एक सूबेदार जिसने जीता ओलंपिक पदक

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अमीरों का खेल माने जाने वाले निशानेबाज़ी में भारतीय सेना के एक सूबेदार ने अपन लोहा मनवाते हुए लंदन ओलंपिक में रजत पदक जीता है.

भारत के लिए लंदन ओलंपिक में रजत पदक हासिल करने वाले विजय कुमार भारतीय सेना में सूबेदार के पद पर काम कर रहे हैं. उनके पिता बांकूराम भी सेना से ही सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हुए थे.

विजय कुमार फिलहाल 26 साल के हैं और जब वो सेना में भर्ती हुए तब उनकी उम्र थी सिर्फ सोलह साल. निशानेबाज़ी उन्होंने सेना में आने के बाद ही शुरु की.

विजय कुमार हिमाचल प्रदेश के हरसौर गांव से आते हैं और 2003 से निशानेबाज़ी कर रहे हैं.

राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान मुझे कई बार विजय कुमार से मिलने का मौका मिला. लंदन के लिए क्वालिफाई करने के बाद मैंने उनका एक इंटरव्यू भी किया था.

शांत और मिलनसार

विजय कुमार की खास बात ये है कि वो ज़मीन से जुडे हुए हैं. उनसे मिलकर एहसास होता है कि वो उतने ही शांत, सहज और एकाग्र हैं जितना एक निशानेबाज़ को होना चाहिए और उतने ही मिलनसार और दोस्ताना जितना एक इंसान को होना चाहिए.

विजय कुमार कहते हैं कि वो निशानेबाज़ी में हैं इसके पिछे सिर्फ और सिर्फ सेना ही प्रमुख वजह है. वो अपने पिता को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानते हैं.

विजय कुमार ने सेना मे रहते हुए दो साल बॉक्सिंग भी की है और कहते हैं कि अगर वो निशानेबाज़ ना होते तो ज़रुर एक मुक्केबाज़ होते.

ऐसा नहीं हैं कि लंदन ओलंपिक में पदक जीतकर उन्होंने कोई चमत्कार कर दिखाया है, वो लगातार इसके लिए मेहनत करते रहे हैं. विजय कुमार और बाकि निशानेबाज़ों में फर्क ये है कि वो मीडिया की सुर्खियों में नहीं छाए.

मेहनत पर विश्वास

दिल्ली में हुए राष्ट्रमंण्डल खेलों में भी विजय कुमार ने चार पदक जीते थे जिनमें तीन स्वर्ण और एक कांस्य पदक शामिल था.

2011 में शूंटिंग विश्व कप में रजत पदक जीत उन्होंने लंदन का टिकट हासिल किया. इससे पहले 2009 में भी वो इसी स्पर्धा का रजत जीत चुके हैं. इतना ही नहीं ग्वांग्जू एशियाई खेलों में उन्होंने दो कांस्य पदक जीते थे.

विजय कुमार एक आम मेहनतकश भारतीय की तरह किस्मत में नहीं बल्कि मेहनत में विश्वास करते हैं और लंदन में जीता गया कांस्य पदक उनकी मेहनत का ही नतीजा है.

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