कहाँ गए कबड्डी के दीवाने?

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तेज़ रफ़्तार और रोमांच वाला फ़ॉर्मूला वन खेल हो या इससे पहले भारत आई अर्ज़ेंटीना जैसी फ़ुटबॉल टीमें हो......पिछले कुछ समय में ग्लैमर और पैसे वाले खेल भारत में जगह बना रहे हैं. क्रिकेट का तो पहले से ही दबदबा है.

सुनिए कबड्डी के पतन पर रिपोर्ट

लेकिन इस सब के बीच भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में कई पारंपरिक खेल पीछे छूटते जा रहे हैं. कम ही लोग जानते होंगे कि पिछले 20 दिनों से पंजाब में कबड्डी का विश्व कप चल रहा था.

इस पारंपरिक खेल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत 1990 से हर एशियाई खेल में अपराजित चैंपियन रहा है और तीन बार से विश्व चैंपियन. पाकिस्तान का भी प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है.

लेकिन कबड्डी से जुड़े खिलाड़ियों और अधिकारियों को मलाल है कि कोई रत्ती भर भी उन्हें तवज्जो नहीं देता. भारतीय कबड्डी टीम के मैनेजर गुरदीप सिंह मलही कहते हैं कि ईरान से एशियाई सर्किल स्टाइल कबड्डी में गोल्ड मेडल जीतकर आई भारतीय टीम का स्वागत करने वाला भी कोई नहीं था.

पाकिस्तानी पंजाब में भी इस खेल का ख़ूब दबदबा रहा है लेकिन अब वहाँ भी सूरते हाल उतना अच्छा नहीं है. वैसे गाँव देहात की मिट्टी में रचा बसा कबड्डी का खेल बड़ा ही दिलचस्प होता है.ये खेल कितना रोचक है इसका अंदाज़ा तो इसकी कमेंट्री सुनकर ही हो जाता है.

रोमांच और दिमाग़ का खेल

इसमें जहाँ प्रतिदंद्वी को हराने के लिए शारीरिक ताकत की ज़रूरत है तो दिमाग़ी खेल भी चलता है कि कैसे सामने वाले को चकमा दिया जाए, उसे घेरे में फँसाया जाए. इसमें साँस निंयत्रण भी ग़ज़ब का होता है.

पाकिस्तानी कबड्डी टीम के पूर्व कप्तान मोहम्मद सरवर उन दिनों को याद करते हैं जब कबड्डी का जलवा था.

वे कहते हैं, "कबड्डी बहुत सरल और बेहतरीन खेल है. लोग बहुत शौक से देखते थे इसे. इसमें थ्रिल है, पावर है, ताकत है..उम्दा खिलाड़ी की हर खू़बी का जौहर करने का मौका मिलता है. जब मैं कबड्डी कप्तान था तो हम इंग्लैंड दौरे पर जाते थे. वहाँ एशियाई ही नहीं ब्रितानी भी चाव से इसे देखते थे. छोटे शहरों में तो ट्रैफ़िक जाम हो जाता था. बरसों पहले भी ये खेल जैसे खेला जाता था, आज भी वैसा ही है. कोई पैड नहीं कोई दस्ताने नहीं बस ताकत और दिमाग़ का खेल है."

आख़िर क्या कारण है कि कभी बेहद लोकप्रिय रहे ये परंपरागत खेल आधुनिक समय की चाकाचौंध में खो से गए हैं.

खेल पत्रकार जसविंदर सिद्धू, "इसके लिए कई चीज़ें ज़िम्मेदार है. मीडिया ने धीरे-धीरे अपना ध्यान क्रिकेट जैसे खेलों पर केंद्रित कर लिया. मीडिया ने पारंपरिक खेलों को जगह देने की ज़रूरत नहीं समझी क्योंकि उन्हें लगता है कि गाँवों में उनका केबल जाता है और न ही गाँवों में ही उनके दर्शक हैं. फिर इन खेलों के आयोजकों की ओर से भी पूरी कोशिश नही हुई कि कैसे खेलों को आगे ले जाया जाए. उन्हें प्रायोजक नहीं मिले. सरकारों ने भी ध्यान नहीं दिया. सरकार के पास पैसा तो है ये राष्ट्रमंडल खेलों से साबित हो गया लेकिन ये पैसा उन लोगों तक पहुँचा जो परंपरागत खेलों से जुड़े हुए हैं."

पत्रकार जसविंदर सिद्धू का मानना है कि अगर इन पारंपरिक खेलों को बचाए रखना है तो सरकारी और कॉरपोरेट मदद के साथ-साथ पुराने खेलों में मार्केटिंग के आधुनिक तरीके अपनाने होंगे. वे मिसाल देते हुए कहते हैं कि पंजाब में जारी कबड्डी विश्व कप के बारे में लोगों को इसलिए पता चला क्योंकि इसकी मार्केटिंग काफ़ी अच्छे तरीके से की गई और शाहरुख़ खान जैसे सितारों को बुलाया गया.

कबड्डी तो एक मिसाल हैं... ऐसे कई पारंपरिक खेल भारत, पाकिस्तान और भारतीय उपमहाद्वीप में मौजूद हैं. फ़ॉर्मूला वन जैसे आधुनिक खेलों से इन परंपरागत खेलों का कोई बैर नहीं, गाँव खेड़े के इन खेलों को बस अपने लिए थोड़ी सी जगह चाहिए.