पदक मिलेगा तो नाम भी होगा

बौमाल्या देवी

भारतीय तीरंदाज़ बौमाल्या देवी राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने के लिए कड़ी मेहनत कर रही हैं और अपनी तैयारियों को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त हैं.

उन्होंने कहा,"जीत के लिए मैं कड़ी मेहनत कर रही हूं और कोच भी मेरा पूरा साथ दे रहें हैं. मुझे पूरा भरोसा है कि नतीजे बेहतर ही होंगे."

मणिपुर की रहने वाली बौमाल्या देवी का पिछला प्रदर्शन देखकर आप कह सकते हैं कि उनके दावों में दम है.

बौमाल्या दक्षिण एशियाई खेलों में टीम स्पर्धा का स्वर्ण और व्यक्तिगत स्पर्धा का रजत पदक जीत चुकी हैं. पिछले दिनों हुई विश्व निशानेबाज़ी चैपियनशिप के तीसरे चरण में उन्होंने रजत पदक जीता था.

क्रिकेट से तीरंदाज़ी तक

भारत में तीरंदाज़ी मशहूर न होने के बावजूद बौमाल्या ने ये खेल चुना.

बौमाल्या का कहना है," बचपन में मैं क्रिकेट खेलती थी, लेकिन मेरी मां तीरंअदाज़ थीं. एक दिन मैं उनके साथ गई, तीर-कमान देखकर मुझे बड़ा मज़ा आया और फिर पता ही नहीं चला कि कब मेरा झुकाव क्रिकेट से निशानेबाज़ी की तरफ़ हो गया."

बौमाल्या की मां ही नहीं बल्कि उनके पिता भी खेल से जुडे़ हुए हैं. वो भारतीय खेल प्राधिकरण में हैंडबॉल के कोच हैं.

फ़िलहाल बौमाल्या भारतीय खेल प्राधिकरण के कोलकाता सेंटर में अभ्यास कर रहीं हैं.

हर खेल की क्रिकेट से तुलना होना आम बात है, इस पर बौमाल्या कहती हैं. "मै इतना ही कह सकती हूं कि क्रिकेट के बाद आजकल लोग बैडमिंटन की बात करते हैं, सायना नेहवाल की बात करते हैं. मुझे लगता है कि हमें भी ऐसा कुछ करना होगा कि हमारा भी नाम हो. मुझे विश्वास है कि हमारी बारी भी जल्द आएगी."

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