सवा अरब लोग और ओलंपिक पदक तीन?

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Image caption भारतीय टीम के हाथ इस बार भी ख़ास सफलता हाथ नहीं लगी है

ओलंपिक जैसे आयोजनों में भारत के प्रदर्शन को लेकर अक्सर व्यंग्य से कहा जाता है कि सवा अरब के देश वाले क्यों दो-तीन पदक लेकर लौट आते हैं?

हर आयोजन के बाद सरकार की नीतियों, खेल संगठनों की राजनीति और खिलाड़ियों के फिसड्डी प्रदर्शन पर चर्चा होती है और फिर सब कुछ शांत हो जाता है.

लेकिन क्या पदक का सीधा ताल्लुक सिर्फ़ आबादी से है? या फिर सरकार की नीति से? या खेल संगठनों की क्षमताओं से? या फिर खिलाड़ियों की लगन और एकाग्रता से?

अमरीका के दो विशेषज्ञों का कहना है कि इसका संबंध कई चीज़ों से है जिसमें सबसे अहम है किसी देश में प्रति व्यक्ति आय.

वे कहते हैं कि देश में खेलों की परंपरा और माहौल भी बहुत कुछ तय करता है कि कोई देश कितने पदक जीतेगा.

इन दोनों वैज्ञानिकों ने एक काल्पनिक सूची तैयार की है देशों के सकल घरेलू उत्पाद और उनके आकार के आधार पर. इसमें देशों के खेलों पर होने वाले खर्च और वहां विभिन्न स्पर्धाओं में रुचि को आधार बना कर एक अनुमानित रैंकिग मॉडल तैयार किया गया है.

उनके अनुमान के हिसाब से भारत को 34 पदकों के साथ पांचवें स्थान पर होना चाहिए.

परंपरा का सवाल

अमरीका की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी में कैलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट की मेगन बुसे ने जो मॉडल तैयार किया है उसके अनुसार बड़ी आबादी होने के बावजूद ब्राजील और भारत जैसे देशों के पिछड़ने का सबसे बड़ा कारण सकल घरेलू उत्पाद में प्रति व्यक्ति आय का कम होना है.

उनका कहना है कि किसी भी देश के लिए संपन्न होना बेहद जरूरी है क्योंकि धनी देश सिर्फ बेहतर खेल सुविधाएं और इसके लिए जरूरी ढांचागत तंत्र ही मुहैया नहीं करवा सकते बल्कि इन देशों के परिवार भी अपने बच्चों को अच्छी ट्रेनिंग देने के लिए खर्च कर सकते हैं.

अमरीका के कोलाराडो कॉलेज के इकॉनामिक्स प्रोफेसर डॉन जॉनसन का मानना है कि भारत में क्रिकेट जैसे गैर ओलंपिक खेल को ज्यादा अपना रखा है. यह भी उसके पिछड़ने की एक बड़ी वजह है.

जानकारों का कहना है कि कई देश पारंपरिक रूप से ऐसे खेल खेलते हैं जो ओलंपिक खेलों का हिस्सा हैं, इसलिए वे बेहतर प्रदर्शन भी करते हैं.

जाहिर है कि इस कारण उन्हें कुछ खेलों में पदक भी मिलते हैं.

कोरिया इसका सबसे बेहतर उदहारण है. ताइक्वांडो उसका परंपरागत खेल है. पुरूष और महिलाओं के विभिन्न भार वर्ग में इस स्पर्धा में कई ओलंपिक पदक हैं. इसलिए उसके पास इसमें ज्यादा पदक जीतना आसान है.

जॉनसन ने कहा, “कोरिया ताइक्वांडो जैसी स्पर्धाओं में खिलाड़ियों का पूरा बेड़ा उतार कर सैंकड़ों पदक जीत सकता है. लेकिन भारत की क्रिकेट को लेकर दीवानगी उसे ऐसे पदक जीतने का मौका नहीं देती.”

चीन-अमरीका हैं अपवाद

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Image caption अमरीका के कोलाराडो कॉलेज के इकॉनामिक्स प्रोफेसर डान जॉनसन का मानना है कि भारत में क्रिकेट जैसे गैर ओलंपिक खेल को ज्यादा अपना रखा है. यह भी उसके पिछड़ने का कारण है.

हालांकि दूसरी ओर चीन और अमरीका जैसे देश भी हैं जो अपने सकल घरेलू उत्पाद की तुलना ओलंपिक में कहीं बेहतर कर रहे हैं.

इस बारे में बुसे ने कहा, “इसका कारण अमरीकियों का खेलों को लेकर इच्छुक होना है जबकि चीन बहुत ही छोटी उम्र में अपने खिलाड़ियों को ट्रेनिंग के लिए खेल संस्थानों में भेजता है.”

आस्ट्रेलिया में भी खेलों के लेकर काफी दीवानगी है. खासकर तैराकी को लेकर.

हालांकि 2008 के बीजिंग ओलंपिक में आस्ट्रेलिया ने तैराकी में 46 मेडल जीते थे जबकि बुसे ने 25 का ही अनुमान लगाया था.

बुसे के मॉडल के अनुसार 2012 के ओलंपिक में अमरीका को 51 पदक मिलना चाहिए जबकि चीन, जापान और जर्मनी को उसके पीछे रहना चाहिए.

इसके अनुसार 32 मेडल के साथ ब्रिटेन को 8वें स्थान पर रहना चाहिए जबकि 62 देशों को कम से कम एक गोल्ड मेडल मिलना चाहिए.

उनके आकलन के अनुसार 143 देशों के हाथ एक भी पदक नहीं लगना चाहिए.

हालांकि जॉनसन ने अमरीका को 99 पदक दिए हैं लेकिन भारत उनकी सूची के पहले दस देशों की सूची में नहीं है.

अनुमानित रैंकिंग
रैंक 2008 के मेडल रैंक बुसे का अनुमान रैंक जॉनसन का अनुमान
1 अमरीका 110 1 अमरीका 51 1 अमरीका 99
2 चीन 100 2 चीन 45 2 रूस 82
3 रूस 73 3 जापान 3 चीन67
4 ब्रिटेन 47 4 जर्मनी 36 4 जर्मनी 60
5 आस्ट्रेलिया 46 5 भारत 34 5 ब्रिटेन 45
6= फ्रांस 41 6= फ्रांस 33 6 आस्ट्रेलिया 38
6= जर्मनी 41 6= ब्राजील 33 7 फ्रांस 37
8 कोरिया 31 8 ब्रिटेन 32 8= इटली 31
9 इटली 27 9 इटली 31 8= जापान
10 यूक्रेन 27 10 रूस 30 10 कोरिया

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