ताउम्र याद आने वाला अनुभव

उदघाटन समारोह

जिनकी निगाहें लक्ष्य की तरफ हों, जो रेस ट्रैक पर हिरणों जैसे कुलांचें भरें, ऐसे एथलीट को देखना मन को बड़ा ही सुकून देने वाला होता है.

खेलों के दौरान ऐसे क्षण ताउम्र आनंददायक अनुभूति देने वाले होते हैं जिनमें गति की सीमा लाँघ देने की मानवीय चाह खिलाड़ी में एक शिकारी सा ज़ज्बा़ भर देते हैं.

जिन लोगों ने 5000 मीटर की दौड़ देखी जिसमें उगांडा के मोसेस किपसिरो ने कीनिया की चुनौती को मामूली अंतर से तोड़ा, उनके लिए ऐसा पल एक दुर्लभ अनुभव था.

ऊर्जा और ताकत से लबरेज ऐसे भी धावक वहां मौजूद थे जो ऐसी प्रेरणा से दौड़े कि आप उनके फेफड़े की ताकत को देखकर डर ही जाएं.

यह सब कुछ तकरीबन 10 सेकंड के भीतर ही हो गया कि आपको पलक झपकने का मौका भी नहीं मिला.

उसैन बोल्ट की गैर मौजूदगी के बावजूद एथलेटिक स्पर्धाएं बाकी सभी स्पर्धाओं की ही तरह विश्व स्तरीय होने का एहसास करा रही हैं.

सन्नाटा

Image caption इन खेलों के दोरान दर्शक दीर्घाएं पूरी तरह खाली दिखती हैं

लोग भारी आशंका के साथ उन टिकटों के साथ घंटों लाइनों में खड़े थे जिनके लिए उन्होंने 25 से 50 हज़ार रूपए तक अदा किए थे.

यह एक डरावना अनुभव था!

बढ़ती हुई भीड़ को नियंत्रित करने की कोई व्यवस्था नहीं थी. अगर भगदड़ होती तो इसमें मरने वालों की संख्या सैकड़ों नहीं हज़ार तक हो सकती थी और इसमें बूढ़े और जवान सभी शामिल होते.

उस दिन सारे तंत्र विफल हो चुके थे, यहां तक कि वे सब भी जिनकी कीमत अच्छी खासी थी.

किसी दैवीय कृपा से ही हज़ारों लोग बिना किसी दुर्घटना के स्टेडियम में प्रवेश कर गए. उन लोगों ने उदघाटन समारोह के कड़वे अनुभवों की परवाह नहीं की.

हमने कर दिखाया

Image caption भारतीय खिलाड़ी पदकों की बरसात कर रहे हैं

जी हां, हमने कर दिखाया, ख़राब भविष्यवाणियों के बावजूद. प्रभावशाली समारोह से विदेशी मीडिया भी अचंभित था. हालांकि हममें से कई लोग लाइन में खड़े होकर इसका हौसला बढ़ाने से चूक गए कि भारत ने बिना किसी रूकावट और देरी के ऐसा कर दिखाया.

अब जब कि हमारे खिलाड़ी ऐसी रफ्तार से पदक जीत रहे हैं जैसा पहले कभी भी नहीं हुआ, तो इस आयोजन के प्रति हमारी दिलचस्पी और जुनून नई हद तक पहुंच चुकी है और यह पहले कभी भी नहीं हुआ.

लेकिन एक बार फिर दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि दीर्घाओं में लोग खचाखच नहीं भरे हुए हैं और उन स्पर्धाओं में भी जिसमें भारतीय खिलाड़ी पदकों की बरसात कर रहे हैं.

इन खेलों में स्कूलों और कॉलेजों की अधिक से अधिक भागीदारी कराने के बजाय दिल्ली को बंद रखा गया है ताकि ट्रैफिक की भीड़भाड़ से बचा जा सके.

हालांकि टिकट खरीदकर खेल आयोजन स्थल तक पहुंचना अब भी सामान्य लोगों के वश की बात नहीं है. लंबी दूरी तक पैदल चलना और भीतर भारी भरकम सुरक्षा से ऐसा एहसास होता है मानो आप किसी सैन्य छावनी में पहुंच रहे हैं.

और जब सुरक्षा बल इस बात पर भरोसा नहीं करते हैं कि आपकी जांच एक बार हो चुकी है, और इस वजह से आपकी फिर से पड़ताल की जाती है, तो आपके पास झुंझलाने की पर्याप्त वजह है.

लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इन सभी बाधाओं के बावजूद हज़ारों लोग ऐसे भी हैं जो भारत को पदक जीतते देखने से नहीं चूकना चाहते हैं, लेकिन क्या किसी को इस बात की परवाह है?

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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