दिल्ली चमकी, किस्मत नहीं

राष्ट्रमंडल खेलों शुरु होने में 32 दिन का समय बचा है. आयोजन से पहले दिल्ली चमकती नज़र आने लगी है, मगर निर्माण कार्य में लगे मज़दूरों की हालत मे अब भी कोई सुधार नहीं दिखता.

दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद राष्ट्रमंडल खेलों से संबधित कार्यों में लगे मज़दूरों को अभी तक न्यूनतम मज़दूरी नहीं मिल रही है.

न्यूनतम मज़दूरी ही अकेला मुद्दा नहीं है, रहने की दयनीय स्थिति, बाल मज़दूरी और मज़दूरों की सुरक्षा के इंतज़ाम भी पुख्ता नहीं हैं.

इस मामले में दायर की गई जनहित याचिका की अगली सुनवाई बुधवार को होनी है.

सुनवाई से ठीक एक दिन पहले बीबीसी ने मंगलवार को दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में चल रहे निर्माण स्थलों का दौरा किया.

हुमायूं रोड के मेट्रो स्टेशन पर पत्थर लगाने का काम चल रहा है. वहाँ काम कर रहे दिलीप से उनकी मज़दूरी के बारे में पूछने पर जवाब मिलता है एक सौ चालीस रुपए.

आप को बता दें कि दिल्ली अकुशल मज़दूर की न्यूनतम मज़दूरी 203 रुपए है.

उम्र पूछने पर दिलीप कहते हैं उनकी कोई उम्र नहीं है. उम्र न बताने की वजह आप खुद समझ सकते हैं.

इसी सड़क पर कुछ आगे फुटपाथ पर पत्थर लगाने का काम चल रहा है. मध्य प्रदेश से आए मजदूर सड़क के किनारे ही बनी झोपडी में रहते है. इन्हें ना सिर्फ़ कम मज़दूरी मिलती है बल्कि इनके रहने की स्थिति भी दयनीय है.

मध्य प्रदेश से आई भारती पहले तो ठेकेदार के डर से बात करने को तैयार नहीं हुई. बाद में आश्वस्त होने के बाद उन्होंने बताया कि उनके रहने की स्थिति ख़राब है. परेशान भारती कहती हैं, " परेशानियाँ तो होती हैं, अब क्या करें... पानी ही नहीं हैं,गंदा पानी मिल भी जाता है तो फुटपाथ पर नहाना पड़ता है."

परेशानियाँ

Image caption दिलीप के उम्र न बताने की वजह आप खुद समझ सकते हैं

जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के अंदर तो हमें नहीं जाने दिया गया लेकिन बाहर से ही हम देख सकते थे कि छत पर काम कर रहे मज़दूर के सिर पर न हेलमेट है न कोई सुरक्षा उपकरण.

खेलगाँव में आख़िरी चरण का काम चल रहा है

दोपहर का भोजन करने खेलगाँव से बाहर आए मज़दूरों से बात करने पर पता चला कि वहाँ भी स्थिति कमोबेश यही हैं. यहाँ लगभग 500 लोग काम कर रहे है और उन्हें भी न्यूनतम मज़दूरी नहीं दी जा रही है.

पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स की जनहित याचिका पर पिछली सुनवाई के दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी करते हुए श्रम कानूनों के लागू करने को कहा था.

लेकिन संस्था का कहना है कि अब तक कोई ठोस परिणाम नहीं दिखाई दिए हैं.

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