स्वर्णिम हुआ 'विजेंदर का मुक्का'

विजेंदर सिंह
Image caption विजेंदर सिंह ने स्वर्ण पदक हासिल किया

अब तक बार-बार एक क़दम पहले चूक जाने वाले मुक्केबाज़ विजेंदर ने आख़िरकार जीत की दहलीज चूम ही ली.

दोहा में 2006 में हुए एशियाई खेल, बीजिंग में 2008 में हुए ओलंपिक, 2009 में इटली के मिलान में हुई विश्व चैंपियनशिप, 2010 में दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेल- मुक्केबाज़ विजेंदर के लिए एक ही कहानी रही.

सभी मुक़ाबलों में सेमीफ़ाइनल में हार और काँस्य पदक से संतोष.

विजेंदर ख़ुद इस तरह के नतीजों से इतने परेशान हो चुके थे कि उन्होंने दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में हारने के बाद कहा था कि ‘काँस्य पदक को मुझसे प्यार हो गया है, लगता है मेरी क़िस्मत में काँस्य ही लिखा है.’

मगर उन खेलों के एक ही महीने बाद हुए एशियाड में वो क़िस्मत बदल गई.

सोमदेव देववर्मन के अलावा राष्ट्रमंडल खेलों का कोई भी व्यक्तिगत मुक़ाबले का स्वर्ण पदक विजेता ग्वांग्जो में सोना नहीं चूम सका.

सारे दिग्गज जब एक-एक कर धराशायी हो रहे थे विजेंदर सिंह लक्ष्य पर नज़रें लगाए अभ्यास में जुटे थे.

एशियाड में शुरुआत

उनका पहला मुक़ाबला ताइपे के यांग यू टिंग से था जो उन्होंने आसानी से 9-4 से जीत लिया.

क्वॉर्टर फ़ाइनल में उनका सामना हुआ कोरिया के चो देओक्जिन से और उन्होंने वहाँ भी 13-2 से आसान जीत दर्ज की.

अब विजेंदर के सामने था सेमीफ़ाइनल. प्रतियोगिता का वो पड़ाव जहाँ से आगे बढ़ना उनके लिए जैसे टेढ़ी खीर हो चुका था.

इस बार प्रतिद्वन्द्वी थे ईरान के मोहम्मद सत्तारपुर. सेमीफ़ाइनल में सुरंजय सिंह और विश्व चैंपियन एमसी मैरीकॉम जैसे बड़े-बड़े नाम हारकर बाहर हो चुके थे.

विजेंदर रिंग में उतरे और जब पहला दौर ख़त्म होने का संकेत हुआ तो मोहम्मद सत्तारपुर 2-1 से आगे चल रहे थे.

भारतीय खेल प्रेमियों के दिल में एक डर समाने लगा कि क्या एक बार फिर विजेंदर का सपना टूटने वाला है मगर दूसरे दौर में उन्होंने वापसी की. दूसरा दौर ख़त्म हुआ तो विजेंदर 5-4 से आगे थे, मगर ख़तरा टला नहीं था क्योंकि सिर्फ़ एक ही अंक की बढ़त थी.

तीसरे दौर में विजेंदर ने अपना रंग दिखाया और मुक़ाबला 10-7 से जीत लिया. वो पड़ाव अब पार हो चुका था मगर मंज़िल अब भी दूर थी.

आख़िरी पड़ाव

फ़ाइनल में विजेंदर का मुक़ाबला होना था उज़बेकिस्तान के अब्बोस अतोएव से. वही अब्बोस जिन्होंने विजेंदर को पिछले साल की विश्व चैंपियनशिप में सेमीफ़ाइनल में 7-3 से हराकर काँस्य पदक पर रोक दिया था.

विजेंदर से पहले भारत के संतोष कुमार विरोठू को कज़ाख़स्तान के प्रतिद्वन्द्वी ने 16-1 से बुरी तरह पछाड़ दिया था, ऐसे में विजेंदर के सामने लोगों और ख़ुद अपनी उम्मीद पर खरा उतरने की चुनौती थी.

टूर्नामेंट में अब तक संयम बनाकर खेल रहे विजेंदर ने पहले राउंड में 2-0 से बढ़त ली.

दूसरे में उसे विजेंदर ने बढ़ाकर 5-0 किया और तीसरे में 7-0 के स्कोर पर जब मुक़ाबला ख़त्म होने का संकेत हुआ तो विजेंदर का काँस्य से नाता टूट चुका था.

उन्होंने फ़ाइनल खेल रहे दो बार के विश्व चैंपियन अपने प्रतिद्वन्द्वी को एक भी अंक नहीं लेने दिया.

विजेंदर अब चैंपियन थे, सोने का तमग़ा उनके गले में पड़ा. उनकी वजह से मुक्केबाज़ी के स्टेडियम में भारत का तिरंगा ऊपर चढ़ा, राष्ट्रधुन बजी.

मुक़ाबला देखने आए भारतीयों के चेहरे पर गर्व साफ़ था और एक संतोष कि उनके हीरो ने उन्हें और देश को इस बार निराश नहीं किया.

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