आसान नहीं सफलता की राह

सायना नेहवाल
Image caption बैडमिंटन खिलाड़ी सायना नेहवाल के पिता उन्हें प्रैक्टिस के लिए पच्चीस किलोमीटर स्कूटर पर बिठा कर ले जाते थे.

गुआंज़ू, चीन, में 12 नवम्बर से सोलहवें एशियाई खेल शुरु हो रहे हैं. अक्तूबर में नई दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय खिलाड़ियों के शानदार प्रर्दशन के बाद एशियाई खेलों में उनसे उम्मीदें काफ़ी बढ़ गई है.

इन खिलाड़ियों की सफलता के पीछे उनकी ख़ुद की मेहनत और जुनून के साथ ही परिवार का बड़ा हाथ रहा है. बीबीसी ने पदक के उम्मीदवार कुछ खिलाड़ियों के परिवारजनों बातचीत की.

भारत की शीर्ष बैडमिंटन खिलाड़ी और दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली सायना नेहवाल के पिता हरवीर सिंह बताते हैं कि सायना ने इस खेल में आठ साल की छोटी उम्र में कदम रखा.

हरवीर सिंह कहते हैं, “मैं रोज़ सुबह सायना को घर से पच्चीस किलोमीटर दूर लाल बहादुर शास्त्री स्टेडियम स्कूटर पर लेकर जाता था. मैंने पाया कि वो मेरे पीछे बैठे-बैठे सो जाती थी और ऐसे में उसके गिरने का ख़तरा भी था. तब मैंने अपनी पत्नी से कहा कि उन्हें भी हमारे साथ चलना पड़ेगा और ये सिलसिला काफ़ी वक्त तक चलता रहा.”

हरवीर सिंह को गर्व है इन मुश्किलों के बावजूद आज बेटी की क़ामयाबी उसे इस मुक़ाम पर ले आई है कि उन्होंने सायना का इंकम टैक्स पचास लाख रुपये भरा है.

Image caption तीरंदाज़ दीपिका कुमारी के पिता ऑटोरिक्शा चलाते हैं जबकि उनकी मां नर्स हैं.

तीरंदाज़ी में व्यक्तिगत रिकर्व वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने वाली अट्ठारह वर्ष की दीपिका कुमारी रांची के एक साधारण परिवार से हैं. उनके पिता शिव नारायण महतो ऑटोरिक्शा चलाते हैं जबकि उनकी मां गीता देवी नर्स हैं.

लेकिन बेटी की तीरंदाज़ी सीखने की लगन को देखकर मां-बाप ने खर्चे की चिंता नहीं करते हुए उसे हमेशा बढ़ावा दिया. शिवनारायण कहते हैं, “जब कोच ने बताया कि इस खेल में तीन-चार लाख रुपये का खर्चा आएगा तो एकबारगी तो मैं घबरा गया कि ये कैसे पूरा होगा. लेकिन फिर मैंने हिम्मत बांध कर दीपिका से कहा कि चलो बेटा हो जाएगा.”

गीता देवी कहती हैं, “लड़की अगर बाहर जाती है तो पास-पड़ोस में थोड़ा बहुत चर्चा होती थी. लेकिन मैं इसे ख़राब नहीं मानती इसलिए हमने कभी इस बारे में ज़्यादा ध्यान नहीं दिया.”

एशियाई खेलों में पांच बार की विश्व चैंपियन महिला मुक्केबाज़ एम सी मेरीकॉम से भी भारत को स्वर्ण पदक की उम्मीद है. मेरीकॉम के पति एन ओनलर कहते हैं कि एक मुक्केबाज़ का पति होने की वजह से अक्सर लोग उन पर तंस किया करते थे.

Image caption पांच बार की विश्व चैंपियन महिला मुक्केबाज़ एम सी मेरीकॉम से एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक की उम्मीद है.

लेकिन ओनलर कहते हैं, “मैरी के और मेरे मां-बाप ने मुझे कहा भी कि शादी और बच्चों के बाद उसे मुक्केबाज़ी छोड़ देना चाहिए. मेरे लिए ये फ़ैसला लेना आसान नहीं था क्योंकि बच्चों को संभालना आसान नहीं होता. लेकिन ये फ़ैसला मैंने मैरी पर ही छोड़ दिया था क्योंकि वो सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं बल्कि देश के लिए भी नाम कमा रही है.”

ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता निशानेबाज़ अभिनव बिंद्रा एक अमीर परिवार से हैं. निशानेबाज़ी के उनके शौक और उसमें उनके हुनर को देखकर उनके पिता ने बचपन से ही उन्हें बढ़िया ट्रेनिंग दिलाई.

अभिनव के पिता ए एस बिंद्रा कहते हैं, “अभिनव को बढ़िया से बढ़िया ट्रेनिंग दिलाने के लिए हमने उसे ग्यारह से पंद्रह साल की उम्र तक हर साल में दो महीने जरमनी भेजा. इसके बाद भी ट्रेनिंग का वही स्तर बनाए रखने के लिए हमने अपने घर में ही उसके लिए विश्व स्तरीय सुविधाओं वाली शूटिंग रेंज बनवा दी.”

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