'रोबक क्रिकेट में लेखनी के सचिन थे'

 रविवार, 13 नवंबर, 2011 को 18:20 IST तक के समाचार

रोबक सोमरसेट काउंटी टीम के कप्तान थे

क्रिकेट के खेल पर रिपोर्टिंग करते वक़्त जिन नामचीन हस्तियों से दो-चार होने का मौका मिला पीटर रोबक उनमे से एक हैं.

जीवन में पहली बार जब पीटर रोबक नाम सुना या जाना तब मैं शायद कॉलेज में था.

इंडिया टुडे पत्रिका ने सचिन तेंदुलकर पर एक विशेष अंक निकाला था जिसमे पीटर ने एक दिल को छू जाने वाला लेख लिखा था.

पीटर नें अपने लेख की शुरुआत कुछ इस तरह की थी, "अगर आप भारत में हों और किसी शहर में अपनी विदेशी भाषा के चलते भटक गयें हों तो या तो गाँधी का नाम लीजिये या फिर क्रिकेट का. गाँधी से लोग महात्मा से लेकर राजीव और सोनिया को जानते हैं और क्रिकेट के नाम से सिर्फ़ और सिर्फ़ सचिन तेंदुलकर को."

पहली मुलाकात

वैसे तो बीबीसी की ओर से क्रिकेट के कई अहम मैच कवर करने के मौके मिले लेकिन विश्व कप 2011 प्रमुख रहा.

दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमियों की निगाहें थीं मोहाली पर जहाँ सेमी फ़ाइनल में भारत और पाकिस्तान का मुक़ाबला होना था. जोश में मैं भी स्टेडियम मैच शुरू होने से एक घंटे पहले ही पहुँच गया था.

दाखिल होते वक़्त जिस कतार में था उसी में आगे एक छह फ़ुट के लहीम-शहीम सज्जन खड़े थे.
पहचानने में वक़्त ही नहीं लगा! पीटर रोबक अपने दायें कंधे पर लैपटॉप बैग डाले हुए थे और बाएँ हाथ में अखब़ार पढ़ते हुए लाइन में खिसक रहे थे.

प्रेस बॉक्स पहुंचकर सबसे पहले मैंने अपनी सीट देखी. ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था.

मेरे ठीक पीछे बैठे थे ख़ुद पीटर रोबक और उनकी ठीक बगल में विराजमान थे अयाज़ मेमन, एक और जाने माने क्रिकेट समीक्षक.

मैच शुरू भी नहीं हुआ था और लग रहा था कि भईया यहाँ आना तो तर गया समझो!

आव देखा न ताव, पीछे मुड़ा और पीटर की तरफ ख़ुद ही हाथ बढ़ा दिए. आज भी याद है कहा क्या था, "सर मेरा नाम नितिन है.. बीबीसी में काम करता हूँ लकिन बचपन से क्रिकेट पर आपके लेखों का दीवाना भी हूँ."

य़कीन मानिये पीटर हैरान थे. हों भी क्यों न, उनके अगल बगल एक से बड़े एक सूरमा विराजमान थे.

विश्व कप में भारत पाकिस्तान का मुक़ाबला शुरू हुआ ही था और एक और पत्रकार आकर उनके ख़ुद के कसीदे पढ़ गया!

बहराल संयम बरतते हुए उन्होंने मुझसे बातचीत की और वो भी ख़ासी लंबी. भोजन अवकाश के समय में प्रेस बॉक्स से बाहर निकला ही था कि पीछे से पीटर रोबक का हाथ कंधे पर आया, और उन्होंने दो-टूक पूछा, "क्या लग रहा है, वानखेड़े में फ़ाइनल खेलने कौन सी टीम जाने वाली है?"

बेचैनी

रोबक क्रिकेट के बेहतरीन लेखकों में गिने जाते हैं

एक वो दिन है और एक आज का. जब से पीटर रोबक की मौत की ख़बर मिली, मन जैसे बेचैन सा हो उठा है.

मोहाली से लेकर वानखेड़े स्टेडियम में उनके साथ बिताए वो चंद घंटे बार बार ज़हन में वापस लौट रहे हैं.

मुंबई में मैंने उनसे जानना चाहा था कि आखिर सोमरसेट काउंटी के कप्तान की हैसियत से उन्होंने विवियन रिचर्ड्स जैसे महान बल्लेबाज़ के उस काउंटी की ओर से आगे खेलने पर सवाल कैसे उठा दिया था.

पीटर रोबक से जो जवाब मिला वो सवाल से भी ज़्यादा सटीक और बेबाक था.

उन्होंने कहा था, "अगर तुम सचिन के फैन हो तो तुम्हे सबसे पहले पता चल जाएगा कि उसे क्रिकेट खेलनी कब छोड़ देनी चाहिए. ठीक वैसा ही कुछ मैं विव के बारे में उन दिनों सोच रहा था. मैं चाहता था कि सोमरसेट की ओर से और नये युवा क्रिकेटरों को खिलाया जाए."

खालीपन

आज जब उनकी मौत की ख़बर सुनकर बीबीसी के एक सह पत्रकार पंकज प्रियदर्शी को फोन किया तो उन्होंने एक बात का ज़िक्र किया जिससे मन में उठ रहे सवाल शांत से हो गए हैं.

पंकज ने बताया कि वो भी वेस्टइंडीज़ में हुए क्रिकेट विश्व कप के दौरान पीटर रोबक से मिले थे. उन्होंने कहा कि 'पीटर में एक दर्द, एक खालीपन सा था जो कि उनसे बातचीत कर पता चल जाता था'

पीटर के जीवन पर एक नज़र दौडाएं तो शायद ये बात सच भी है. कुछ युवा क्रिकटरों को क्रिकेट सिखाने के दौरान दी गयी कथित यातना इसका ही एक उदाहरण है. हालांकि पीटर रोबक ने बाद में कोर्ट में हुई पेशी के दौरान अपनी गलती को माना भी था.

लेख लिखने के बाद मन थोडा शांत है. जाने माने क्रिकेट समीक्षक हर्षा भोगले ने पीटर की मौत पर ट्वीट किया, 'पीटर क्रिकेट पर अपनी लेखनी के लिए वैसे ही जाने जाएँगे जैसे सचिन क्रिकेट खेलने के लिए.'

मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ. पीटर रोबक क्रिकेट पर लिखे गए बेहतरीन और चुने हुए शब्दों का साथ कम से कम मेरे आस पास तो हमेशा रहेगा.

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