आईपीएल पर चुप्पी क्यों

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भारतीय क्रिकेट टीम का शीर्ष से तय लग रहे पतन का, अगर इसे पिछले दो टेस्ट मैचों में उनके प्रदर्शन से आँका जाए, तो इसका कई तरह से विश्लेषण हो रहा है और हो सकता है.

कारणों में, अति व्यस्त दौरों के कारण थके होने से लेकर नई पीढ़ी के खिलाड़ियों के बदली हुई परिस्थितियों में खरे होने की क्षमता का नहीं हो पाना जैसी बातें गिनाई जा सकती हैं.

हो सकता है कि ये सारे कारण सही हों मगर जो चीज़ सबसे चौंकाती है या जो वास्तव में बिल्कुल नहीं चौंकानेवाली बात है, वो ये है कि कोई भी आईपीएल को दोष नहीं दे रहा जिसने कि लगभग आधी भारतीय टीम को निगल लिया और आगे की लड़ाई के लिए अनफ़िट छोड़ दिया.

याद दिलाने के लिए, क्योंकि इन दिनों याददाश्त टी-20 खेलों की तरह छोटी होती जा रही है, इस साल आईपीए उस विश्व कप के ठीक बाद हुआ जिसे भारत ने पूरे हक़ से जीता.

ज़हीर, सहवाग और गंभीर जैसे टीम के प्रमुख खिलाड़ी, पहले से ही, बल्कि विश्व कप के दौरान भी चोट से जूझ रहे थे, लेकिन इसके बावजूद वे आईपीएल में खेले.

वैसे दूसरे जो खिलाड़ी थे, ऐसा नहीं कि उनकी स्थिति कोई बेहतर थी, मगर पैसे के लोभ और बीसीसीआई के प्रतिबंध के भय के नाम पर उन्होंने अपनी टीम के मालिकों को दिए गए भरोसे को पूरा किया और खेले.

वेस्टइंडीज़ दौरा

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Image caption हरभजन सिंह दूसरे टेस्ट मैच के दौरान माँसपेशी खिंचने के बाद टेस्ट श्रृंखला से दूर

वेस्टइंडीज़ दौरे के लिए, जो कि इंग्लैंड दौरे के अभ्यास के लिए एक आदर्श दौरा हो सकता था, कई प्रमुख खिलाड़ियों को अचानक लगा कि उनके छिले-थके शरीर को आराम की ज़रूरत है, कई को तो सर्जन के पास जाने की ज़रूरत महसूस हुई.

ये दौरा, भारत के वन डे और टेस्ट दौरे को जीतने के बावजूद, भारत के लिए अच्छा साबित नहीं हुआ और क्रिकेट खेलनेवाले देशों की तालिका में सबसे कमज़ोर समझी जानेवाली वेस्टइंडीज़ की टीम ने उन्हें बल्लेबाज़ी और गेंदबाज़ी, दोनों में परेशान किया.

हालत ये है कि इंग्लैंड दौरे के लिए भारत से परिवर्तन के लिए जो खिलाड़ी भेजे गए हैं, वो भी अभी तक इंग्लैंड की ख़तरनाक टीम का मुक़ाबला कर पाने में बेअसर साबित हो रहे हैं, और घायल खिलाड़ियों की संख्या दिन-पर-दिन बढ़ती ही जा रही है.

दुनिया की पहले नंबर की टीम – और अचानक ये जानने की ज़रूरत नहीं कि भारत का शीर्ष पर पहुँचना आँकड़ों की कलाबाज़ी है ना कि बेहतर प्रदर्शन – मानसिक और शारीरिक तौर पर थकी हुई है. और इसमें हैरानी नहीं कि सारा क्रिकेट जगत उनकी खिल्ली उड़ा रहा है.

आईपीएल पर ख़ामोशी

दोष मढ़ने का सिलसिला शुरू हो चुका है और टेलीविज़न पर दिखनेवाले सुपरिचित चेहरे, जो कि भारतीय खिलाड़ियों की हर चीज़ में खोट निकाल रहे हैं, बीसीसीआई और आईपीएल के मैचों के समय के बारे में एक शब्द भी नहीं बोल रहे.

चूँकि वे या तो भारतीय क्रिकेट बोर्ड, या फिर आईपीएल से पगार लेते हैं, इसलिए वे अपने आकाओं को नाराज़ हीं कर सकते.

सबसे आसान यही है कि खिलाड़ियों को बलि का बकरा बनाया जाए क्योंकि उन्हें परेशान करने से बोर्ड के साथ उनके क़रारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.

एक ऐसे बोर्ड के लिए जिसके लिए खेल का मतलब केवल नफ़ा और नुक़सान है, टेस्ट क्रिकेट एक ऐसी औपचारिकता भर है जिसमें आपको केवल इसलिए भाग लेना है क्योंकि आप दुनिया की पहले नंबर की टीम हैं.

यदि इस श्रृंखला को चैंपियन टीम और चैंपियन होने की दावेदार टीम के तौर पर ना बेचा गया होता तो शायद इसे लेकर दर्शकों में वैसी उत्सुकता ना होती.

और मुझे लगता है, शायद अपने बोर्ड को सुविधा ही होगी यदि भारत टेस्ट रैंकिंग में नीचे चला आए, जिससे कि वे बिना कि अपराध बोध के आईपीएल पर ध्यान केंद्रित कर सकें.

अगर ऐसा हुआ, तो ये एक विराट विपदा से कम नहीं होगा, और इस एक कारण से ही मैं पूरे मन से प्रार्थना कर रहा हूँ कि भारत की इस श्रृंखला में वापसी हो.

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