ओलंपिक में डाओ केमिकल्स विवाद

Image caption डाओ केमिकल्स के ख़िलाफ़ भारत से बाहर भी प्रदर्शन हुए हैं

भारत के मध्यप्रदेश राज्य की राजधानी भोपाल में वर्ष 1984 में हुई गैस त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार यूनियन कार्बाइड को ख़रीदने वाले डाओ केमिकल्स का वर्ष 2012 के लंदन ओलंपिक के आयोजकों में नाम आने पर भारत में विरोध के स्वर मुखर हुए.

पूरी दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना कही जाने वाली भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों और अन्य कार्यकर्ताओं का कहना था कि डाओ को ओलंपिक खेलों का प्रयोजक बनना अनुचित है.

खेल मंत्रालय का विरोध

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Image caption भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों ने खेल मंत्री से मिलकर भी विरोध जताया

भोपाल से उठे शुरूआती विरोध के स्वर जल्द ही राजधानी दिल्ली तक पहुंचे जिसके बाद खेल मंत्रालय हरक़त में आया और उसने भारतीय ओलंपिक संघ को पत्र लिखकर मामले को अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) के समक्ष उठाने के लिए कहा.

इसके बाद भारतीय ओलंपिक संघ ने कहा है कि वो भोपाल गैस त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार डाओ केमिकल्स को लंदन ओलंपिक का प्रायोजक बनाए जाने का 'कड़ा विरोध' करेगा लेकिन ओलंपिक का बहिष्कार नहीं करेगा.

दुनिया के कई संगठनों और नामचीन व्यक्तियों ने भी डाओ केमिकल्स को लंदन ओलंपिक का प्रायोजक बनाए जाने का विरोध किया था.

बयानबाज़ी

Image caption गैस त्रासदी की वज़ह से अभी भी कई लोगों को स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है

इसके बाद लंदन से प्रकाशित संडे एक्सप्रेस में ख़बर आई कि डाओ केमिकल्स लंदन ओलंपिक स्टेडियमों से अपने विज्ञापन हटाने के लिए तैयार हो गया है.

इस पर भारतीय ओलंपिक संघ ने कहा कि वो डाओ के इस क़दम से संतुष्ट नही है और चाहता है कि डाओ लंदन ओलंपिक खेलों के प्रायोजकों से हट जाए.

लेकिन डाओ केमिकल्स ने उन ख़बरों का खंडन किया कि वो लंदन ओलंपिक में स्टेडियमों से अपने विज्ञापन हटाने के लिए तैयार हो गया है.

कंपनी के प्रवक्ता स्कॉट व्हीलर ने एक बयान में कहा कि कंपनी की 'लोगो ब्रांडिंग' को कभी इजाज़त थी ही नहीं, इसलिए उनको हटाने के लिए राज़ी होने ना होने का सवाल ही नहीं है.

कंपनी की ओर से ये बयान आने के बाद विरोध के स्वर धीमे पड़े और ये मामला धीरे-धीरे मीडिया की सुर्ख़ियों से ग़ायब हो गया.

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