क्या बोर्ड सही दिशा में जा रहा है?

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भारतीय क्रिकेट में युवा खिलाड़ियों को मौक़ा देना एक ऐसा विषय है, जिसे लेकर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की नीतियों पर हमेशा सवाल उठते हैं. लेकिन सच ये भी है कि पिछले कुछ वर्षों में कई युवा प्रतिभाओं ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने आप को साबित किया है.

कोई कहता है कि बोर्ड राजनीति कर रहा है. बोर्ड को युवा खिलाड़ियों को ज़्यादा समय देना चाहिए, ताकि उन्हें अपने को साबित करने का मौक़ा तो मिले. तो कोई कहता रहा है कि बोर्ड सही रास्ते पर है, इसी कारण कई युवा खिलाड़ियों को सामने आने का और अवसर का फ़ायदा उठाने का मौक़ा मिला.

लेकिन सवाल कई हैं. क्या युवा प्रतिभाओं को सँवारने की बीसीसीआई की नीति सही दिशा में है, क्या युवा खिलाड़ियों को सिर्फ़ उसी समय टीम में जगह मिलती है, जब सीनियर खिलाड़ी घायल होने के कारण टीम से अलग हो जाता है और जैसे ही सीनियर वापस आए, जूनियर का पत्ता साफ़.

एक ऐसी ही युवा प्रतिभाओं में से वरुण ऐरॉन कहते हैं, "आपको नतीजा दिख ही रहा है. पिछली दो सिरीज़ में जो भी युवा खिलाड़ी सामने आए हैं, उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया है और साबित किया है. इसलिए बोर्ड की नीति पर सवाल उठाने की वजह नहीं दिखती."

विकल्प

लेकिन वरुण की बात से इत्तेफ़ाक रखने वाले बहुत कम ही हैं. खिलाड़ी आ रहे हैं, खेल रहे हैं, कुछ टिक भी रहे हैं. लेकिन क्या भारतीय क्रिकेट बोर्ड हड़बड़ी में तो युवा खिलाड़ियों को मैदान में नहीं उतार रहा है.

वरिष्ठ खेल पत्रकार प्रदीप मैगज़ीन मानते हैं कि इस मामले में बोर्ड के पास विकल्प कम हैं. वे कहते हैं, "देखिए अब किया भी कुछ नहीं जा सकता. आपको वरिष्ठ खिलाड़ियों की जगह युवा खिलाड़ियों को मौक़ा देना ही होगा. अगर वो शुरुआती दौर में नाकाम भी हुए तो आपको नए खिलाड़ियों पर भरोसा करना होगा."

तो बोर्ड को नए खिलाड़ियों पर भरोसा करना होगा. लेकिन राष्ट्रीय क्रिकेट एकेडमी हो या फिर फिर नई प्रतिभाओं को सामने लाने की उनकी नीति. क्या बीसीसीआई सही रास्ते पर है?

मुंबई मिरर के स्पोर्ट्स एडिटर कुणाल प्रधान कहते हैं, "मेरे ख़्याल से बोर्ड बहुत ही ग़लत रास्ते पर जा रहा है. अपने देश में कंडीशन ऐसी क्रिएट करनी चाहिए जिससे ये पता चल सके कि कौन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में स्थापित हो सकेगा. एक मैच में जो 100 रन बनाता है, जो उसे अगले मैच में मौक़ा दे देते हैं और अगले मैच में वो 30 रन बनाता है, तो दूसरे को ले आते हैं. उनकी प्लानिंग बहुत ख़राब है."

लेकिन बीसीसीआई के उपाध्यक्ष निरंजन शाह इससे सहमत नहीं. उनके पास इसके लिए तर्क भी हैं. कहते हैं, "हमारा इंफ़्रास्ट्रक्टर काफ़ी बढ़ रहा है. छोटे शहरों से भी प्रतिभाशाली खिलाड़ी आ रहे हैं. इसमें एकेडमी का काफ़ी महत्व है. उसकी ट्रेनिंग अच्छी है और चोट लगने पर भी उससे उबरने का मौक़ा वहाँ दिया जाता है."

फ़ायदा

मदन लाल भी मानते हैं कि क्रिकेट एकेडेमी का फ़ायदा हुआ है. वे कहते हैं कि एकेडेमी में सीनियर खिलाड़ियों की सेवाएँ युवा खिलाड़ियों को मिल रही हैं. तो इसका लाभ खिलाड़ियों को मिल ही रहा है.

मदन लाल बताते हैं, "बीसीसीआई ने जो एकेडेमी खोली है, उसका अच्छा असर है. बाक़ी कई शहरों में भी एकेडेमी हैं. पुराने खिलाड़ियों की कोचिंग के कारण युवा खिलाड़ियों को फ़ायदा मिल रहा है."

वरिष्ठ खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली ये तो मानते हैं कि बंगलौर स्थित राष्ट्रीय क्रिकेट एकेडेमी कोचिंग से ज़्यादा चोटिल खिलाड़ियों के इलाज का केंद्र बन गया है. लेकिन वे वहाँ की आधारभूत सुविधाओं से संतुष्ट हैं और मानते हैं कि अन्य शहरों में भी ऐसे केंद्र प्रतिभा को सँवारने में मददगार होंगे.

वे कहते हैं, "नेशनल क्रिकेट एकेडेमी का अपना रोल है और काफ़ी हद तक एकेडेमी ने अपनी भूमिका निभाई है. वहाँ सुविधाएँ काफ़ी बेहतरीन है. अब बोर्ड ने मोहाली, मुंबई और चेन्नई में भी एकेडेमी स्थापित करने की योजना बनाई है."

ये सच है कि पिछले कुछ वर्षों में कई नई प्रतिभाएँ सामने आई हैं. लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि बोर्ड इन प्रतिभाओं को सँवारे और संभलने का वक़्त दे. अन्यथा असमय ही ये प्रतिभाएँ इतिहास का हिस्सा बन सकती हैं.

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