हड़बड़ी में कहीं गड़बड़ी तो नहीं....

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Image caption इस सिरीज़ में कप्तान धोनी पर काफ़ी दबाव होगा

तो आख़िरकार वही हुआ, जिसका डर था. इंग्लैंड में मिली करारी हार के बाद सुनील गावसकर जैसे कई पूर्व क्रिकेटरों ने बीसीसीआई से अनुरोध किया था कि वे इस हार के बाद हड़बड़ी में कोई क़दम न उठाएँ.

लेकिन बोर्ड को तो ये दिखाना है कि उनके पास भारतीय क्रिकेट के भविष्य को लेकर एक योजना है और वे युवा खिलाड़ियों को मौक़ा देना चाहते हैं.

अब बहुत हो गया चयनकर्ता कप्तान की बात नहीं सुनेंगे और सुनहरे क्रिकेट के भविष्य के लिए टीम की काया पलट करके ही दम लेंगे.

तो बोर्ड के चयनकर्ताओं ने ये काम कर दिखाया. टीम का कायापलट करने की उनकी कोशिशें काग़ज़ पर दिखने लगी है. इंग्लैंड से पिट कर आई टीम एक बार फिर इंग्लैंड के सामने होगी और इस टीम में कई ऐसे चेहरे होंगे, जिन पर भारत को जीत दिलाने का ज़िम्मा होगा.

युवा खिलाड़ियों को मौक़ा देने में कोई बुराई नहीं है और न ही इस पर किसी को आपत्ति हो सकती है. असली समस्या तो इसे कार्यान्वित करने के तरीक़े को लेकर है.

चेहरा

मौजूदा भारतीय टीम को देखें, तो अजीब लगता है कि कुछ महीने पहले विश्व विजेता बनी टीम के कितने सदस्य इस टीम में हैं. आप भी चकरा जाएँगे.

ये सही है कि कई खिलाड़ी घायल हैं, लेकिन ऐसी भी क्या समस्या आ गई कि छह महीने में ही विश्व विजेता टीम का चेहरा बदल गया.

दरअसल इन सारी समस्याओं की जड़ में बीसीसीआई का रुख़ है, जिसे वो छिपाना चाहती है. टीम के इतने खिलाड़ी एक साथ घायल कैसे हो गए, कुछ खिलाड़ियों ने चोट छिपाई क्यों, इसका जवाब बीसीसीआई के पास नहीं.

बीसीसीआई खिलाड़ियों की फ़िटनेस की समस्या से कैसे निपटेगी, इसका इलाज उसके पास नहीं. क्या बीसीसीआई ने कभी ये सोचा है कि सालभर क्रिकेट के व्यस्त कार्यक्रमों में कैसे सामंजस्य बिठाया जाए.

नहीं. उन्हें तो बस खिलाड़ियों को मशीन बनाकर रखना है और फिर जब मर्ज़ी आए उन्हें अंदर किया जाए और जब मन आए उन्हें बाहर किया जाए.

योजना

ये ठीक है कि इंग्लैंड का दौरा भारतीय क्रिकेट टीम के लिए एक भयानक सपने की तरह है. लेकिन इससे सबक सीखने के बजाए बोर्ड एक और जुआ खेल रहा है.

दो वनडे के लिए जिस टीम का ऐलान किया गया है, उसमें नए और कम अनुभवी खिलाड़ियों की भरमार है. ये ठीक है कि बल्लेबाज़ी के मोर्चे पर फिर भी कुछ पुराने चेहरे हैं, लेकिन गेंदबाज़ी में तो हाल बहुत बुरा है.

इंग्लैंड के ख़िलाफ़ टेस्ट सिरीज़ के दौरान और फिर वनडे सिरीज़ के दौरान कई स्टार खिलाड़ियों के घायल होकर लौटने के बाद बोर्ड ने कई नए खिलाड़ियों को इंग्लैंड भेजा था.

उनमें से तो कुछ को मौक़ा ही नहीं मिला, तो कुछ इतने बुरे साबित हुए कि भारत को एक भी जीत नसीब नहीं हुई.

वर्षों से बोर्ड की ओर से ऐसी परंपरा चली आ रही है कि नए खिलाड़ियों को मौक़ा देने के नाम पर कई बार खिलाड़ियों की प्रतिभा को मार दिया जाता है.

इंग्लैंड के ख़िलाफ़ घरेलू सिरीज़ में भारतीय टीम पर काफ़ी दबाव होगा. दबाव अपने मैदानों पर उस इंग्लैंड को हराने को, जिनके हाथों भारतीय टीम हाल में ही पिट कर आई है.

कोशिश

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Image caption सचिन जैसे खिलाड़ियों की जगह कौन लेगा?

इस भारी भरकम दबाव के बीच कई नए और युवा खिलाड़ी असमय ही अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य से ग़ायब हो सकते हैं. टीम में नए खिलाड़ियों को मौक़ा देने का कौन नहीं समर्थन करेगा, लेकिन आवश्यकता है एक योजनाबद्ध तरीक़े से इसे लागू करने का.

सीनियर खिलाड़ियों की जगह कैसे नई प्रतिभाओं को कैसे उभारना है, इसके लिए हड़बड़ी में की गई कोई भी कोशिश घातक हो सकती है.

अच्छा होता टीम में अनुभवी और नए खिलाड़ियों के बीच तालमेल बिठाया जाता और धीरे-धीरे इन प्रतिभाओं को फलने-फूलने दिया जाता.

ये टीम पहले दो एक दिवसीय मैचों के लिए है. डर यही है कि कहीं इन मैचों में भारतीय टीम ने ख़राब खेल दिखाया तो कई खिलाड़ियों पर गाज गिरेगी. ऐसा हुआ तो सारी योजनाएँ धरी की धरी रह जाएँगी.

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