सचिन के ख़्वाब पर दबाव

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आजकल ये बहस ख़ूब चल रही है कि विश्व कप किसी एक खिलाड़ी का होता है या राष्ट्र का. संदर्भ भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का बयान है और प्रसंग है ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान स्टीव वॉ की इस बयान को लेकर व्याख्या.

पिछले कई दिनों से भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और टीम के बाक़ी खिलाड़ी इस बात का ढोल पीटते नहीं अघा रहे हैं कि वे सचिन के लिए ये विश्व कप जीतना चाहते हैं.

बात अच्छी है. सचिन के लिए क्या किसी भी क्रिकेटर के लिए इससे बड़ी क्या बात हो सकती है. विश्व कप जीतना हर टीम और टीम के खिलाड़ी का सपना होता है.

टीम के कई खिलाड़ी विश्व कप जीतकर सचिन के प्रति सम्मान प्रदर्शित करना चाहते हैं, तो ये कोई बुरी बात नहीं.

लेकिन स्टीव वॉ के बयान को देखें तो उनकी बात में भी दम है और इसे सिर्फ़ ऑस्ट्रेलिया की ओर से मानसिक गेम की शुरुआत भर मानना जल्दबाज़ी होगी.

स्टीव वॉ ने सिर्फ़ इतना ही कहा है कि भारतीय टीम इस तरह के बयानों से विश्व कप नहीं जीत सकती, उसे सचिन से इतर भी सोचना चाहिए.

क्या ग़लत कह दिया भाई. स्टीव वॉ ने एक अहम बात कही है. इसको परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है न कि सचिन की देशभक्ति और उनकी लोकप्रियता पर सवाल के रूप में.

दबाव

सबको पता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में हो रहे इस विश्व कप को जीतने का ख़्वाब कितने दिनों से देखा जा रहा है. भारतीय टीम इस समय ज़बरदस्त फ़ॉर्म में है और बेहतरीन प्रदर्शन के दौर में.

स्टीव वॉ को गरियाने वाले मीडिया के एक वर्ग को ये बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि यही स्टीव वॉ भारत को ख़िताब का प्रबल दावेदार भी मान चुके हैं.

एक दिवसीय क्रिकेट में भारत का दम कोई नई चीज़ नहीं है, लेकिन बड़े मैचों में पिटना और बड़ी प्रतियोगिता में फिसड्डी साबित होना भी भारत से कोई सीखे.

इसके पीछे वजह जो भी हो, भारतीय टीम को इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए फ़ील्ड पर ज़ोर लगाना होगा. उन्हें एक महान खिलाड़ी पर अनावश्यक दबाव पैदा करने से बचना चाहिए.

चलिए थोड़ा फ़्लैश बैक में चलते हैं. वर्ष 2007 के विश्व कप में भारत के शुरुआती दौर में ही पिटने के बाद मुर्दनी छाई हुई थी. सचिन का राग अलापने वाली मीडिया उन पर सवाल उठा रही थी और कई युवा क्रिकेटर टीम में अनुभवी खिलाड़ियों को किनारे करके क्रांति लाने की बात कर रहे थे.

सचिन और बाक़ी खिलाड़ियों के पुतले जलाए जा रहे थे, पोस्टर फाड़े जा रहे थे. उस दौरान मैं भी वेस्टइंडीज़ में मौजूद था. टीम के होटल की लॉबी में जाकर अंदाज़ा होता था कि एक अरब से ज़्यादा आबादी वाले देश के अरमान का गला घोंटने का ग़म क्या होता है.

मुझे याद है कि कैसे मीडिया में सचिन के संन्यास की कहानी लिख दी गई थी. लेकिन बुरे विश्व कप प्रदर्शन के कुछ ही दिनों बाद सारी आलोचनाओं पर चुप्पी साधते हुए ये मास्टर ब्लास्टर नेट्स पर पसीना बहाने पहुँच चुका था.

आँखों में सपने थे, दृढ़ इच्छाशक्ति थी और उनको पूरा करने का जज्बा था. आज उस इच्छाशक्ति और सपने को सच करने का समय है.

अब ये बताने की भी आवश्यकता नहीं कि सचिन ने 2007 के बाद एक दिवसीय क्रिकेट कितने इतिहास रचे हैं.

जीतना ज़रूरी

बहस का विषय ये भी नहीं है कि क्रिकेट का ये मास्टर वनडे से संन्यास लेगा या नहीं, बहस का विषय ये है कि विश्व कप जीतने का सपना सँजोए इस महान क्रिकेटर पर कप्तान धोनी समेत कई खिलाड़ी अनावश्यक दबाव क्यों डाल रहे हैं.

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Image caption सचिन युवा क्रिकेटरों में भी काफ़ी लोकप्रिय हैं

सचिन न सिर्फ़ इस बेहतरीन टीम का हिस्सा हैं, बल्कि उनके कंधों पर ज़िम्मेदारियों और उम्मीदों का पहाड़ है. ऐसे में टीम उनका साथ दे न कि ऐसे बयान देकर उन पर दबाव बढ़ा दे.

तर्क देने वाले तर्क देंगे कि सचिन जैसे खिलाड़ी को इतना अनुभव है कि उन पर इसका कुछ असर नहीं पड़ता. लेकिन मुझे याद है कि 2007 के विश्व कप के बाद सचिन ने भी माना था कि देश की जनता की उम्मीदें खिलाड़ियों पर दबाव बनाती हैं.

और इस बार तो खिलाड़ी को उन्हें वो विश्व कप समर्पित करने की बात पहले से ही करने लगे हैं, जो उन्होंने जीता नहीं है.

ये सब उदाहरण और धोनी-स्टीव वॉ के बयान का प्रसंग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ख़िताब जीतने की एक प्रबल दावेदार टीम को अपने एक कद्दावर खिलाड़ी का ख़्याल करना चाहिए.

महेंद्र सिंह धोनी और कंपनी विश्व कप जीतने और ट्रॉफ़ी उठाने के बाद उसे महान सचिन तेंदुलकर को समर्पित करेगी, तो कोई स्टीव वॉ उन पर सवाल नहीं खड़े करेगा.

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