अंत 'बला' तो भला कैसे

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हिंदी में एक कहावत है अंत भला तो सब भला. ये कहावत दक्षिण अफ़्रीकी टीम के लिए बिल्कुल सटीक है. भारत के ख़िलाफ़ मैच में जिस तरह उन्होंने मैच का अंत किया, उसमें उनका भला तो होना ही था.

लेकिन भारत की बात करें, तो टीम सारे मुहावरों और लोकोक्तियाँ को झुठलाने पर आमादा है, तो आप और हम क्या कर सकते हैं.

टीम दक्षिण अफ़्रीका से हार गई. मैच रोमांचक हुआ और आख़िरी ओवर तक गया. मैच है, मैच में कोई न कोई तो हारेगा ही, इस तर्क से चलें तो हार सामान्य है, असमान्य कुछ नहीं.

लेकिन हार के कारणों का विश्लेषण करें, तो ये हार कई मायनों में असामान्य है और असाधारण भी. इस पर बात बाद में करेंगे, पहले चर्चा नेहरा के उस आख़िरी ओवर की, जिस पर हाय-तौबा मची हुई है.

सोशल नेटवर्किंग साइट्स फ़ेसबुक और ट्विटर पर नेहरा और धोनी विलेन बने हुए हैं. स्वाभाविक है आम क्रिकेट प्रेमियों का ग़ुस्सा. लेकिन बड़े-बड़े पत्रकार और क्रिकेट के तुर्रम ख़ाँ नेहरा से भरे पड़े हैं, तो बात कुछ ख़ास हो जाती है.

पिट सकता है दाँव

क्रिकेट में फ़ैसला लेते समय एक दाँव खेला जाता है. कप्तान धोनी ने नेहरा को लेकर एक दाँव खेला था, वो दाँव ग़लत हुआ....दाँव कभी-कभी हिट भी होते हैं, तो कभी पिट भी सकते हैं.

नेहरा के आख़िरी ओवर को उसी अर्थ में देखने की आवश्यकता है. जब आख़िरी दो ओवर में 17 रन बनाने हो और सामने वाले खिलाड़ी के गँवाने के लिए कुछ नहीं, तो बल्ला बिना लय-ताल के चलेगा और फिर रन भी बन सकते हैं.

लोगों को याद होगा कि पहले ट्वेन्टी-20 विश्व कप में कैसे कप्तान धोनी ने जोगिंदर शर्मा से आख़िरी ओवर कराया था और वो ओवर हिट रहा था. जोगिंदर को तो कोई अनुभव भी नहीं था.

इसलिए नेहरा को आख़िरी ओवर दिए जाने की आलोचना का कोई तर्क नहीं समझ में आता. इसकी क्या गारंटी थी कि भज्जी को ओवर दिया जाता तो रन नहीं बनते और लोगों को ये भी याद रखना चाहिए कि बैटिंग पावर प्ले के दौरान ज़हीर के एक ओवर में 17 रन बने थे.

इसलिए पूरे मैच के नतीजे को एक ओवर से तौलना जायज़ नहीं. धोनी ने नेहरा को गेंद दी, दाँव ग़लत हुआ.

अब आशीष नेहरा के आख़िरी ओवर से निकलकर पूरे मैच पर नज़र डालते हैं. सच पूछिए तो भारतीय टीम की हार की असली वजह ख़राब बल्लेबाज़ी रही.

बल्लेबाज़ी

अगर भारतीय क्रिकेट टीम और क्रिकेट के प्रकांड पंडित ये समझते हैं कि भारतीय टीम अपनी गेंदबाज़ी की बदौलत विश्व कप जीत लेगी, तो वे ग़लत समझ रहे हैं.

दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ मैच में भारतीय टीम ने क़रीब 50 रन कम बनाए और ये बात भी मत भूलिए की पूरी टीम आठ गेंद रहते ही आउट हो गई. मैच का आकलन करते समय इन आठ गेंदों की अहमियत की अनदेखी नहीं करनी चाहिए.

और ऐसा क्यों हुआ- भारतीय बल्लेबाज़ों के कारण. एक बल्लेबाज़ ख़राब खेले तो बात समझ में आती है. सचिन चार मैचों में न चलें, तो भी बात समझ में आती है, युवी एक सीज़न ख़राब खेलें, बात फिर भी समझ में आती है.

लेकिन नौ खिलाड़ी सिर्फ़ 29 रन पर आउट हो जाएँ, तो बात बिल्कुल समझ में नहीं आती. जो बात समझ में आती है, वो ये कि कहीं न कहीं कुछ न कुछ गड़बड़ है.

और इस ग़लती को किसी भी स्थिति में सही नहीं ठहराया जा सकता. आख़िरी 10 ओवर में कम रन बनाने और ज़्यादा विकेट गँवाने में भारतीय टीम धीरे-धीरे महारत हासिल करती जा रही है.

याद कीजिए पाकिस्तान और न्यूज़ीलैंड के बीच मैच का, जिसमें आख़िरी कुछ ओवरों में न्यूज़ीलैंड ने इतने रन बनाए कि शोएब अख़्तर और अब्दुल रज़्ज़ाक़ जैसे गेंदबाज़ की लाइन और लेंग्थ बिगड़ गई.

आख़िरी ओवरों का सच

लेकिन भारतीय टीम आख़िरी ओवरों में ऐसे पिटती है, जैसे बल्लेबाज़ों को इन ओवरों की अहमियत ही नहीं पता. और तो और बैटिंग पावर प्ले भी टीम के लिए काल साबित हो रहा है.

Image caption नेहरा अकेले हार के ज़िम्मेदार नहीं

टीम को इनसे उबरने की आवश्यकता है. भारतीय टीम की फ़ील्डिंग भी आकर्षक नहीं है. एकाध खिलाड़ियों को छोड़ दिया जाए, तो एक रन को दो और दो को तीन बनवाने की कला कोई भारतीय क्षेत्ररक्षकों से सीखे.

दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ मैच में यही हुआ. बल्लेबाज़ों ने लुटिया डुबोई. 50-60 रन कम बनाए और फिर अपनी ख़राब फ़ील्डिंग से 30-40 अतिरिक्त रन दे दिए.

भारतीय टीम के लिए अभी इस विश्व कप में बहुत कुछ बाक़ी है. आवश्यकता इस बात की है कि टीम आख़िरी ओवरों में ज़बरदस्त बल्लेबाज़ी करे. मैच की पहली गेंद पर चौका मार कर शुरुआत करने से मैच का सही अंत नहीं होता.

सामने वाला आपकी आख़िरी गेंद पर छक्का भी लगा सकता है. इसे रोकना है तो 'फ़िनिशिंग' दमदार होनी चाहिए.

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