कुश्ती: दांव-पेंच और दमख़म का संगम

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Image caption कुश्ती के हर मुकाबले में तीन राउंड होते हैं और हर राउंड दो मिनट का होता है

कुश्ती, ओलंपिक के सबसे पुराने खेलों में से एक है. इसके कई तरीक़े और रूप हैं.

आधुनिक ओलंपिक खेलों में कुश्ती दो श्रेणियों में लड़ी जाती है- पहली फ्री-स्टाइल और दूसरी ग्रीको-रोमन.

फ्री-स्टाइल कुश्ती में खिलाड़ी एक-दूसरे को कमर के नीचे से ही पकड़ सकते हैं. ग्रीको-रोमन कुश्ती में शरीर के ऊपरी हिस्से और भुजाओं का ही इस्तेमाल होता है.

पुरुषों के कुश्ती मुक़ाबलों को पहले ही ओलंपिक में वर्ष 1896 और महिलाओं के मुक़ाबलों को एथेंस में वर्ष 2004 में शामिल किया गया.

पुरुषों के बीच दोनों ही तरह की कुश्ती में सात वज़न-श्रेणियों में मुक़ाबले होते हैं जबकि महिलाओं में केवल फ्री-स्टाइल मुक़ाबले के लिए चार-वज़न श्रेणियां होती हैं.

हर मुक़ाबले में तीन राउंड होते हैं और हर राउंड दो मिनट का होता है.

इसमें विरोधी को ज़मीन पर गिराकर चित करना होता है. दांव-पेंच के आधार पर ही खिलाड़ियों को अंक दिए जाते हैं.

ओलंपिक के इतिहास में कुश्ती का सबसे लम्बा मुक़ाबला वर्ष 1912 में हुआ था जब एस्तोनिया के मार्टिन क्लेन और फिनलैंड के अल्फ्रेड असिकेनेन के बीच स्टॉकहोम में 11 घंटे तक संघर्ष हुआ था.

इस मुक़ाबले में मार्टिन क्लेन की जीत हुई थी, लेकिन अंतिम मुक़ाबले तक उनका भी दम फूल गया था.

लॉस-एंजिल्स में वर्ष 1984 में अमरीकी पहलवान जेफ ब्लेटनिक ने दो वर्ष पहले ही रेडियेशन-ट्रीटमेंट के बावजूद कुश्ती में स्वर्ण पदक जीता था.

भारतीय पहलवान सुशील कुमार ने 66 किलोग्राम वर्ग के फ्री-स्टाइल मुक़ाबले में बीजिंग में कांस्य पदक जीता था. उन्हें लंदन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने की उम्मीद है.

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