होनी, अनहोनी और धोनी

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पिछले दिनों यू-ट्यूब पर आया वीडियो फ़ेसबुक, ट्विटर और ईमेल के माध्यम से कई दिनों तक घूमता रहा. भारत के विश्व कप जीतने के बाद यह वीडियो एकाएक ख़ूब चर्चा में आया.

एक टीवी चैनल के कर्ता-धर्ता ने फ़ेसबुक पर लिखा कि कुछ बरस पहले कुछ लंपट किस्म के लोग ये वीडियो उनके पास लेकर आए थे और इसके लिए पैसे भी मांग रहे थे.

चलिए बातों को ज़्यादा विस्तार न देते हुए ये बताते हैं कि वो वीडियो किसका था. दरअसल ये वीडियो काफ़ी पहले का है, जब धोनी चर्चा में नहीं थे. इस वीडियो में वे अपने कॉलेज के ज़माने के दोस्तों के साथ बोलने, बतियाने में मशगूल हैं. इसमें गाली-गलौज भी है.

देखने वालों को कुछ शब्दों पर आपत्ति हो सकती है और लोग उनके मित्रों को लंपट किस्म का बता सकते हैं. लेकिन यह वीडियो धोनी के व्यक्तित्व का आईना भी है. धोनी को अपने दोस्तों की गाली सुनते देख कुछ लोगों को ये वीडियो अजीब लग सकता है, ये बात भी अजीब लग सकती है कि कहाँ से उठकर धोनी कहाँ आ गए.

सबको झुठला दिया धोनी ने

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Image caption 2003 के विश्व कप में हार और इसबार जीत में फ़र्क सिर्फ़ धोनी का नेतृत्व ही है.

कटु सच्चाई ये भी है कि मीडिया का एक अभिजात्य वर्ग अब भी ये पचा नहीं पाया है कि धोनी ने भारतीय क्रिकेट को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया है.

अपने मीडिया के मित्रों से मुझे पता चला था कि कैसे कुछ टीवी चैनल भारतीय टीम की हार की स्थिति में कप्तान धोनी को निशाना बनाने की पूरी तैयारी कर चुके थे....शीर्षक तैयार थे और धोनी की कप्तानी को श्रद्धांजलि देने वाले कार्यक्रम की रूपरेखा भी तैयार थी.

लेकिन अपने दोस्तों के बीच सीधे-सादे लगने वाले इस शख़्स ने सबको झुठला दिया. धोनी ने दुनिया को दिखाया कि कैसे छोटे-छोटे शहरों से आए क्रिेकेटरों में आस्था दिखाने से नतीजे बदले जा सकते हैं.

वर्ष 2003 में भी भारतीय टीम विश्व कप के फ़ाइनल में पहुँची थी. अनुभव और उस साल की टीम को देखें तो 2003 की टीम 2011 की टीम पर बीस ही पड़ती उन्नीस नहीं. फिर भी अगर 2003 की टीम विश्व कप में हारी और 2011 में जीती, तो अंतर टीम के नेतृत्व में ही था.

गांगुली की कप्तानी

Image caption सौरभ गांगुली में धोनी के मुक़ाबले संयम की कमी थी.

ये कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं कि सौरभ गांगुली ने टीम को आक्रामक होना सिखाया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई मैच जीतकर भारतीय टीम का लोहा मनवाना शुरू किया. कई लोग तो मौजूदा टीम की जीत का कुछ श्रेय सौरभ गांगुली को भी देना चाहते हैं.

लेकिन फिर भी 2003 की टीम हारी तो अंतर नेतृत्व का इसलिए था क्योंकि गांगुली में धोनी के मुक़ाबले संयम की कमी थी.

सौरभ गांगुली का बड़ा प्रशंसक होने के बावजूद मुझे ये कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं कि गांगुली के नेतृत्व में टीम में गुटबाज़ी भी ख़ूब हुई और इसी का नतीजा था वर्ष 2007 के विश्व कप में टीम का बिखर जाना.

वर्ष 2007 का विश्व कप किसी भी भारतीय क्रिकेट प्रेमी के लिए बहुत बुरे सपने की तरह है, जो कभी उसे याद करना नहीं चाहते. लेकिन इसी विश्व कप के बाद भारतीय टीम में ऐसा बदलाव आया, जिसने 2011 के विश्व विजय की इबारत लिखी.

2007 में जब ट्वेन्टी-20 विश्व कप का आयोजन हुआ तो सचिन, गांगुली और द्रविड़ ने उस प्रतियोगिता से अपना नाम वापस ले लिया. फिर भारतीय क्रिकेट चयन समिति ने महेंद्र सिंह धोनी को कप्तान बनाया.

धोनी की दृढ़ता

कई लोगों को ये बात नहीं पची कि टीम में वीरेंदर सहवाग के रहते धोनी को कप्तानी क्यों सौंपी गई. लोग ये सोचकर कि होनी को कौन टाल सकता है, मानने लगे कि 50 ओवरों के विश्व कप में दुर्दशा के बाद भारतीय टीम का बुरा वक़्त और लंबा चलेगा.

लेकिन धोनी ने कम अनुभवी और कई युवा खिलाड़ियों के बलबूते अनहोनी कर दिखाई. धोनी ने यह भी दिखाया कि कप्तान फ़ैसले लेता है और उन फ़ैसलों की ज़िम्मेदारी भी, भले ही टीम हारे या जीते.

धोनी की इस दृढ़ता ने साथी खिलाड़ियों में विश्वास भर दिया. किसे पता था कि जोगिंदर शर्मा जैसा नौसिखिया गेंदबाज़ न सिर्फ़ भारत को जीत दिलवाएगा बल्कि ख़िताब भी दिलवा देगा.

धोनी की धमाकेदार एंट्री से ये लगने लगा था कि जल्द ही उन्हें एक दिवसीय मैचों की कमान भी मिलेगी. 2007 के विश्व कप के हार को धोने को तैयार बैठे खिलाड़ियों को ऐसा नेतृत्व मिला, जिसने सबकी मन मांगी मुरादें पूरी कर दी.

उपलब्धियां

धोनी की कप्तानी में ऐसे मौक़े भी आए जब उन्हें आलोचनाओं का प्रहार झेलना पड़ा. मुझे याद है ऐसे ही एक मौक़े पर धोनी ने कहा था- मुझे आप मौक़ा तो दें. मैं एक टीम तैयार कर रहा हूँ, जिन्हें खिलने में थोड़ा समय लगेगा. आप भरोसा रखिए. हम 2011 के विश्व कप को देखते हुए तैयारी कर रहे हैं. हम आपको निराश नहीं करेंगे.

वर्षों पहले उनके इस बयान को शायद ही किसी ने गंभीरता से लिया होगा, लेकिन शांत और संयमी धोनी अंदर ही अंदर एक सपना पालते रहे. उनकी कप्तानी में टीम ने कई उपलब्धियाँ हासिल की.

सबसे बड़ी उपलब्धि थी वर्ष 2008 के शुरू में तीन देशों की प्रतियोगिता में ऑस्ट्रेलिया को ऑस्ट्रेलिया में जाकर हराना. 2008 में टेस्ट टीम की कप्तानी मिली तो बॉर्डर-गावसकर ट्रॉफ़ी भी भारतीय टीम जीती.

उनकी कप्तानी में भारतीय टीम आईसीसी की टेस्ट रैंकिंग में पहली बार पहले नंबर पर पहुँची और अब भी पहले नंबर पर बनी हुई है. अब भारतीय टीम ने 2007 के विश्व कप की बुरी यादों को धोते हुए विश्व कप भी जीत लिया है.

कप्तानी का जलवा

इंडियन प्रीमियर लीग में धोनी की कप्तानी का जलवा चल चुका है. उन्होंने पिछले साल अपनी टीम चेन्नई सुपर किंग्स को आईपीएल का ख़िताब दिलवाया और फिर ट्वेन्टी-20 चैम्पियंस लीग भी जीती.

2011 की चैम्पियन टीम की कहानी लिखते समय धोनी का नाम सबसे ऊपर आएगा. ऐसा कप्तान, जिसने टीम को इस तरह का नेतृत्व दिया जिससे हर खिलाड़ी को ऐसा अहसास था कि कप्तान उनके साथ खड़ा है. अच्छे प्रदर्शन के समय और बुरे प्रदर्शन के समय भी.

विश्व कप के दौरान पीयूष चावला को मौक़ा देने की बात हो या फ़ाइनल में श्रीसंत को 11 खिलाड़ियों में शामिल करने की बात हो, धोनी हर समय अपने फ़ैसले की ज़िम्मेदारी लेते रहे चाहे उसका नतीजा हार हो या जीत. एक मौक़े पर उन्होंने यह भी माना कि मोहाली में अश्विन को मौक़ा न देना उनकी भूल थी.

ये होता है एक कप्तान का स्टैंड. ग़लती स्वीकार करना और ज़िम्मेदारी लेना. क्यों न पीयूष चावला, अश्विन या फिर श्रीसंत इस कप्तान के लिए जी-जान लगाना चाहेंगे.

बुरे वक़्त का साथी

युवराज के बुरे वक़्त में उनके साथ खड़े रहने वाले धोनी ही थे. धोनी को विश्वास था कि अगर भारत को ख़िताब जीतना है तो सचिन के साथ-साथ युवराज का टीम में रहना ज़रूरी है. युवराज टीम में रहे और फिर उन्होंने अपने कप्तान के भरोसे को कैसे जिया, ये सबको पता है.

युवराज ही नहीं, सुरेश रैना जैसे खिलाड़ी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमकाने में धोनी का ही हाथ है. मुनाफ़ पटेल में फिर से आस्था दिखाने वाले धोनी ही हैं. आरपी सिंह और प्रवीण कुमार जैसे खिलाड़ियों को मौक़े देने पर उन्होंने मीडिया की आलोचना भी सही. तो यूसुफ़ पठान को भी निखारने में धोनी की अहम भूमिका रही. छोटे शहरों के कई बड़े खिलाड़ियों को धोनी अंतरराष्ट्रीय मंच पर खींच पर लाए.

विश्व कप के फ़ाइनल में जब सचिन और सहवाग आउट हो गए तो बड़ी संख्या में क्रिकेट प्रेमियों ने जीत की उम्मीद छोड़ दी. लेकिन धोनी आए और ऐसे आए कि फिर जिताकर मैदान से वापस गए. ये होता है कप्तान का दम.

तभी तो सौरभ गांगुली उन्हें सर्वकालिक महान कप्तान मानते हैं और मास्टर ब्लास्टर सचिन भी कहते हैं वे जिन-जिन कप्तानों के अधीन खेलें हैं, उनमें धोनी सर्वश्रेष्ठ हैं.

सचिन ने वर्षों पहले विश्व कप जीतने का सपना देखा था, लेकिन उनके सपने को पूरा किया कप्तान धोनी ने. धोनी शायद दुनियाभर के खिलाड़ियों या कप्तानों से इसलिए भी अलग हैं क्योंकि वे सिर्फ़ सपना देखते नहीं, उसे पूरा भी करते हैं.

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