देखते-देखते बदल गया ओलंपिक: बैरी डेविस

बैरी डेविस

मैंने 1968 में मैक्सिको सिटी ओलंपिक से खेलों के महाकुंभ को कवर करना शुरू किया, तब से लेकर अब तक बहुत कुछ बदल चुका है.

एथलीट अब पहले के मुक़ाबले बहुत अधिक पेशेवर हो गए हैं, पहले ज़्यादातर एथलीट एमेच्योर थे, भले वे इससे थोड़ी बहुत कमाई कर लेते हों लेकिन यह उनका मुख्य रोज़गार नहीं था. आज के ज़माने में ज़्यादातर एथलीट पेशेवर हो गए हैं.

पहले प्रतिभावान ग़ैर-पेशेवेर खिलाड़ियों का दौर था जो खेल से प्यार की वजह से हिस्सा लेते थे मगर धीरे-धीरे ग़ैर-पेशेवर खिलाड़ियों को हिकारत की नज़र से देखा जाने लगा, मैं समझता हूँ कि इससे खेलों का भारी नुक़सान हुआ है.

प्रतिभावान ग़ैर पेशेवर खिलाड़ियों ने ओलंपिक में बहुत कारनामे दिखाए हैं मगर अब उनका दौर नहीं रहा.

ओलंपिक पहले के मुक़ाबले बहुत व्यवसायिक हो गए हैं, 1984 के लॉस एंजेलिस ओलंपिक से यह बदलाव बहुत साफ़ दिखाई देने लगा जब पहली बार बड़े पैमाने पर ग्लोबल स्पॉन्सरशिप का सहारा लिया गया, इसके बाद से ओलंपिक कॉर्पोरेट हो गए, उसके बाद से बदलाव की गति काफ़ी तेज़ रही है.

एक और बड़ा बदलाव सुरक्षा को लेकर आया है, 1972 के ओलंपिक खेलों में हुई हिंसा के बाद से ही सुरक्षा एक बड़ी चिंता रही है.

हर ओलंपिक खेल को पिछले खेलों के मुक़ाबले अधिक सुरक्षित बनाने के प्रयास किए जाते हैं, लंदन ओलंपिक भी इसका अपवाद नहीं है जहाँ मिसाइलें तैनात की जा रही हैं और सैनिक सिक्यूरिटी गार्ड की भूमिका निभा रहे हैं.

कवरेज में बदलाव

इसी तरह खेलों का प्रसारण भी काफ़ी बदल चुका है, जब मैंने कमेंटरी की शुरूआत की थी तब मैदान पर इतने कैमरे नहीं होते थे, हमें दर्शकों को वो सब बताना होता था जो वे नहीं देख पाते थे, मगर आज ये भूमिका बदल चुकी है.

Image caption 1976 में मॉन्ट्रियल ओलंपिक के दौरान

अब चप्पे चप्पे पर कैमरे लगे हैं, ऐक्शन रिप्ले का ज़माना है, ऐसे में हमें दर्शकों को वो बातें बतानी होती हैं जो कैमरे नहीं दिखा सकते, ऐसी बातें जिन्हें जानकर टीवी देखने का उनका आनंद बढ़ सकता है.

सोशल नेटवर्किंग साइट्स और स्मार्टफ़ोन ने इस बदलाव में नया आयाम जोड़ा है, उनका इस्तेमाल बहुत बढ़ गया है मगर ज़रूरी नहीं है कि हर समय वह अच्छा ही हो, ज़रूरत से ज़्यादा सूचना की बाढ़ आपको परेशानी में डाल देती है.

लोग बात-बेबात टि्वट और फेसबुक मैसेज करते रहते हैं, ऐसा नहीं कि मैं इनका इस्तेमाल नहीं करता मगर संभलकर इस्तेमाल करता हूँ ताकि ये मेरे मुख्य काम में बाधा न बनें बल्कि सहायक रहें.

ओलंपिक खेल अपने आप में बहुत बड़ा आयोजन होते हैं, दुनिया भर की नज़रें ख़ास तौर पर मेज़बान और प्रतिभागी देशों पर टिकी होती हैं, ओलंपिक के बहाने बीसियों दूसरी बातें चर्चा में आती हैं, मुद्दों में नई जान आ जाती है.

मेरा मानना है कि खिलाड़ी अपनी मेहनत से अपने लिए पदक जीतता है मगर वह अपने देश का प्रतिनिधित्व भी कर रहा होता है इसलिए ओलंपिक खिलाड़ियों की स्पर्धा न रहकर, देशों का मुक़ाबला बन जाता है. मुझे यह पसंद नहीं है लेकिन मैं जानता हूँ कि इसे रोकना संभव नहीं है.

सभी ओलंपिक खेल अपने आप में दिलचस्प और महत्वपूर्ण होते हैं, उनमें उस शहर का चरित्र झलक रहा होता है जहाँ वे आयोजित किए जाते हैं. अब मैं देखने को बेताब हूँ कि इस बार लंदन की कैसी झलक देखने को मिलती है, अगर वह शहर की वास्तविक विविधता के अनुकूल नहीं हुई तो मुझे बहुत निराशा होगी.

मैं ओलंपिक खेलों से बहुत जुड़ाव महसूस करता हूँ, लोग मुझसे कहते हैं कि मैंने जितने ओलंपिक कवर किए हैं किसी और कमेंटेटर ने नहीं किए हैं, मैं इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं देता, मैं मानता हूँ कि मेरी अगली कमेंटरी मेरी सबसे अच्छी कमेंटरी होगी.

मैक्सिको सिटी से लेकर अब तक मैंने 11 ओलंपिक कवर किए हैं, लंदन ओलंपिक की कमेंटरी मैं कर ही रहा हूँ, यह मेरा 12वाँ ओलंपिक होगा. अगर ऊपरवाले ने चाहा तो मैं रियो ओलंपिक की कमेंटरी भी करना चाहूँगा.

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