कमियों के बावजूद रेफ़रल सिस्टम ज़रूरी

Image caption टीवी रिप्ले के दौर में अंपायरों के निर्णय लगातार विवादों के केंद्र में रहे हैं

अंपायर डिसीजन रेफ़रल सिस्टम से जुड़ी टेक्नॉलॉजी को लेकर सचमुच कई भ्रांतियाँ हैं लेकिन यह मेरी समझ से बाहर है कि दक्षिण अफ्रीका के साथ खेले जाने वाले टेस्ट मैचों में उसके इस्तेमाल से भारत ने इनकार क्यों किया है.

किसी को भी ये बात समझ में आती है कि एलबीडब्ल्यू की अपील के मामले में गेंद जब बल्लेबाज़ के पैड पर लगती है तो उसकी ऊँचाई और लाइन को मापने के लिए जिस ट्रैकिंग सिस्टम का प्रयोग किया जाता है वह त्रुटिरहित नहीं है.

यही वजह है कि कई विशेषज्ञों और खिलाड़ियों को लगता है कि इस सिस्टम पर भरोसा करना ठीक नहीं है, जब तक पूरी तरह से विश्वसनीय और सटीक सिस्टम न आ जाए तब तक यही बेहतर होगा कि बल्लेबाज़ के आउट होने के बारे में निर्णय अंपायर पर छोड़ दिया जाए.

कई लोगों का ये भी मानना है कि क्रिकेट से जुड़े ढेर सारे नियम-क़ानून हैं जो पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं, ऐसी स्थिति में अंपायर डिसीजन रेफ़रल सिस्टम का इस्तेमाल करना कोई ख़ास मददगार नहीं होता बल्कि खेल के प्रवाह को ही बाधित करता है.

वैसे भी अगर अंपायर को अपने निर्णय पर 90 प्रतिशत तक भरोसा है तो ऐसी किसी टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल करने का क्या तुक है जो बाक़ी की 10 प्रतिशत शंका का पूरा निराकरण न कर सकता हो.

ऐसा माना जा रहा है कि क्रिकेट बोर्ड के इस निर्णय के पीछे भारतीय टीम के वरिष्ठ खिलाड़ी हैं जिनका अनुभव इस सिस्टम के साथ बुरा रहा है. भारतीय खिलाड़ियों ने एक ही बार इस तकनीक का इस्तेमाल श्रीलंका में टेस्ट सिरीज़ के दौरान किया था और वे इससे नाख़ुश थे.

बिल्कुल अकेला है भारत

इन सारे तर्कों के बावजूद एक बात याद रखनी चाहिए कि भारत टेस्ट क्रिकेट खेलने वाला अकेला देश है जिसने इस रेफ़रल सिस्टम के इस्तेमाल से मना किया है, बाक़ी सभी देश इसे स्वीकार कर चुके हैं.

Image caption 'सचिन ग़लत निर्णय को स्वीकार करके आगे बढ़ सकते हैं, उनके भारतीय प्रशंसक नहीं'

इसे स्वीकार करने वाले देशों का मानना है कि भले ही यह पूरी तरह त्रुटिरहित सिस्टम न हो लेकिन जब तक कुछ इससे बेहतर उपलब्ध नहीं होता तब तक अंपायर की मानवीय ग़लतियों को न्यूनतम स्तर पर लाने के लिए यही सबसे अच्छा सिस्टम है.

यह भी याद रखना चाहिए कि क्रिकेट खेलने वाले सभी देशों के मुक़ाबले भारत में अंपायर के ग़लत फ़ैसले पर सबसे अधिक हायतौबा मचती है, जैसा हमारा नारे लगाने वाला मीडिया है उसकी मदद से हर ग़लत फ़ैसला राष्ट्रीय हाहाकार का कारण बन जाता है.

इसकी ताज़ा मिसाल सिडनी टेस्ट है जहाँ अंपायर स्टीव बकनर की ग़लतियों की वजह से पूरा दौरा ही ख़तरे में पड़ता दिख रहा था, अंपायर के ग़लत फ़ैसले को भुलाकर सचिन तेंदुलकर आगे बढ़ सकते हैं लेकिन उनके भारतीय प्रशंसक नहीं.

दक्षिण अफ्रीका के साथ होने वाली टेस्ट सिरीज़ काफ़ी अहम है और कोई नहीं चाहेगा कि अंपायर के ग़लत फ़ैसलों या विवादों की वजह से बुरा माहौल बने.

यहाँ भारत का नंबर वन टेस्ट स्टेटस दाँव पर लगा है, भारत दक्षिण अफ्रीका को उसी की ज़मीन पर न हराए तो नंबर होने का क्या मतलब है.

यही वजह है कि मैं मानता हूँ कि भारत को अंपायर डिसीज़न रेफ़रल सिस्टम को स्वीकार कर लेना चाहिए जिस तरह दुनिया के बाक़ी क्रिकेट खेलने वाले देशों ने किया है.

अपनी ख़ामियों के बावजूद यह सिस्टम ग़लती की आशंकाओं को घटाता ज़रूर है, टीवी रिप्ले के ज़माने में जबकि इसी टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल करके लोग निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि अंपायर ने ग़लत निर्णय किया है, तो फिर उसी टेक्नॉलॉजी का प्रयोग निर्णय लेने में क्यों नहीं किया जाए.

मैं समझता हूँ कि भारत के कई वरिष्ठ खिलाड़ी इसके ख़िलाफ़ क्यों हैं लेकिन धारा के विपरीत जाने के क्रिकेट बोर्ड के निर्णय में कोई फ़ायदा नहीं है.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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