म्यूनिख़ : जब ओलंपिक में खेली गई खून की होली

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Image caption म्यूनिख ओलंपिक के दौरान फलस्तीनी आंतकवादियों ने खेलगांव में इसरायली खिलाड़ियो को बंधक बनाया था. इस घटना में 11 इसरायली खिलाड़ी मारे गए.

बीबीसी उदघोषक बैरी डेविस 1968 मेक्सिको खेलों से ओलंपिक खेलों का प्रसारण कर रहे हैं.

बैरी ने ओलंपिक खेलों से जुड़े दस सबसे यादगार लम्हे चुने हैं.

इनमें से एक लम्हा वो भी है जो खेलों, खिलाड़ियों या उनकी उपलब्धियों से जुड़ा नहीं है.

1972 म्यूनिख़ ओलंपिक

वर्ष 1972 में म्यूनिख़ ओलंपिक के दौरान ख़ुद को ब्लैक सितंबर कहने वाले फलस्तीनी चरमपंथियों ने खेलगांव में इसराइली टीम के सदस्यों पर हमला कर उन्हें बंधक बनाया था.

मुझे याद है कि जब सुबह उठने के बाद मैंने टीवी खोला और खेलगांव की तस्वीरें देखीं, तो मेरे ज़हन में सवाल उठा, "यहां क्या चल रहा है? खेल क्यों नहीं दिखाए जा रहे ?"

इसकी वजह जल्द ही साफ़ हो गई.

चरमपंथियों ने शुरुआती हमले में दो इसराइली खिलाड़ियों को मार दिया था और लगभग 24 घंटे तक चले इस हमले में कुल मिलाकर 11 खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों और एक जर्मन पुलिस अधिकारी की मौत हुई थी.

इस घटना के बाद मैंने लोगों को ऐसा कहते सुना है कि खेलगांव की सुरक्षा बहुत कड़ी नहीं थी. लेकिन मैं इस दावे से पूरी तरह सहमत नहीं हूं.

घटनाक्रम

हमलावरों के खेलगांव में घुस पाने की वजह ये लगती है कि वे ट्रैकसूट पहने हुए थे और उन्हें रात को बाहर गए खिलाड़ी समझ कर खेल गांव में रह रहे खिलाड़ियों ने उन्हें अंदर आने में मदद की.

मुश्किल तो ये भी थी कि उस समय किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि ऐसा कुछ घट सकता है.

मुझे याद है कि पूरे दिन टीवी पर एक ही इमारत दिखाई जा रही थी. जो कुछ हुआ था और आगे जो कुछ हो सकता था, उसे लेकर लोगों में दहशत थी.

चरमपंथियों ने इसराइल की जेलों से 234 लोगों की रिहाई की मांग की थी लेकिन इसराइल ने किसी भी तरह का समझौता करने से इनकार कर दिया.

माना जाता है कि आख़िरकार एक समझौता हुआ कि चरमपंथियों को देश के बाहर जाने दिया जाएगा और इसके लिए हेलिकॉप्टर मंगाए गए. लेकिन असल में जर्मनी की योजना अपहरणकर्ताओं पर घात लगाकर हमला करने की थी.

यहां पुलिस से एक ग़ल्ती हो गई. उन्होंने सोचा था कि वहां सिर्फ़ पांच चरमपंथी ही हैं जबकि वहां आठ चरमपंथी थे.

अगले दिन तड़के पहले तो हवाई अड्डे से संदेश मिला कि योजना सफल रही है और सभी बंधकों को छुड़ा लिया गया है.

लेकिन सच्चाई बाद में सामने आई. असल में जर्मन पुलिस के पास इस कार्यवाई के लिए पर्याप्त संख्या में स्नाइपर या बंदूकधारी नहीं थे और आख़िर में सभी बंधक मारे गए.

'खेल जारी रहने चाहिए'

फिर बहस शुरु हुई कि अब आगे क्या होना चाहिए? ओलंपिक खेलों से लेकर दुनिया भर में इस बात पर चर्चा हुई होगी कि इस तरह की घटना के बाद खेल कैसे जारी रह सकते हैं?

और आख़िरकार सही फ़ैसला लिया गया. मैं तब भी यही मानता था और अब भी इस बात पर यक़ीन करता हूं कि खेलों को जारी रखना ज़रूरी था. नहीं तो ये घटना भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति के लिए उदाहरण बन जाती.

ओलंपिक खेलों का आधिकारिक इतिहास लिखने वाले डेविड मिलर ने लिखा है कि मारे गए खिलाड़ियों की प्रार्थना सभा में जब लोग आ रहे थे, तब वहां अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति, आईओसी, के सदस्य, ग्रीस के राजा कॉन्सटेंटाइन से एक आदमी ने कुछ कहा.

वो थे 36 साल पहले बर्लिन खेलों में चार स्वर्ण पदक जीतने वाले मशहूर अमरीकी खिलाड़ी जैसी ओवंस.

ओवंस ने सिर्फ़ एक बात कही, "खेलों को जारी रखना चाहिए."

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