ्रष्टाचार और आशंकाओं के बदल दिल्ली पर मंडला रहे हैं?

हम या कोई भी हिंदुस्तानी जब इस क़िस्म की बात सुनता है तो उसे दुख होता है. हमारे प्रधानमंत्री ने दुनिया भर में भारत की ऐसी छवि बना दी है कि भारत अच्छा कर रहा है और भारत प्रगति कर रहा.

पहले लोग हिंदुस्तानियों की इस तरह इज़्ज़त नहीं करते थे जैसी आज करते हैं. हमारे समय में वे बस हिंदुस्तानियों को ऐसा-वैसा ही समझते थे लेकिन आज मैं सुनता हूं कि हर जगह हिंदुस्तानियों की इज़्ज़त है.

लेकिन जबसे कॉमनवेल्थ गेम्स की बात चली है, और उसमें जारी भ्रष्टाचार सामने आया है फिर से हमारे देश की सारी दुनिया में बदनामी हो रही है कि भारत एक भ्रष्ट देश है. इससे हर हिंदुस्तानी का दिल टूट गया है.

बहरहाल, जो कुछ भी हो रहा है बहुत बुरा हो रहा है. मुझे नहीं मालूम कि क्या सच है. इन लोगोंने जो ये कमेटी बनाई है उससे बात सामने आ जाएगी कि क्या सच है और क्या झूठ.

यहां मैं ये भी कहना चाहुंगा कि ये कॉमनवेल्थ गेम्स जो हमने लिया है उसे हम ज़ोर-शोर से कराएं. ये ढोल जो हमारे गले पड़ा है उसे हमें बजाना ही बजाना है. कुछ भी हो हमें ये गेम्स करवानी ही करवानी है.

मैं सरकार को और खेल में दिलचस्पी लेने वाले लोगों से यही कहुंगा कि जो लोग भ्रष्टाचार में शामिल हैं उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी ही चाहिए. मुझे तो ये सुनने में आ रहा है कि अब लोग यहां ओलंपिक भी करवाना चाहते हैं. हम दोबारा एशियन गेम्स लेना चाहते हैं.

आज हर हिंदुस्तानी कह रहा है कि अगर स्पोर्ट्स में ऐसी चीज़ें हो रही हैं तो हमें ओलंपिक्स गेम्स के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए.

मिलखा सिंह जी जहां तक आम आदमी की बात है तो आप जानते हैं कि उनकी जेब कितनी ख़ाली होती जा रही और एक खिलाड़ी तैयार करने में कितना ख़र्च आता. हज़ारों करोड़ों रुपए की लगत से जो स्टेडियम बने हैं उनमें तकनीकी ख़ामियाँ पाई गई हैं. 1982 में हुए एशियाई खेलों के लिए जो स्टेडियम बने थे उन्हें तोड़कर स्टेडियम बनाया गया और वह एक बारिश नहीं झेल पा रहा है. दिल्ली का हाल तो आपको मालूम ही है. इतने रुपए में तो दिल्ली को पेरिस बनाया जा सकता था. क्या आपको नहीं लगता कि इन खेलों को इतनी गंभीरता से नहीं लिया गया जितनी गंभीरता से एशियाड को लिया गया था?

Image caption मिलखा सिंह एक मात्र भारतीय हैं जिन्होंने राष्ट्रमंडल खेल में एथलेटिक्स में स्वर्ण पदक जीता है.

जो स्टेडियम एशियाड के समय बने थे उन स्टेडियम्स का नवीनीकरण तो होना ही था. इसमें कोई बड़ी बात नहीं है. लेकिन जो मैं अख़बार में पढ़ रहा हूं या टीवी पर देख रहा हूं उससे ये दुख होता है कि जो काम एक रुपए में होना था उसके लिए 100 रुपए ख़र्च किए गए हैं. जो 100 रुपए का काम था उसे हज़ार रुपए में करवाया.

ये जो संसद में हो रहा उसे सिर्फ़ मैं नहीं बल्कि सारा हिंदुस्तान और सारी दुनिया देख रही है और इसमें हमारी बहुत ज़्यादा बदनामी हो रही है.

जहां तक खिलाड़ियों का सवाल है तो मैं ये कहना चाहुंगा कि आठ साल पहले जब हमने कॉमनवेल्थ गेम्स लिया था तो हमने कलमाडी को कह दिया था कि आप प्रशिक्षण का ज़िम्मा कृपया सेना को दे दीजिए.

आगर सेना को प्रशिक्षण की ज़िम्मेदारी दी गई होती तो हम एथलेटिक्स में कुछ मेडल हासिल कर सकते थे. हम निशानेबाज़ी, भोरोत्तोलन, मुक्केबाज़ी, तीरअंदाज़ी और कुश्ती में थोड़े से मेडल हासिल कर लेंगे मगर हम मुख्य गेम एथलेटिक्स में कहीं नहीं है.

चाहे ओलंपिक्स हो या राष्ट्रमंडल खेल या फिर एशियाड हर जगह एथलेटिक्स ही महत्वपूर्ण होता है. एथलेटिक्स में 50 स्वर्ण पदक हैं. अगर भारत एक भी स्वर्ण एथलेटिक्स में ले जाएगा तो मैं कहुंगा कि बहुत है.

कम से कम दो साल पहले सारे स्टेडियम्स तैयार हो जाने थे ताकि हमारे एथलीट्स उनमें अभ्यास करते तो हो सकता था कि एथलेटिक्स में हमें कुछ पदक मिल जाते. आख़िरी समय पर सब गड-मड हो गया है.

मैं जहां भी जाता हूं लोग पूछते हैं कि मिलखा सिंह जी हमें एथलेटिक्स में कितने मेडल आ रहे हैं. तो मैं उनको जवाब नहीं दे पाता कि हम लड़के और लड़कियों के 50 स्वर्ण पदक में से एक भी नहीं ले पाएंगे.

कितनी शर्म आएगी कि नेहरू स्टेडियम भरा होगा. लाखों लोग देख रहे होंगे और पूरा हिंदुस्तान देख रहा होगा और वहां झंडा ऑस्ट्रेलिया का ऊपर जा रहा होगा, कनाडा, इंग्लैंड, कीनिया, यूगांडा के झंडे ऊपर जा रहे होंगे लेकिन हमारा झंडा ऊपर नहीं जा रहा होगा हालांकि हमने करोड़ों रुपए ख़र्च किए और ये गेम्स आयोजित कराए.

कहा जा रहा है कि जो टॉप के एथलीट्स हैं वे लंदन ओलंपिक की तैयारी कर रहे हैं और राष्ट्रमंडल खेलों में शामिल नहीं हो रहे हैं, ऐसे में अगर भारतीय एथलीट को कोई पदक मिल भी जाए तो क्या उन्हें वैसी संतुष्टी होगी जैसी आप को है क्योंकि आपके ज़माने में सारे टॉप के एथलीट मुक़ाबले में थे.

आपने जो कहा बिलकुल ठीक कहा कि बहुत से अच्छे एथलीट्स और स्पोर्ट्स मैन यहां आएंगे ही नहीं. क्योंकि हमारी जो अब छवि बनी है उससे अच्छे खिलाड़ी नहीं आएंगे.

जमैका के बोल्ट के बारे में ख़बरें आ रहीं. वह वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर है. अगर वह यहां नहीं आया तो लोगों को कितना ख़राब लगेगा. 100, 200, 400 मीटर और दो रिले में वह शामिल होता और उसे पांच गोल्ड मेडल ले जाने थे.

जब मैं अख़बार में पढ़ता हूं कि वह नहीं आ रहे हैं और इसी प्रकार कनाडा के कुछ अच्छे तैराक नहीं आ रहे हैं तो मुझे बहुत दुख होता है.

लेकिन जब हम इतना पैसा ख़र्च कर रहे हैं तो हमें हर देश को ये कहना चाहिए कि वे अपने अच्छे से अच्छे एथलीट को भेजें ताकि हमारा राष्ट्रमंडल खेल कामयाब हो.

आम जनता का मानना है कि उनकी बात तो नहीं सुनी जाती है लेकिन मिलखा सिंह जी की बात सारी दुनिया में सुनी जाती है और यह कि इन स्टेडियमों को भारत के धरोहर के तौर पर होना चाहिए था.

मैं बस यही कहना चाहुंगा कि मैं कीचड़ में पत्थर नहीं फेंकना चाहता क्योंकि सब मुझ पर ही पड़ेगा. मैं बहुत कुछ कह सकता हूं, मुझे मालूम हैं लेकिन मुझे कहना नहीं है.

मैं तो आयोजकों से यही कहूंगा कि मेरी शुभकामनाएं उनके साथ वे बेहतर से बेहतर करें ताकि हमारे देश का नाम रौशन हो. ये न हो कि इतना पैसा ख़र्च करने के बाद भी हमारे देश की बदनामी हो.

जहां तक स्टेडियम्स की बात है तो होना तो ये चाहिए था कि यह आने वाले बीस साल तक हमारे काम आता लेकिन जो निर्माण सामग्री इनमें लगी है उससे ऐसा नहीं लगता और हमारे एथलीट्स को अभ्यास के लिए भी ये स्टेडियम्स मिल पाएंगे तो इन बातों से उनका आत्म-विश्वास कहीं न कहीं हिला हुआ होगा.

मैंने आपको पहले ही कहा कि प्रशिक्षण बहुत ज़रूरी चीज़ है. चीन ने ओलंपिक करवाए तो रात दिन अपने खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया और खेल से पहले ही ये कह दिया था कि चीन दुनिया में नंबर वन होगा. और उन्होंने अमरीका को पीछे छोड़ कर वह कर दिखाया और चीन को नंबर वन बना दिया.

इसी तरह जब हम राष्ट्रमंडल खेल भारत में करवा रहे हैं तो हमारा ये लक्ष्य होना चाहिए था कि भारत नंबर एक स्थान हासिल करे. मगर वह बात नहीं होगी.

मैं आपको फिर से बता रहा हूं कि इस बात का हर हिंदुस्तानी को दुख होगा कि स्टेडियम भरे हुए होंगे लेकिन मेडल्स दूसरे ले जा रहे होंगे. इससे आने वाली पीढ़ी का मनोबल कम होता है.

पहले अपने खिलाड़ियों का स्तर बढ़ाएं तब जा कर ओलंपिक लेने की बात करें. नहीं तो भूल जाएं कि हमें ओलंपिक करवाने हैं.

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