नई भारतीय टीम - चयन और चुनौतियाँ

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Image caption चयनकर्ताओं ने नई टीम में आर अश्विन को भारत के मुख्य स्पिनर का स्थान दिया है

अंततः एक ऐसा समय आता है जब अनिश्चित भविष्य की कठोर वास्तविकता का सामना करने को टालते रहने से मुद्दे के दिशाहीन हो जाने का ख़तरा होता है.

भारतीय क्रिकेट अभी उसी ढुलमुल दौर में है जहाँ एक दीर्घकालीन दृष्टि, कुछ बुद्धिमानी भरे और न्यायपूर्ण फ़ैसलों से एक बदलती टीम को सहारा मिल सकता है.

इसके उलट, अल्पकालिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किए जानेवाले परिवर्तन, भविष्य में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत की स्थिति पर बुरा असर डाल सकते हैं.

इंग्लैंड के विरूद्ध वन डे सिरीज़ के लिए भारतीय टीम के चयन में सकारात्मकता दिखती है, चयनकर्ताओं की कड़ी सोच झलकती है, जिन्होंने एक झटके में टीम का चेहरा बदल दिया है.

आप कह सकते हैं कि ऐसा मुख्य रूप से कुछ बड़े खिलाड़ियों को चोट लगने के कारण हुआ है, मगर ये तथ्य तो अपनी जगह रहती ही है कि पुराने नामों का सहारा लेने के स्थान पर चयनकर्ताओं ने नए अपरिचित नामों को आगे किया है.

उनकी इस सोच की सबसे बेहतर झलक हरभजन सिंह को बिठाए जाने के फ़ैसले में मिलती है, जिनकी एक ऑफ़-स्पिनर के रूप में पिछले एक दशक से भारतीय टीम में जगह पक्की थी.

स्पिन आक्रमण

स्पिन के क्षेत्र में भारत की कमज़ोरी बाद के वर्षों में काफ़ी कुछ हरभजन की धार में कमी आने के कारण बढ़ी है.

वो थके हुए, रक्षात्मक और प्रतिकूल परिस्थितियों को भेद सकने में अक्षम लगते हैं जिसकी उम्मीद उनकी श्रेणी के गेंदबाज़ों से रखी जाती है.

अश्विन अब भारतीय टीम में स्पिनर के रूप में पहली पसंद हैं और चयनकर्ताओं की ओर से दिया जानेवाला ये अपने-आप में एक कड़ा संदेश है, बिना इस बात की परवाह किए कि अंततः वे कितने अच्छे या कितने बुरे साबित होते हैं.

लेग स्पिनर राहुल शर्मा का चयन, जो कि छक्कों की बरसात से भरे टी-20 के क्रिकेट में, बल्लेबाज़ों को एक रन तक नहीं बनाने देते, चयन समिति का सबसे दूरदृष्टि वाला फ़ैसला साबित हो सकता है.

अगर वे अपनी उस प्रतिभा को बनाए रहते हैं, जिसका नज़ारा उन्होंने आईपीएल के चार ओवरों में दिखाया है, तो हो सकता है कि भविष्य के लिए भारत को एक ऐसा गेंदबाज़ मिस जाए जो उसका मुख्य गेंदबाज़ साबित हो.

भारतीय गेंदबाज़ी का सबसे चिंताजनक पहलू उसका तेज़ आक्रमण रहा है, जहाँ गेंदबाज़ अक्सर विकेट चटकाने से पहले स्वयँ चटक जाते हैं.

समस्या इस स्थिति को लेकर है जिसका हल ढूँढना बहुत कठिन है.

जड़

वरूण ऐरन, उमेश यादव और एस अरविन्द की गेंदबाज़ी की असलियत के, स्तरीय बल्लेबाज़ों के सामने, वो भी भारतीय विकेट पर ही, सामने आ जाने का ख़तरा बहुत वास्तविक है.

मेरा अनुमान है कि चयनकर्ताओं के सामने सिवा इसके अधिक विकल्प नहीं थे कि नए चेहरों की ओर नज़र डाली जाए और ऐसे में उन्होंने जो चुनाव किया है उसमें कोई समस्या नहीं है.

समस्या ये हो सकती है कि सीमित ओवरों वाले क्रिकेट पर बहुत अधिक ज़ोर देने से, विशेष रूप से टी-20 और उसके सबसे ग्लैमर वाले स्वरूप आईपीएल, गेंदबाज़ों की विकेट लेने की क्षमता कमज़ोर हो चुकी होगी.

जबतक भारतीय क्रिकेट में जम चुकी इस गड़बड़ी को नहीं सुधारा जाता, ऐसे गेंदबाज़ो को खोजना मुश्किल हो सकत है जो विकेट लेने की कला में माहिर हों.

इंग्लैंड दौरे ने निर्दयता से भारतीय क्रिकेट की इन प्राथमिकताओं को उघाड़कर रख दिया है जिसके कारण बल्लेबाज़ लंबी पारी नहीं खेल पाते और गेंदबाज़ों को कुछ पता नहीं रहता कि बल्लेबाज़ को कैसे परेशान किया जाए.

ऐसे में जब क्रिकेट जब केवल मारने और मात खाने का रोमांच भर नहीं रह जाता, वहाँ ऐसे कौशलों की ज़रूरत होती है जिन्हें टी-20 क्रिकेट में नहीं उभारा जा सकता.

भारत को अपनी समस्याओं की इस जड़ पर ध्यान देना चाहिए, वरना अगले साल के आरंभ में होनेवाले ऑस्ट्रेलिया दौरे में इंग्लैंड दौरे की पुनरावृत्ति हो सकती है.

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