युवा खिलाड़ी पिटेंगे या पीट कर आएँगे?

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भारतीय टीम का ऑस्ट्रेलिया दौरा. अपना दमख़म साबित करने की होड़. ज़बरदस्त प्रतिद्वंद्विता मैदान के अंदर और मैदान के बाहर भी.

कौन मारेगा बाज़ी. क्या ऑस्ट्रेलिया की ज़मीन पर ऑस्ट्रेलिया को टेस्ट सिरीज़ में हराने का सपना पूरा होगा? भारतीय टीम, जिसने 28 साल बाद विश्व चैम्पियन का ख़िताब हासिल किया. भारतीय टीम, जो कई महीनों से आईसीसी की टेस्ट रैंकिंग में शीर्ष पर बनी हुई थी.

भारतीय टीम, जिसका लोहा दुनियाभर के क्रिकेट खेलने वाले देश मानते हों.....लेकिन विश्व कप जीतने के कुछ महीनों के अंतराल पर ही टेस्ट का टॉप स्थान गया और इंग्लैंड दौरे पर टीम हर तरह से पिटी. फिर शुरू हुआ खिलाड़ियों के अंदर-बाहर आने-जाने का सिलसिला.

इंग्लैंड दौरे पर बुरी तरह पिटी टीम जब अपने देश में मैदान पर उतरी तो बेहतरीन प्रदर्शन किया. लेकिन इसे टीम के बेहतरीन दौर का प्रतीक नहीं माना जा सकता क्योंकि भारतीय टीम पर शुरू से ही आरोप लगते रहे हैं कि टीम अपने मैदान पर अच्छा प्रदर्शन करती है.

निष्कर्ष ये कि असली परीक्षा तो ऑस्ट्रेलिया में ही होनी है. क्या भारतीय टीम में इतना दम है कि वो ऑस्ट्रेलिया को ऑस्ट्रेलिया में मात दे दे?

अनुभव

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Image caption प्रज्ञान ओझा और आर अश्विन ने स्पिन आक्रमण की कमान संभाल रखी है

ध्यान से देखें तो मौजूदा ऑस्ट्रेलिया टीम में भी वो दम नहीं नज़र आता, जो वर्ष 2008 में भारत के ख़िलाफ़ सिरीज़ में था, तो भारतीय टीम में भी कई ऐसे खिलाड़ियों को जगह दी गई है, तो काफ़ी युवा है और उन्हें अनुभव भी कम है.

आर अश्विन, अभिमन्यु मिथुन, विनय कुमार, उमेश यादव, प्रज्ञान ओझा, अजिंक्य रहाणे तो हैं ही कम अनुभवी, रोहित शर्मा और विराट कोहली को भी ऑस्ट्रेलिया की उछलती पिच पर खेलने का अनुभव नहीं है. तो क्या ये सिरीज़ उन पर ज़रूरत से ज़्यादा दबाव नहीं डाल रही.

वरिष्ठ खेल पत्रकार प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं, "दबाव बिल्कुल होगा, काफ़ी होगा. क्योंकि कंडीशन भारत के पक्ष में नहीं है. इंग्लैंड में भी हमने देखा था, जब गेंद सीम और स्विंग हो रही थी, तो न सीनियर चल रहे थे और न ही जूनियर. भारत के भविष्य के लिए बहुत अहम सिरीज़ है. ये सिरीज़ दिखाएगा कि युवा खिलाड़ियों में कितना दम है."

इन खिलाड़ियों को ये पता है कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में दबाव झेलना ही पड़ता है और अगर ऑस्ट्रेलिया जैसी टीम के ख़िलाफ़ ये खिलाड़ी अपने आप को साबित कर देते हैं तो ये सोने पर सोहागा होगा.

दबाव

भारत के पूर्व स्पिन मनिंदर सिंह का मानना है, "जब तक आप पर दबाव नहीं होगा, आप बड़े प्लेटफ़ॉर्म पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाएँगे. दबाव को झेलना ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की ख़ूबी है. मुझे लगता है कि इन खिलाड़ियों में वो बात है कि वे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के दबाव को झेल सकें. अगर आप उमेश यादव की बात करें, आर अश्विन की बात करें, इन्होंने अपनी पहली सिरीज़ में जिस तरह गेंदबाज़ी की है, उन्होंने दबाव को बहुत अच्छी तरह से झेला है."

जहाँ तक दबाव की बात है, तो वो तो वरिष्ठ खिलाड़ियों पर भी होता है और इंग्लैंड के ख़िलाफ़ दौरे पर ये बात साबित भी हुई.

वरिष्ठ क्रिकेट पत्रकार विजय लोकपल्ली मानते हैं कि इन युवा खिलाड़ियों में से कई खिलाड़ियों की ख़ास बात ये है कि वे राष्ट्रीय टीम में अपनी जगह पक्की करना चाहते हैं.

वे कहते हैं, "अगर विराट कोहली या रोहित शर्मा अच्छा प्रदर्शन करके टीम में अपनी जगह बना लेते हैं, तो उनके भविष्य के लिए अच्छा होगा."

लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि परीक्षा काफ़ी कठिन है. क्रिकेट के जानकार मान रहे हैं कि ऑस्ट्रेलिया की टीम में भी उतना दम नहीं, लेकिन क्या युवा खिलाड़ियों पर बीसीसीआई का ये दाँव चलेगा.

परीक्षा

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Image caption ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ सिरीज़ में विराट के प्रदर्शन पर नज़र होगी

पूर्व क्रिकेटर आकाश चोपड़ा मानते हैं कि युवा खिलाड़ी काफ़ी प्रतिभाशाली हैं. आकाश कहते हैं, "इन खिलाड़ियों का आईपीएल का करियर या घरेलू करियर काफ़ी अच्छा रहा है. मुझे उम्मीद है कि वे इस परीक्षा में खरे उतरेंगे."

भारतीय क्रिकेट टीम और उसके खिलाड़ियों के लिए एक और चुनौती होती है क्रिकेट प्रशंसकों पर मीडिया का दबाव. एक मैच बुरा खेला नहीं कि आपका ऐसा पोस्टमार्टम किया जाता है जैसे लगता है कि एक दिन का हीरो दूसरे दिन का विलेन बन जाता है. तो क्या इस तरह का दबाव खिलाड़ियों पर असर नहीं डालेगा.

मुंबई मिरर के स्पोर्ट्स एडिटर कुणाल प्रधान, "मेरे ख़्याल से इन खिलाड़ियों को अपने ऊपर कोई दबाव नहीं रखना चाहिए. इन्हें पब्लिक का दबाव नहीं लेना चाहिए."

ऐन मौक़े पर घायल होने के कारण टीम से बाहर हो गए वरुण ऐरॉन नहीं मानते कि ऑस्ट्रेलिया दौरे पर गई टीम इतनी युवा है. वरुण कहते हैं कि उन्होंने घरेलू मैचों में अच्छा ख़ासा समय बिताया है और वे अच्छा प्रदर्शन करेंगे इसमें कोई शक़ नहीं.

वरुण ऐरॉन कहते हैं, "जो युवा खिलाड़ी हैं, उन्होंने कम से कम दो-तीन सिरीज़ खेली है. ऐसा नहीं है उन्हें अनुभव नहीं है. मुझे नहीं लगता कि वे दबाव महसूस करेंगे." कोई चाहे जो कहे, ये देखने वाली बात होगी कि आने वाले दिनों में वाक़ई ये युवा खिलाड़ी अपने को साबित करते हैं या फिर पुरानी कहानी दोहराई जाएगी.

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