क्रिकेट पर बड़ा संकट

सलमान बट
Image caption पाकिस्तान के कप्तान सलमान बट पर मैच फिक्सिंग के आरोप लगाए जा रहे हैं

दस साल पहले जब हमें पता चला था कि पैसा बनाने के लिए कुछ क्रिकेटरों ने अपने प्रदर्शन और मैच के नतीजों के साथ हेरफेर किया, तो हमें बड़ा झटका लगा था.

हमें तो विश्वास भी नहीं हो रहा था लेकिन आज हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां हम हर तरह के झटके के आदी हो गए हैं और अविश्वास का वजूद हमारे शब्दकोश में ही नहीं है.

जब वेस्टइंडीज 1997 में भारत दौरे पर आई तो भारत में रहने वाले एक सट्टेबाज ने खिलाड़ियों को लुभाने में मेरी मदद मांगी. हालांकि मैं पहले भी मैच फिक्सिंग की ख़बरें सुन चुका था, बावजूद इसके मैं स्तब्ध था.

जब मैंने इस बारे में लिखा तो किसी को भी यकी़न नहीं हुआ. कम से कम सभी प्रशासकों की प्रतिक्रिया तो ऐसी ही थी, ठीक वैसे ही जैसे आज पाकिस्तान में सत्ता प्रतिष्ठान इसे सिरे से खा़रिज़ कर रहे हैं.

आज जब 18 साल का लड़का खुल्लमखुल्ला "फिक्सिंग" में शामिल होता है तो समझ में नहीं आता कि क्या प्रतिक्रिया दें. क्या उसे सूली पर लटका दें या आत्ममंथन करें और उन कारणों की पड़ताल करें कि कैसे एक आसानी से प्रभावित होने वाला युवक अपने करियर को जोखिम में डालता है, प्रशंसकों को धोखा देता है, महज चंद पैसे बनाने के लिए?

लालच का माहौल

हम लालच और बेइमानी के एक ऐसे माहौल में रहते हैं जो खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करता है कि पैसे बनाने के लिए किसी भी हद तक चले जाओ, भले ही उसकी उम्र कितनी ही कम क्यों न हो.

पाकिस्तान के प्रशासक खुद को और अपने भ्रष्ट तरीके़ को आवरण में ढकने की कोशिश कर रहे हैं, कुछ महीने पहले ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ सिडनी टेस्ट में कुछ खिलाड़ियों के अपने विकेट खोने के मसले को भी छिपाने की कोशिश हुई थी.

हाल ही में आईपीएल भ्रष्टाचार प्रकरण के बाद तो खेल प्रशासकों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया था. जब हर चीज बिकाऊ है चाहे वो खिलाड़ियों का कौशल हो या उसका नाम जो लोगों को आईपीएल की पार्टियों की तरफ आकर्षित करता है तो ऐसे में अतिक्रमणों की परवाह किसे है.

हम इसी बात पर फक्र करते हैं कि प्रशासकों और खिलाड़ियों की कमाई दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है.

किसी भी टूर्नामेंट की सफलता इस बात से तय होती है कि उसमें भाग लेने वाले खिलाड़ी और वो कितने करोड़ रूपए बना रहे हैं. नियम का़नूनों का माखौल उड़ा दिया जाता है. जब हम सभी का मनोरंजन हो रहा है, तो लंबे समय तक इसकी परवाह कौन करता है!

इस लालच से बेइमानी का जन्म होता है और एक ऐसा माहौल तैयार होता है जहां प्रसिद्धि और सफलता के लिए सिर्फ़ पैसा ही मायने रखता है, चाहे वो किसी भी तरीके़ से कमाया जाए, तो फिर हम खिलाड़ियों से कैसे उम्मीद करते हैं कि वे इनसे दूर रहेंगे?

दाग़ी संरक्षक

Image caption इस साल आईपीएल में भी भ्रष्टाचार की ख़बरें सुनने में आईं

जब अनैतिकता और सत्ता के खेल में शामिल अनुभवी और परिपक्व लोग सज़ा पाने के बजाय खेल के संरक्षक बन जाते हैं तो ऐसे में हम कैसे उम्मीद करें कि हमारे खिलाड़ी भ्रष्टाचार से अछूते रह पाएंगे.

एक खिलाड़ी भी आखि़़रकार हमारी ही तरह एक इंसान है और उसी समाज में है जहां हम रहते हैं.

जब वो अपने आस-पास देखता है कि पैसे से न केवल आराम बल्कि सम्मान भी खरीदा जा सकता है तो वो भी इससे खुद को अलग नहीं रख पाता.

जहां हमें लगता है कि भारत में क्रिकेटर पैसे का अंबार लगा रहे हैं, वहीं यह भी सच है कि भारत में करोड़ों रूपए की कमाई कुछ मुठ्ठीभर क्रिकेटर ही कर रहे हैं जिसमें बड़ी संख्या उनकी है जिनको खुद नहीं पता कि उनका करियर एक दिन , एक महीने या फिर सालभर में ख़त्म हो जाएगा.

सच्चाई यह है कि गै़रक़ानूनी तरीके़ से बोली लगाने वालों का गठजोड़ भारत से संचालित होता है और अधिकतर सट्टेबाज़ भारतीय हैं, जैसा कि 2000 के मैच फिक्सिंग में बात सामने आई थी.

क्या हमें इस बात पर विश्वास कर लेना चाहिए कि ये सभी सट्टेबाज इतने देशभक्त हो चुके हैं कि ये अपने भारतीय खिलाड़ियों को छोड़कर दुनिया भर के बाकी़ देशों के खिलाड़ियों को लालच देने की कोशिश कर रहे हैं.

जैसा कि हम सभी को पता है कि लालच पूरी तरह से सेक्युलर, गै़र-राजनीतिक होता है, लिंग भेदभाव से परे यह किसी अमीर-ग़रीब के बीच भेदभाव नहीं रखता है और इसके लिए देशों की सीमाएं मायने नहीं रखतीं हैं.

यह 18 साल के प्रतिभाशाली खिलाड़ी, बकबक करने वाले बूढ़े़ या आत्मतुष्टि से पूर्ण प्रशासक के बीच भी अंतर नहीं रखती.

यह कहना कि क्रिकेट बड़े संकट के दौर में है, महज एक मामूली बयानबा़जी ही होगी.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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