आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

भापरतीय भारोत्तोलन की टीम

अक्तूबर से शुरू होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी जहां अपने अंतिम दौर में है वहीं इन खेलों में भाग लेने वाले भारतीय खिलाड़ियों पर प्रतिबंधित दवाओं के सेवन की काली छाया पड़ना किसी अप-शगुन से कम नहीं है.

एक महीने पहले बीबीसी से एक बातचीत में भारतीय भारोत्तोलन संघ के सचिव सहदेव यादव ने दावा किया था कि इस बार डोपिंग टेस्ट में कोई भी भारोत्तोलक दोषी नहीं पाए जाएंगे, लेकिन उनकी दावेदारी ग़लत साबित हुई जब 'सानामाचा चानू' सहित कई खिलाड़ी डोपिंग टेस्ट में दोषी पाए गए.

इससे पहले भारतीय भारोत्तोलकों के बार-बार प्रतिबंधित दवाओं के सेवन का दोषी पाए जाने के चलते, भारतीय भारोत्तोलन संघ को राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेने की इजाज़त नहीं दी गई थी. राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेने के लिए भारतीय भारोत्तोलन संघ ने विश्व भारोत्तोलन संघ को पाँच लाख डॉलर का जुर्माना भरा.

इतनी जद्दोजहद और फ़जीहत के बाद भी ये बीमारी खत्म नहीं हुई बल्कि और प्रबल दिखने लगी है. पिछले आठ महीने में जूनियर समेत 103 भारतीय खिलाड़ी डोप टेस्ट में दोषी पाए गए. जिनमें छह पहलवान भी शामिल हैं. इनमें से एक राजीव तोमर भी हैं, जिनको देश के प्रतिष्ठित खेल सम्मान पुरस्कार, अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित भी किया जा चुका है.

खुद को प्रतिबंधित दवाओं के सेवन का दोषी पाए जाने पर वह कहते हैं, "शर्मिंदगी की बात है कि आज मेरे ऊपर ऐसा इल्ज़ाम लगा है. हम इतने पढ़े-लिखे तो हैं नहीं जो इंटरनेट पर बैठकर देखें कि 'नाडा' या 'वाडा' ने क्या बैन किया है. ये सब अनजाने में हो रहा है."

उनका कहना है कि खिलाड़ियों को जागरूक करना सबका फ़र्ज़ बनता है, लेकिन इस बात से भारतीय भारोत्तोलन संघ के सचिव सहदेव यादव पल्ला झाड़ते हुए कहते हैं, "एथलीट को सब कुछ पता होता है, इस तरह का आरोप ये लोग बिल्कुल नहीं लगा सकते. इसके लिए हम लोग सेमिनार करके पूरी तरह से ट्रेनिंग देते हैं."

भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष जीएस मंडेर का भी यही कहना है कि खिलाड़ियों को डोप टेस्ट और प्रतिबंधित दवाओं के बारे में सब कुछ बताया जाता है.

ज़िम्मेदार कौन?

इस विषय पर वरिष्ठ खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली का कहना है, "कोच को खिलाड़ियों की प्रतिभा के बारे अच्छी तरह मालूम होता है कि वह कितना ऊपर जा सकता है उनसे कुछ भी छुपा नहीं होता है."

कुश्ती के एक और कोच यशवीर सिंह का भी ऐसा ही कुछ कहना है. वह कहते हैं, "खिलाड़ी और कोच का साथ तो चोली-दामन की तरह होता है, हम लोग जानकारी तो देते हैं पर कभी-कभी सही जानकारी न होने के कारण, ऐसी ग़लतियां हो जाती है. खिलाड़ी जो फ़ूड सप्लिमेंट लेते हैं उसकी जाँच लिए भी हमने नाडा से आग्रह किया है."

इतना जागरूक होने के बाद भी दोषी पाया जाना कैसे संभव हो सकता है. इसके लिए किसको ज़िम्मेदार मानें? किसकी ज़िम्मेदारी बनती है जो खिलाड़ियों को जागरूक कर सकें? इस सवाल के जवाब में सिडनी ओलंपिक में काँस्य पदक विजेता कर्णम मल्लेश्वरी कहती हैं, "मैं ये नहीं कहती कि इसमें ग़लती किसी एक खिलाड़ी की ही है, इसमें सबकी बराबर ज़िम्मेदारी होती है, चाहे फ़ेडरेशन हो या कोच हो या खिलाड़ी हो."

वहीं फ़्री-स्टाइल कुश्ती टीम के मुख्य कोच जगमिंदर सिंह इस मुद्दे पर लाचार नज़र आ रहे हैं. उनका कहना है, "पहलवान क्या कर सकते हैं, दरअसल खिलाड़ी जिस दवा को लेने का दोषी पाए जा रहे हैं उसे इसी वर्ष से प्रतिबंधित किया गया है. इसके बारे पहलवानों को ज़्यादा बताया नहीं जा सका है. डॉक्टरों को भी इस बारे ज़्यादा कुछ पता नहीं था."

खिलाड़ी तो ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं इसलिए हो सकता है कि उन्हें इस दवाई की जानकारी न हो, लेकिन जिन्हें यही काम सौंपा गया है उन्हें भी यह जानकारी न हो, इस तरह की बातें तो वाकई हैरत में डालती है.

इस मुद्दे पर इंडियन फ़ेडरेशन ऑफ स्पोर्ट्स मेडीसिन के अध्यक्ष और खेल चिकित्सक डॉक्टर पीएसएम चंद्रन का कहना है, "हमारे देश में योग्य खेल डॉक्टर, फिजियो आदि की कमी है ऐसे में जागरूकता कैसे संभव हो सकती है?"

'मौक़ा नहीं मिलता'

कर्णम मल्लेश्वरी इन सबके पीछे कुछ कारण देखती है. अनुभवी खिलाड़ियों को आगे लाने पर वह ज़ोर डालकर कहती हैं, "जिन लोगों ने खेल के लिए खून-पसीना बहाया है उनको पीछे धकेल कर ऐसे लोगों को खेल की ज़िम्मेदारी दे दी जाती है जिनको इसके बारे में एबीसी भी पता नहीं होता है तो ऐसी समस्या तो आएगी ही."

पर ऐसे में सवाल ये उठता है कि खिलाड़ियों को इन प्रतिबंधित दवाओं से कैसे दूर रखा जाए? इस पर वरिष्ठ खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली की राय मानें तो वो कहते हैं कि कोच पर सब निर्भर करता है और फ़ेडरेशन को थोड़ा और सख़्त होने की ज़रूरत है. दूसरा, हमारी यह कोशिश रहनी चाहिए की हम उन मेहनती खिलाड़ियों को सामने लाएं जो सालों भर मेहनत करते हैं और ऐसे टेस्ट में कभी दोषी नहीं पाए गए.

इसके अलावा जो जीतेंगे उसी को कैश रिवार्ड मिलेगा ऐसा नहीं होना चाहिए. जब से कैश रिवार्ड देने का सिलसिला शुरू हुआ है तब से ये प्रतिबंधित दवा लेने की प्रथा बहुत ज़्यादा चली है. मेरे ख़्याल से मुख्य रुप ये खिलाड़ी बहुत कुछ पाना चाहते हैं और इसके लिए डोप को ज़रिया बनाते हैं.

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