विकलांग नहीं हूँ मैं.......

निशानेबाज़ी, भारोत्तोलन, कुश्ती, निशानेबाज़ी...सब खेलों में भारत को राष्ट्रमंडल खेलों में पदक मिल रहे हैं. लेकिन तैराकी ऐसी स्पर्धा है जिसमें भारत की झोली खाली ही रही है.लेकिन दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में तैराकी में भारत को पहला पदक नसीब हुआ है और ये करिश्मा कर दिखाया है विकलांग खिलाड़ी प्रशांत करमाकर ने.

उन्होंने विकलांग खिलाड़ियों के वर्ग में 50 मीटर फ़्रीस्टाइल प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता है.

ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे प्रशांत कहते हैं, "ये मेरे लिए ही नहीं पूरे देश के लिए ख़ास पल है. इतनी बड़ी प्रतियोगिता में तैराक़ी में भारत हमेशा पीछे रहा है. ये हमारे लिए सोचने की बात थी, मुझ पर भी कहीं न कहीं ये सवाल खड़ा करता है. भगवान का शुक्र है कि मैं पदक जीत पाया और मैं सवालों के घेरे से बच गया. मेडल जीतने के बाद मैं कुछ सोच नहीं पा रहा था. मेरी आँखें सिर्फ़ अपने माता-पिता को ढूँढ रही थी स्टेडियम में."

प्रशांत ने विकलांग खिलाड़ियों की श्रेणी में राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का नाम रोशन किया है लेकिन उन्हें ये बात कतई पसंद नहीं कि उनके जैसे लोगों के लिए 'डिसएबल्ड' शब्द का प्रयोग किया जाए.

वे कहते हैं," इस शब्द का प्रयोग ही नहीं होना चाहिए. देखा जाए तो क्या हर व्यक्ति किसी न किसी तरह से डिसएबल्ड नहीं है? हर इंसान में कोई न कोई कमी है. हाँ फ़र्क़ ये है मेरी कमी दिखती है कि मेरा एक हाथ नहीं है."

थक जाना नहीं...

पदक जीतने के बाद अचानक प्रशांत मीडिया की नज़रों में है लेकिन उनका ये सफ़र आसान नहीं रहा है.पश्चिम बंगाल के एक साधारण से परिवार से आने वाले प्रशांत बताते हैं कि उन्होंने हल्के फ़ुल्के अंदाज़ में तैराकी शुरु की थी और धीरे-धीरे इसके प्रति गंभीर हो गए और पहुंच गए बंगलौर ट्रेनिंग के लिए. लेकिन पैसों की कमी आड़े आने लगी.

अपने संघर्ष के दिनों के बारे में वो बताते हैं, "मैं बंगलौर चला आया, सोचा था कि किसी स्विमिंग पूल में काम करूँगा और साथ में अभ्यास करूँगा. लेकिन अभ्यास इतना कड़ा था कि मैं नौकरी कर ही नहीं पाता था. पैसे तीन महीने में ख़त्म हो गए. अगर खाने-पीने के तीन हज़ार, मकान का किराया तीन हज़ार और दूसरे खर्च मिला लो तो 10 हज़ार महीने का खर्च तो बन ही जाता है. दस क्या मेरे पास पाँच हज़ार भी नहीं थे. अंतत मैं अपने घर कोलकाता वापस चला गया और वहीं प्रेक्टिस करने लगा. कभी कभी सोचता था कि क्यों न सब छोड़ दूँ."

प्रशांत कहते हैं कि उनके जैसे विकलांग तैराक़ को ऐसा महसूस करवाया जाता था मानो उन्होंने तैराक़ बनने का फ़ैसला करके कोई भारी ग़लती कर दी हो.

लेकिन इस सब के बीच भी प्रशांत ने हिम्मत नहीं हारी. अंतत एक संस्था ने उनका मूल खर्चा उठाने का फ़ैसला किया. हरियाणा सरकार भी आगे आई. और प्रशांत एक के बाद एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ जीतने लगे.

लंदन ओलंपिक का सपना

अब राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने के बाद प्रशांत जैसे सबकी नज़रों में आ गए हैं. वे चाहते हैं कि भारत में शारीरिक रूप से विकलांग खिलाड़ियों और पैरा -स्पोर्ट के लिए कुछ ऐसा किया जाए जिससे खिलाड़ी आगे बढ़ सकें.

उनका कहना है, "विकलांग लोगों को किन दिक्कतों का सामना करना पड़ता है आप नहीं जानते, आप समझ ही नहीं सकते. वे मानसिक स्तर पर टूटे हुए होते हैं. अगर उनके लिए खेल की सुविधाएँ होंगी तो उनके जीवन को मकसद मिलेगा, वो अपने पैरों पर नहीं तो अपने बलबूते ज़रूर ज़िंदगी में खड़े हो पाएँगे और इसी बहाने भारत को खेलों में पदक भी मिलने लगेंगे."

प्रशांत कहते हैं कि इस मकाम तक पहुँचने के लिए उन्हें 15 साल तक खुद को रगड़ना पड़ा जिसमें उन्हें कई लोगों का साथ मिला.

अपने जैसे दूसरे खिलाड़ियों को प्रशांत यही मशवरा देते हैं कि बिना हौसला हारे, दिल और दिमाग दोनों का इस्तेमाल करते हुए मेहनत करते रहे तो कामयाबी ज़रूर मिलेगी...वे भरोसा दिलाते हैं कि बाकी लोगों को 15 साल का वक़्त नहीं लगेगा.

अब प्रशांत का सपना लंदन ओलंपिक में जाने का है और वे कहते हैं कि इसके लिए उन्हें मेहनत के साथ-साथ बहुत सारे लोगों के समर्थन की ज़रूरत होगी.

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