वैश्विक मंच पर बनाई नई पहचान

स्वर्ण पदक जीतने के बाद कृष्णा पूनिया

कुछ दिनों पहले तक वो खेलों का प्रतीक था. पीले रंग के बाघ के मुखौटे में भीड़ को अपनी ओर खींचते और उन खेलों के बारे में जागरुकता पैदा करता शेरा जिनका आगाज़ तकरीबन एक पखवाड़े पहले हुआ और जो शानदार तरीके से संपन्न हुए.

शेरा से अलग हमारे अधिकतर एथलीटों को कोई मुखौटा लगाने की ज़रूरत नहीं थी और न ही उन्हें अपने चेहरे छुपाने थे जब वे स्वर्ण पदकों की दौड़ में गए.

भारत ने खिलाड़ियों का ऐसा प्रदर्शन पहले कभी नहीं देखा.

भारत को ऐसे खिलाड़ियों पर गर्व है और उन्हें भारतीय होने पर. राष्ट्रमंडल खेलों की कहानी एक ऐसे देश की कहानी है जिसकी महत्वाकांक्षा विश्व शक्ति बनने की है और जिसकी आर्थिक विकास दर बाकी दुनिया के लिए ईर्ष्या का सबब है.

Image caption शेरा बने सतीश को अब रोज़गार की तलाश करनी है

यह एक ऐसे देश की कहानी है जिसने एक बड़े खेल का सफलतापूर्वक आयोजन करके और पदकों का शतक पूरा करके दुनिया को दिखा दिया है कि वह वैश्विक मंच पर ज़ोरदार तरीके से पहुंच चुका है.

फिलहाल इस समय कोई भी खेलों के नाम पर खर्च करोड़ों रूपए की बात नहीं कर रहा है और देश को या यहां खेलों के लंबे समय तक मिलने वाले फायदों की बात कोई नहीं कर रहा है.

शेरा का मुखौटा लगाने वाले सतीश बिदला रोमांचित हैं कि उनको एक ऐसा बड़ा मौका मिला जहां उनकी मौजूदगी ने माहौल बदलने और आयोजन को सफल बनाने में योगदान दिया.

एक और भारत

हमारे लिए दुर्भाग्य की बात है कि यह शेरा उस भारत का प्रतिनिधित्व करता है जिस तक देश की आर्थिक तरक्की का फायदा नहीं पहुंचा है. वह बेरोज़गार है. देश के लिए कुछ कर पाने पर खुश है, वह अब अपनी जीविका की तलाश में जा रहा है.

वह इस बात के लिए आशावादी है कि खेलों की सफलता में उसके योगदान से ऐसा नतीजा मिलेगा जिसका मायने उसके लिए कहीं अधिक होगा.

बेहतर भविष्य की आस लिए शेरा कोई अकेला नहीं है. उसके सपने में वे हज़ारों खिलाड़ी भी साझीदार हैं जिन्होंने घरेलू ग़रीबी, तंत्र की उदासीनता और सुविधाओं के अभाव के बावजूद भारत का प्रतिनिधित्व किया.

इनमें से अधिकतर खिलाड़ी गांवों और छोटे कस्बों से थे और जिन्होंने जीविका के लिए संघर्ष किया.

इनमें से कुछ अपनी गरीबी के कुचक्र को तोड़कर 'गर्व' का प्रतीक बनने में सफल हुए, चाहे वह महिला पहलवान गीता हों या फिर एथलीट प्रजुशा. यह किसी चमत्कार से कम नहीं.

ये सभी हमें फिर से याद दिलाते हैं कि वैश्विक भूखमरी सूचकांक में भारत का स्थान 67वां है और 40 फ़ीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है.

इन खेलों के साथ दिल्ली विश्व स्तरीय सुविधाओं के साथ तैयार हुआ और भारत ने अपनी समृद्ध धरोहर और संस्कृति का प्रदर्शन किया तो वहीं शेरा की कहानी भारत के लिए अब खेलों की पहचान बन चुकी है. यह सब कुछ करने के लिए बस ज़रूरत है सतह को खुरचने भर की.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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