जाएँ तो जाएँ कहाँ...

मुक्केबाज़ी

मुक्केबाज़ी का स्टेडियम ग्वांगज़ो से बाहर दूसरे शहर फ़ोशान में है जहाँ के लिए सीमित बसें ही हैं, इसलिए हर कोई वहाँ नहीं जा पाया.

कई लोगों ने वहाँ के बजाय एथलेटिक्स में जाने का फ़ैसला किया. वहाँ पहले भारत की प्रीजा श्रीधरन् और कविता राउत ने पदक जीते और फिर भारत की चार गुणा चार सौ मीटर की महिला टीम ने स्वर्ण जीता.

मुक़ाबले ख़त्म हुए मगर भारतीय लोग फ़ोन लगाने में मशगूल रहे कि आख़िर मुक्केबाज़ी में और ख़ासकर विजेंदर के मुक़ाबले में क्या हो रहा है.

जिसका जो भी जानने वाला मुक्केबाज़ी में था वो पल-पल की जानकारी लेकर ब्रेकिंग न्यूज़ की तरह ख़बर फ़्लैश किए जा रहा था.

पहले पता चला कि संतोष कुमार विरोठू हार गए हैं और फिर किसी ने ज़ोर से कहा चलिए भइ विजेंदर जीत गया. तब जाकर लोगों को तसल्ली हुई.

उसके बाद अगले नतीजे के लिए उतनी उत्सुकता नहीं थी और नतीजा बाद में पता चला तो भारत को रजत ही मिला क्योंकि मनप्रीत सिंह हार गए थे.

बीबीसी

वैसे बात थोड़ी आत्मप्रशंसा जैसी ज़रूर लगेगी मगर इतने दिनों तक लगातार अनुभव करने के बाद लिखना ठीक समझा.

खेलों के दौरान पूरे समय गले में तस्वीर, नाम और संगठन के नाम वाला कार्ड लटकाए रखना था. इसलिए भी कि कहीं भी आने-जाने की यही कार्ड कुंजी है और यहाँ आने के लिए मेरा तो यही वीज़ा भी था.

ख़ैर किसी भी खेल में ये तो आम बात है मगर जब भी किसी ने कार्ड को उठाकर ध्यान से देखा या जब भी मुझे कहीं अपना नाम और संगठन का नाम लिखना पड़ा एक बात हर जगह सुनाई पड़ी- ‘अच्छा... आप बीबीसी के लिए काम करते हैं..’

भारत में बीबीसी की जितनी प्रतिष्ठा है, लगा कि उससे कुछ कम यहाँ भी नहीं है. ज़्यादातर वॉलंटियर्स कॉलेज के छात्र-छात्राएँ हैं और जब भी वे बीबीसी का नाम देखते उनकी आँखें आश्चर्य से चौड़ी हो जातीं.

एक दिन देर से काम ख़त्म हुआ और मैं निर्धारित समय के बाद खाना खाने पहुँचा. दरवाज़ा बंद हो चुका था मगर गेट पर खड़े वॉलंटियर ने जब कार्ड पर बीबीसी का नाम देखा तो उसने मुझे अंदर ले जाकर जो फल और मेरे खाने लायक उबली हुई सब्ज़ियाँ मिलीं वो खिलाया.

ऑटोग्राफ़

ये युवा वॉलंटियर्स देश-विदेश से आए हज़ारों एथलीट्स और पत्रकारों से मिलकर भाव-विभोर से हैं.

हर समय चेहरे पर मुस्कान और मदद करने का भाव.

जैसे-जैसे किसी स्टेडियम में सारे मुक़ाबले ख़त्म होते गए वहाँ के वॉलंटियर्स ने मौक़ा निकालकर खिलाड़ियों के साथ फ़ोटो खिंचवाए उनके ऑटोग्राफ़ लिए.

ऐसा ही एक वॉलंटियर मेरे भी पास आ खड़ा हुआ कि आपका ऑटोग्राफ़ चाहिए, मैंने समझाया मैं खिलाड़ी नहीं सिर्फ़ मीडिया में काम करने वाला पत्रकार हूँ. उसने दोहराया- जी मुझे आपका ऑटोग्राफ़ चाहिए.

मुझे लगा शायद मेरी अँगरेज़ी समझ में नहीं आई तो मैंने धीरे-धीरे बोलते हुए फिर समझाने की कोशिश की कि मैं पत्रकार हूँ, खिलाड़ी नहीं हूँ.

जवाब मिला- मैं जानता हूँ मगर मैं आपका ऑटोग्राफ़ चाहता हूँ. उसके बाद उसने अपनी टोपी पर मेरा हस्ताक्षर लिया और ख़ुशी-ख़ुशी आगे बढ़ गया.

देखिए, जहाँ कोई नहीं जानता, कोई नहीं पहचानता उस देश में आकर मैंने ज़िंदग़ी का पहला ऑटोग्राफ़ भी दे दिया.

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