खेल भावना के ख़िलाफ़ है उन्माद फैलाना

सहवाग
Image caption सहवाग एक रन से शतक बनाने से चूक गए थे

भारतीय मीडिया खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एक दिन बड़े पैमाने पर उन्माद फैलाने की कोशिश करती है और एक खलनायक की रचना करती है जिसे इतने विद्वेषपूर्ण निष्ठुरता के साथ चीरकर अलग किया जाता है जिससे हिटलर तक को गर्व हो सकता है.

हालांकि सुरेश कलमाडी देश के दुश्मन नंबर वन की सूची में अभी भी पहले स्थान पर हैं, लेकिन इस हफ़्ते उनकी जगह शायद क्रिकेट की दुनिया के एक शख्स ने ले ली.

इस शख्स का नाम सूरज रंदीव है. जब तक इस खिलाड़ी ने वीरेंद्र सहवाग को शतक बनाने से नहीं रोका था, तब तक उन्हें क्षमतावान गेंदबाज के रूप में जाना जाता था.

लंबे कद के ऑफ स्पिनर रंदीव जो असामान्य ऊंचाई से गेंद को टर्न देकर बाउंस कराते हैं और बल्लेबाज को एक अनुमानित खेल खेलने के लिए बाध्य कर देते हैं, अब भारत में घर-घर में एक जाना पहचाना नाम हैं-अपनी गेंदबाजी कौशल की वजह से नहीं बल्कि अपनी बदनामी के लिए.

सहवाग को एक सांख्यकीय उपलब्धि हासिल करने से रोकने पर हुई नाराज़गी से जिससे रंदीव को खुद शर्मसार होना पड़ा,क्रिकेट इतिहास में एक नई गिरावट देखने को मिली है.

ट्रैवर चैपल से तुलना

इसकी तुलना ट्रेवर चैपल के उस छल से की जा रही है, जो हाथ के नीचे से की गई और जिसने न्यूज़ीलैंड को जीतने से रोक दिया था.

टेलीविज़न चैनलों और अख़बारों में उन नियमों को बदलने की मांग की जा रही थी जिससे कोई खिलाड़ी हेराफेरी कर सकता है और भारतीय बल्लेबाज को 99 के स्कोर पर बाहर कर सकता है.

मैं भी चाहता हूं कि इस तरह की हेराफेरी के लिए कड़े दंड दिए जाने चाहिए. मैं उन लोगों से इत्तफ़ाक रखता हूं कि आईसीसी को इस पर क़दम उठाना चाहिए और नियमों में बदलाव करना चाहिए.

मुझे स्वीकार करना चाहिए कि मैं इस बात से अनजान था कि क्रिकेट के नियम उस समय नाकाफी हैं जब स्कोर बराबरी पर हों और अगर कोई गेंदबाज गलत गेंद डालता है, मैच तत्काल समाप्त हो जाता है और बल्लेबाज अगर इस गेंद पर कोई रन बनाता है तो उसे गिना नहीं जाएगा.

संशय सीधा सा था क्योंकि सामान्य स्थिति में जब टीम को जीत के लिए सिर्फ़ एक रन की ज़रूरत होती है और बल्लेबाज एक चौका या छक्का लगाता है तो सभी रन बल्लेबाज के खाते में चले जाते हैं.

सो, सहवाग को छक्का मारने या शतक बनाने से क्यों रोकें?

नाराज़ लोगों की प्रतिक्रिया इस बात पर थी कि रंदीव ने जानबूझकर क्रीज़ से बाहर क़दम रखा.

उन्मादी प्रतिक्रिया

सूरज रंदीव ने सहवाग को गलत गेंद पर आउट किया

इस बात में कोई शक नहीं कि रंदीव की हरकत खेल भावना के ख़िलाफ़ थी. लेकिन क्या यह अपराध इतना बड़ा था जिसके लिए बड़े-बड़े बहस की ज़रूरत थी जिसमें संगकारा को भी घसीट लिया गया और ऐसे उकसाने वाले के तौर पर पेश किया गया जो कड़ी सज़ी का हक़दार था.

मेरा मानना है कि हम सभी की प्रतिक्रिया काफ़ी अधिक थी और बचकाना भी, वह भी सिर्फ़ इसलिए कि सहवाग को शतक बनाने से रोका गया जो उतना शर्मनाक नहीं है जितना किसी टीम को जीतने से रोकना.

आख़िरकार, दो टीमें जीतने के लिए ही एक दूसरे के साथ खेलती हैं. मुख्य प्रतियोगिता के आगे व्यक्तिगत आंकड़े गौण हो जाते हैं.

अगर इस हिसाब से देखा जाए, तो जिस नियम के तहत एक टीम को मैच का विजेता घोषित किया जाता है, वह पूरी तरह से न्यायसंगत है.

खेल भावना

खेल से जुड़े नियमों को व्यक्तिगत रिकॉर्ड को ध्यान में रखकर नहीं बदले जा सकते.

सहवाग को शतक बनाने से रोकने में रंदीव ने बदमाशी की. श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड ने तेज़ी से कार्यवाई करके और एक मैच के लिए प्रतिबंध लगाकर उस उन्माद को रोक दिया जो भारतीय मीडिया पैदा कर रहा था. और इस तरह भारतीय क्रिकेट बोर्ड से सीधे टकराव की नौबत नहीं आ सकी.

अगर कोई भारतीय गेंदबाज इसी तरह की कोई हरकत करता और श्रीलंकाई उसे हेराफेरी की संज्ञा देते, तब भी हमारी प्रतिक्रिया यही होती? कहीं बेकार का सवाल तो नहीं पूछ दिया.

दुनिया में जिनका शासन चलता है, वे कभी भी क़ानून नहीं तोड़ते हैं और कभी भी खेल भावना के ख़िलाफ़ नहीं जाते. असल में, वे खुद अपने लिए नियम बनाते हैं जिसका अनुसरण दूसरे करते हैं.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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