आज़ादी के दिन आज़ादी की आज़माइश

मैं कोई नई बात नहीं कर रहा हूँ. बात पुरानी है. जिस पर काफ़ी शोर-शराबा हो चुका है.

राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर बवाल लंबे समय से चल रहा है. आख़िरकार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी मामले में दखल देना पड़ा.

लेकिन लगता यही है कि व्यवस्था के दलदल में फँसा राष्ट्रमंडल खेल इन सब चीज़ों से उबर नहीं पाया है.

समितियों के गठन और जाँच-पड़ताल के दावे के बीच क्या वाक़ई सतही स्तर पर तस्वीर बदली है? यही हाल जानने हम निकले दिल्ली की सड़कों पर. इस बार हमने प्रैक्टिस मैदानों की सुधि लेने की सोची.

हमारा पहला पड़ाव था दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर में स्थित सेंट स्टीफ़ेंस प्रैक्टिस ग्राउंड, जहाँ रग्बी खिलाड़ी अभ्यास करेंगे. लेकिन जिस ग्राउंड को काफ़ी पहले तैयार हो जाना था, वहाँ का आलम देखकर यक़ीन नहीं हो रहा था कि इतने शोर-शराबे और हंगामे के बावजूद क्या बदला है.

सड़कें ख़राब, स्टेडियम के अंदर निर्माण सामग्रियों के ढेर...कमरों में फ़िनिशिंग नहीं और जगह-जगह टूट-फूट. वहाँ मौजूद लोगों ने हमें ग्राउंड में घुसने से रोकने की कोशिश की.

लेकिन हम किसी तरह मैदान में घुसे और इमारत का भी निरीक्षण किया. हालत इतनी ख़राब थी कि पूछिए मत. एक-एक दिन की क़ीमत गिनाने वाले अधिकारी और इंजीनियर न सिर्फ़ स्वतंत्रता दिवस की छुट्टियाँ मना रहे थे बल्कि कामकाज भी रुका हुआ था.

लेकिन जिस जगह को देखकर हमारी आँखें खुली रह गईं, वो था शिवाजी स्टेडियम. इस स्टेडियम में कोई मैच तो नहीं खेला जाना है, लेकिन यहाँ हॉकी टीमों को अभ्यास करना है.

Image caption प्रैक्टिस ग्राउंड की हालत भी ख़राब है

यानी इस स्टेडियम को तो बहुत पहले तैयार हो जाना चाहिए था. लेकिन दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस में स्थित शिवाजी स्टेडियम का हाल देखकर तो दिल बैठ गया.

जिस स्टेडियम को 30 जून तक तैयार हो जाना था, उसकी समय सीमा बढ़ाकर 31 अगस्त तक कर दी गई है, लेकिन वहाँ जो हालात है, उसे देखकर नहीं लगता कि ये 31 अगस्त तक तैयार हो पाएगा.

हर तरफ मलबे और निर्माण सामग्रियों के ढेर. पूरा इलाक़ा जैसे खोद दिया गया है. आसपास की सड़कों पर सीवर का पानी बह रहा है.

हद तो उस समय हो गई, जब हमने एक बाल मज़दूर जैसे दिख रहे बच्चे से बात करने की कोशिश की. वो बच्चा अपनी उम्र बदल-बदल कर बता रहा था.

'देशद्रोही'

हमें जब शक़ हुआ और हमने बात करने की कोशिश की, तो साइट इंजीनियर बड़ी संख्या में मज़दूरों को लेकर वहाँ पहुँच गया और हम पर चिल्लाने लगा. जब हमने अपना परिचय दिया, तो उनका कहना था- सरकारी साइट पर मज़दूरों से बात करना ग़ैर क़ानूनी है.

Image caption शिवाजी स्टेडियम का सही तस्वीर खींचना कुछ लोगों के लिए गुनाह है

हमने कहा कि आप हमें आदेश दिखा दो, हम वापस चले जाएँगे. लेकिन वो इंजीनियर मानने को तैयार नहीं था और हमसे बदतमीजी करने पर उतारु था. सरकारी आदेश की प्रति मांगने की हमारी कोशिश का कोई असर नहीं हुआ.

उसका तो यही कहना था कि वो न तो हमें फोटो खींचने देगा, न किसी का इंटरव्यू लेने देगा और न ही ख़ुद जवाब देगा.

जब हमने इंजीनियर से नाम पूछा, तो व्यंग्य में उनका जवाब था- प्रकाश सिंह बादल. इंजीनियर के साथी ने हमें काफ़ी भला-बुरा कहा. उन्होंने कहा- आप लोग विदेशों में देश की नाक कटवा रहे हो.

शिवाजी स्टेडियम के निर्माण और आम जनता के धन के दुरुपयोग के सवाल की बात तो भूल जाइए, उन्होंने चिल्लाते हुए कहा- आप लोग देशद्रोही हो.हम किसी तरह बचते-बचाते वापस लौटने में सफल रहे.

लेकिन मन-मस्तिष्क में एक ही सवाल उमड़-घुमड़ रहा था. क्या इस देश में सवाल पूछना भी अब देशद्रोह हो गया है? क्या जनता तक सही तस्वीर पेश करना गुनाह हो गया है....

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