और कितना ख़र्च?

दिल्ली में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है.

साल 2003 में भारत को इन खेलों के आयोजन की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी. लेकिन फ़िलहाल आलम ये है कि रोज़ अख़बारों में और टीवी चैनलों पर तकरीबन रोज़ ही खेलों के तैयारी के दौरान हुई कथित अनियमितताओं के बारे में खबरें आ रहीं हैं.

अभी भी हर तरफ से सवाल उठ रहे हैं कि इन खेलों के आयोजन से भारत और भारत सरकार को क्या मिलेगा?

अगर सरकारी आंकड़ों पर नज़र डालें तो अब तक सभी सरकारी विभागों ने आयोजन समिति को मिला जुला कर 11494 करोड़ दे डाले हैं.

आयोजन समिति के महासचिव ललित भनोट ने बीबीसी को बताया, "भारत सरकार से मैंने 1620 करोड़ रुपए लिए हैं और ख़र्चा इससे भी ज़्यादा हो सकता है. मैंने सरकार को भरोसा दिलाया है कि हम खेलों से इतनी ही राशि का प्रायोजन ला कर ही देंगे."

हालांकि आयोजन समिति के लाख दावों के बाद भी कि लागत से ज़्यादा मुनाफ़ा होगा, खेलों से जुड़ा खर्च बढ़ता जा रहा है और आमदनी के ज़रिए निचुड़ते जा रहे हैं.

ब्रांड राष्ट्रमंडल

तो क्या राष्ट्रमंडल खेलों से उठ रहे भ्रष्टाचार के छीटों से ब्रांड इंडिया पर भी असर पड़ेगा?

जाने-माने इमेज गुरु दिलीप चेरियन कहते हैं, "मुझे डर ये है कि ब्रांड राष्ट्रमंडल खेल से तो पहले ही कोई ख़ास उम्मीद नहीं थी. लेकिन असली बात यही है की मज़बूत कही जा रही ब्रांड इंडिया को भ्रष्टाचार और अफ़रा-तफ़री से सने हुए राष्ट्रमंडल खेलों के चलते गहरी चोट पहुंची है. मेरे हिसाब से इन सभी तत्वों को ब्रांड इंडिया से निकाल देना चाहिए जिससे ये ब्रांड पहले की तरह ठोस हो सके." कुछ महीने पहले तक आयोजन समिति को उम्मीद थी कि खेलों के आयोजन में भारत सरकार और उसके उपक्रम भी प्रायोजन लेकर सामने आएँगे.

मौजूदा सूरत-ए-हाल हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र की लगभग सभी बड़ी कंपनियाँ अपने वायदे से पीछे हटती नज़र आ रही हैं. चाहे वो भारतीय रेल, सेंट्रल बैंक, एयर इंडिया, एनटीपीसी या निजी क्षेत्र की कंपनियाँ गोदरेज या हीरो होंडा ही क्यों न हो.

सभी ने अब आयोजन समिति के सामने प्रायोजन से जुडी शर्तें लगानी शुरू कर दी हैं. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने तो पहले से वादा किया हुआ 100 करोड़ रुपया भी देने से मना कर दिया. लगता है जैसे आगामी राष्ट्रमंडल खेलों पर से लोगों का विश्वास ही उठता जा रहा है. अमर उजाला अखब़ार के खेल संपादक जसविंदर सिद्धू भी इस बात से इत्तफ़ाक़ रखते हैं.

सिद्धू कहते हैं, "आज हर किसी का भरोसा राष्ट्रमंडल खेलों पर से उठ गया है. सभी को लगने लगा है की इन खेलों में बहुत पैसा खाया गया है. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को लगता है की उनका पैसा तो जनता का ही पैसा है और क्यों इसे ज़ाया किया जाए."

लेकिन आयोजन समिति अब भी दावे पर दावे ही कर रही है. हालांकि पिछले एक हफ़्ते से बीबीसी की लाख कोशिशों के बावजूद आयोजन समिति के किसी भी सदस्य ने इस मसले पर बयान देने से इनकार कर दिया.

हालाँकि कुछ दिनों पहले तक समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी और महासचिव ललित भनोट छाती फुलाकर कह रहे थे कि खेलों से राजस्व तो आना ही है.

दर्शकों के लिए उपलब्ध कराए जाने वाले टिकटों की बिक्री का भी हाल कुछ बेहाल सा नज़र आ रहा है.

आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच टिकटों की बिक्री आख़िकार जून महीने से शुरू हुई और वो भी कई महीनों के विलंब के बाद.

मुश्किल

इमेज गुरु दिलीप चेरियन मानते हैं कि ब्रांड सीडब्लूजी की साख दिन पर दिन कम होती जा रही है और यही वजह है इसकी बढ़ती मुश्किलों की.

दिलीप चेरियन ने बताया, "जितनी भी बड़ी ब्रांड हैं उन सभी को अहसास है कि राष्ट्रमंडल खेलों में पैसा डूबने ही वाला है. चाहे वो प्रायोजन का पैसा हो या फिर इश्तिहार ही क्यों न हो. इन शंकाओं की बुनियाद एक ही है. भ्रष्टाचार के बढ़ते आरोपों की संख्या और आयोजन समिति की ओर से इन आरोपों पर अभी तक की असंतुष्ट प्रतिक्रिया."

अगर तमाम सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के मन में सवाल उठ रहे हैं तो उन सबके पीछे की वजह भी स्पष्ट है.

ज़रा आज की सच्चाई पर नज़र दौडाते हैं. जिन स्टेडियमों में खेल होने हैं उनमे से अधिकांश का नवीनीकरण अब भी जारी है. दिल्ली सकरार समेत एमसीडी और एनडीएमसी ने दिल्ली शहर के पुनर्निर्माण का बीड़ा उठा रखा है.

खिलाडियों के खान-पान वाला टेंडर किसको मिला, कब मिला, कितने में मिला- ये सवाल अभी भी बरकरार है. खेलों के प्रचार में इस्तमाल होने वाला प्रचार का सामान बाज़ार में कब तक आएगा अभी इसपर कोई आधिकारिक टिपण्णी नहीं आई है.

इन सबके बीच ऐसा जान पड़ता है कि राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति को मिलने वाले सरकारी/गैर सरकारी कोष में भी गिरावट आ रही है.

अब आयोजन समिति सरकार से मिले करोड़ों रूपए कैसे लौटाएगी, इस सवाल का जवाब फ़िलहाल आयोजन समिति के पास भी नहीं है.

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