मौत के नज़दीक का मुकाबला

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Image caption जो फ़्रेज़ियर अली पर मुक्के बरसाते हुए

खेल जगत में कई प्रतिद्वंद्विताएं देखी गई हैं लेकिन मोहम्मद अली और जो फ़्रेज़ियर के बीच जितनी नफ़रत और द्वेष था, उसका उदाहरण और कहीं नहीं मिलता.

जहाँ तक मुक्केबाज़ी का सवाल है, दोनों क़रीब-क़रीब एक ही स्तर के थे लेकिन लफ़्फ़ाज़ी और शाब्दिक बाण छोड़ने में अली फ़्रेज़ियर पर कहीं भारी पड़ते थे.

जब इन दोनों के बीच मनीला में इस शताब्दी का सबसे भीषण मुकाबला हो रहा था तो टेलीविज़न स्टूडियो में जिस तरह से अली ने अपने प्रतिद्वंद्वी का अंकल टॉम कह कर मज़ाक उड़ाया, फ़्रेज़ियर उसे बर्दाश्त नहीं कर सके और स्टूडियो में ही उनसे भिड़ गए.

कुछ दिनों बाद हुई प्रेस कॉन्फ़्रेंस में अली उन्हीं के मुँह पर उन पर लिखी तुकबंदी सुनाने लगे, जिसमें उन्होंने जो को गोरिल्ला कह कर पुकारा था.

इसके बाद उन्होंने अपनी जेब में हाथ डालकर रबड़ का बना गोरिल्ला निकाला और उस पर नकली घूँसे बरसाने लगे. अली बोले, ‘जब फ़्रेज़ियर पिटेंगे जो इसी तरह दिखाई देंगे.’

वहां मौजूद पत्रकारों ने ज़ोर का ठहाका लगाया और इंतेज़ार करने लगे कि फ़्रेज़ियर इस पर क्या कहते हैं. लेकिन हमेशा की तरह फ़्रेजियर को कोई जवाब नहीं सूझा. उन्होंने सिर्फ़ एक हुंकार भरी और सिर्फ़ यह कहा कि अब उनका लक्ष्य अली को हराना नहीं, बल्कि उन्हें घायल करना है.

अक्तूबर 1975 में हुई इस भिड़ंत में दोनों एक दूसरे पर इस बुरी तरह से टूटे कि इसे शताब्दी की सबसे भीषण लड़ाई कहा गया.

अली बहुत मामूली अंतर से जीते ज़रूर, लेकिन फ़्रेज़ियर ने उन्हें छठी का दूध याद दिला दिया. दोनों इस मुक़ाबले से कभी उबर नहीं पाए.

अली को पार्किंसन रोग

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Image caption जो फ्रेज़ियर और मोहम्मद अली के शब्दबाण रिंग के बाहर भी चलते थे

फ़्रेज़ियर ने इसके बाद कोई मुका़बला नहीं जीता. इस 14 राउंड के मुकाबले में फ़्रेज़ियर ने अली पर 440 मुक्के बरसाए.

पंडितों ने बाद में कहा कि अली को इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ी और अपने जीवन के अगले पड़ाव में वे पार्किंसन रोग के शिकार हो गए.

कई सालों बाद फ़्रेज़ियर ने बीमार अली पर यह कह कर बिलो द बेल्ट हमला किया, ’उनकी तरफ़ देखो. ईश्वर ने उन्हें चुप कर दिया. वह अब बात वहीं कर सकते क्योंकि वह ख़राब बातें किया करते थे. वह हमेशा मेरा मज़ाक उड़ाया करते थे. वह अब ख़त्म हैं और मैं अभी भी बरक़रार हूँ. ’

दोनों दक्षिण के रहने वाले थे, जहाँ नस्लवाद ने काफ़ी उग्र रूप धारण कर लिया था. दोनों ने मुक्केबाज़ी को इसलिए अपनाया था क्योंकि उन्हें इसकी वजह से अनेक सामाजिक और वित्तीय बंधनों से बाहर आने का मौक़ा मिल सका था.

अली की तरह फ़्रेज़ियर ने भी ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीता था.

एक बार फ़्रेज़ियर ने अली को अपनी कार में लिफ़्ट दी थी, लेकिन अली ने कार से उतरते ही सड़क पर ही चिल्लाना शुरू कर दिया, ’फ़्रेज़ियर कोई चैंपियन-वैंपियन नहीं है. मैं एक दिन इसकी वह धुनाई करूँगा कि वह हमेशा याद रखेगा.’

फ़्रेज़ियर अली के इस व्यवहार से हतप्रभ रह गए थे और मन ही मन सोचा था कि एक ही जगह वह उनसे इसका बदला लेंगे..... बीचों-बीच रिंग में !

मेडिसन स्क्वेयर स्टेडियम में फ़्रेज़ियर ने अली को हराकर अपना बदला लिया था.

लेकिन दो साल बाद अली ने मुक़ाबला जीता था और फिर दूसरी बार मनीला में भी वह फ़्रेज़ियर पर बीस साबित हुए थे.

इस मुक़ाबले को शताब्दी का सबसे वीभत्स मुक़ाबला करार दिया गया था और अली ने टिप्पणी की थी, ‘मैं मौत के नज़दीक इतना पहले कभी नहीं पहुँचा था. ’

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