मेडल नहीं, पर अलग सी पहचान तो है

सपने वो नहीं होते जो आपको सोने के बाद आते हैं.सपने वो होते हैं जो आपको सोने ही ना दें.

ये आपको सुना-सुना सा लगा होगा. ये मंत्र है मुक्केबाज़ अखिल कुमार का.

ये वही अखिल कुमार है जिन्होने विजेंदर के साथ मिलकर भारत में मुक्केबाज़ी को एक अलग पहचान दिलाई.

अखिल कुमार 2006 मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक विजेता हैं.दिल्ली में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों में भी उनका मुक्का स्वर्ण पदक के लिए चलेगा.

अखिल कहते हैं. " मै काफ़ी कड़ी मेहनत कर रहा हूँ. मेरी ट्रेनिंग में हर पहलू की तैयारी शामिल है. थोड़ा सा अगर किस्मत ने साथ दिया तो गोल्ड से कम मेडल नहीं आएगा. मैं तो भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि मेडल हो तो गोल्ड हो या ना हो"

बीजिंग ओलंपिक मे भी अखिल की निगाहे स्वर्ण पदक पर थी, लेकिन वहाँ वो सफल नहीं हो पाए. हमने अखिल से पूछा कि क्या 2008 बीजिगं बीजिंग ओलंपिक में सोने का पदक ना जीत पाने की कोई टीस उनके मन में है.

इसका जवाब अखिल हँसतें हुए देते हैं. " वो मेरी ज़िदगी के सबसे बड़े बदलाव के क्षण थे, मेरी तैयारी अच्छी थी, कोच और टीम का साथ भी था पर अंतिम क्षणों मे भगवान ने मेरा साथ छोड़ दिया. मेरे खेलने का अंदाज़ ही बता देता है कि मै गोल्ड के लिए खेलता हूँ. लेकिन एक बात है कि मुझे पहचान बीजिंग ओलंपिक के बाद ही मिली हैं.भले ही मेरे पास मेंडल नहीं, पर मेरी अलग सी पहचान है."

अखिल कुमार राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों को अंतिम रुप पटियाला में दे रहे हैं और कभी-कभी मन को शांत करने के लिए भजन "सुख के सब साथी, दुख में ना कोए… हे राम. " गाते है.

भले ही अखिल बीजिगं बीजिंग ओलंपिक में सोने का पदक ना जीत पाने की टीस के होने से इनकार करते हों पर उनकी बातों में ये टीस साफ़ झलकती हैं.

अखिल की कोशिश यही होगी कि वो घरेलू दर्शकों के सामने सोने का पदक जीत अपनी इस टीस को शांत करें.