शतक से चूक गए पटौदी

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Image caption पटौदी के नेतृत्व में ही भारत ने पहली बार विदेशी धरती पर जीत हासिल की थी

टाइगर पटौदी को सबसे पहले मैंने 1975 के कोलकाता टेस्ट में देखा था. पटौदी तब अपने टेस्ट करियर के अंतिम पड़ाव पर थे.

लेकिन तब भी 36 रन की अपनी कैमियो पारी में जिस तरह से उन्होंने उस समय के दुनिया के सबसे तेज़ गेंदबाज़ एंडी रोबर्ट्स और वैनबर्न होल्डर की गेंदों पर 6 चौके लगाए थे, उसे मैं अभी भी भूला नहीं पाया हूँ.

होल्डर की एक शॉर्टपिच गेंद उनकी ठुड्डी पर लगी थी और ख़ून से तरबतर पटौदी को मैदान से बाहर जाना पड़ा था.

इक्कीस साल की उम्र में उन्हें उस समय भारतीय टीम की कप्तानी दी गई थी जब वेस्ट इंडीज़ दौरे में चार्ली ग्रिफ़िथ की गेंद पर नारी कॉन्ट्रेक्टर का सिर फट गया था.

उसके बाद से पटौदी ने चालीस टेस्टों में भारत की कप्तानी की और नौ में भारत को जीत दिलाई. 1968 में पहली बार विदेश की धरती में न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ उन्होंने 3-1 से भारत को सिरीज़ जितवाई थी.

दुर्लभ खिलाड़ी

वे उन दुर्लभ खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिनके पिता भी भारत के लिए टेस्ट खेल खेल चुके हैं. इफ़्तिख़ार अली ख़ाँ पटौदी आज़ादी से पहले भारतीय टेस्ट टीम के सदस्य थे.

वर्ष 1961 मे एक कार दुर्घटना में उनकी दाहिनी आँख में चोट लग गई थी, जिससे उन्हें दो-दो चीज़ें एक साथ दिखाई देती थीं और वह भी 6-6 इंच की दूरी पर.

इसके बावजूद न सिर्फ़ उन्होंने उस समय के सबसे तेज़ गेंदबाज़ों फ़्रेडी ट्रूमेन, वेस हॉल, चार्ली ग्रिफ़िथ और ग्राहम मेकेन्ज़ी को बख़ूबी खेला बल्कि छह शतक भी लगाए.

इंग्लैंड के ख़िलाफ़ दिल्ली में बनाए गए 203 नाबाद रन उनके टेस्ट करियर का उच्चतम स्कोर था. वैसे 1967 में मेलबर्न की हरी पिच पर उनके 75 रनों की पारी को उनकी सर्वश्रेष्ठ पारी माना जाता है.

पच्चीस रन पर भारत के पाँच विकेट गिर चुके थे. पटौदी की घुटने के पीछे की नस (हैमस्ट्रिंग) में चोट लगी हुई थी. वह एक रनर(अजीत वाडेकर) के साथ मैदान में उतरे.

सामने की तरफ़ झुक नहीं सकते थे. इसलिए सिर्फ़ हुक, कट और ग्लांस शाट्स के सहारे उन्होंने 75 रन बनाए. इस पारी के बारे में मिहिर बोस ने हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन क्रिकेट में लिखा था, ‘एक आँख और एक पैर के सहारे खेली गई पारी.’

बेहतरीन फ़ील्डर

एक अच्छा बल्लेबाज़ होने के साथ-साथ पटौदी बला के फ़ील्डर भी थे. कवर पर खड़े होकर जिस तरह वह गेंद के पीछे कुलाँचें भरते थे, लगता था कि एक चीता अपने शिकार का पीछा कर रहा है.

शायद इसी वजह से उनका नाम टाइगर पड़ा. कवर के सर्वकालीन महान फ़ील्डरों में उन्हें अज़हरुद्दीन और बृजेश पटेल के समकक्ष रखा जाएगा.

पटौदी की कप्तानी को मात्र आँकड़ों से नहीं नापा जा सकता. उन्होंने सबसे पहले भारतीय टीम में यह अहसास भरा कि वह जीत सकते हैं.

तीन स्पिनरों को एक साथ टीम में स्थान देना उन्हीं की सोच थी. भारत का विश्वस्तरीय स्पिन आक्रमण उन्हीं के नेतृत्व में पैना बना. प्रसन्ना ने अपनी आत्मकथा वन मोर ओवर में लिखा है कि पटौदी की वजह से ही वह विश्व स्तर के स्पिन गेंदबाज़ बन पाए.

कॉलर ऊपर खड़ा कर, कमज़ोर टीम के बावजूद, दुनिया की बेहतरीन टीमों के ख़िलाफ़ ठसक के साथ खड़ा होना पटौदी ने ही संभव कर दिखाया था.

अपने ज़माने के ज़बरदस्त स्टाइल आइकंस में उनकी गिनती होती थी. एक बार जब इंग्लैंड के खिलाफ़ जब वह चार रनों पर आउट हो पवेलियन लौट रहे थे, तो महान कमेंट्रेटर बॉबी तल्यार ख़ाँ ने टिप्पणी की थी- पटौदी 96 रनों से शतक चूक गए.

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