ओलंपिक:भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन,पर राह लंबी

दुनिया जहां ऊपर चढ़ने के लिए एस्केलेटर यानी स्वचालित सीढ़ियों का सहारा ले रही है, वहीं भारतीय खिलाड़ी अभी भी सीढ़ियों का ही इस्तेमाल कर रहे हैं.

साल 1996 से लेकर 2004 तक के ओलंपिक की बात करें तो एक समय में हमारे पास सिर्फ एक पदक था, उसके बाद ये बढ़कर तीन हुआ और अब ये दोगुना होकर छह तक पहुंचा है.

एक स्वर्ण पदक और दो रजत पदक से बढ़कर इस बार दो रजत और चार कांस्य पदक इस बार भारत की झोली में आए हैं और कई पदक जरा सी चूक की वजह से आने से रह गए.

सुशील कुमार ने साबित कर दिया कि वो भारत के अब तक के सर्वश्रेष्ठ ओलंपियन हैं. उनका रजत पदक, स्वर्ण के बिल्कुल करीब, लेकिन सेमीफाइनल और फाइनल के बीच पेट की समस्या ने उन्हें इस मौके से वंचित कर दिया. इस वजह से सुशील लंदन में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक लाने में नाकाम रहे.

इसके अलावा वो अपने जापानी प्रतिद्वंद्वी तातसुहिरो योनेमित्सु से कम से कम तीन इंच छोटे थे जिन्होंने 2010 में सुशील की अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए चीन में एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक जीता था. इस बार उन्होंने सुशील को हराकर स्वर्ण पदक जीता.

यदि लंदन ओलंपिक में भाग लेने वाले भारतीय स्टार खिलाड़ियों की बात करें तो सिर्फ एमसी मैरीकॉम ही अपने करियर का उत्कृष्ट समापन करते हुए दिखीं, लेकिन बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल, बॉक्सर देवेंद्रो और दुर्भाग्यशाली रहे विकास कृष्णन दोनों अभी भी किशोर हैं और उनका भविष्य बेहद उज्ज्वल है.

हालांकि विजेंदर के पास भी अभी ज्यादा भार वर्ग में एक और मौका है.

सुशील कुमार अभी सिर्फ 29 साल के हैं और ये उनका तीसरा ओलंपिक था. कांस्य पदक जीतने वाले योगेश्वर दत्त भी 29 साल के ही हैं, जबकि महज क्वार्टर फाइनल तक पहुंचने वाले अमित कुमार महज 19 साल के ही हैं. वे बहुत ही दुर्भाग्यशाली रहे जब कुश्ती के टाई ब्रेक में उन्हें मैच गँवाना पड़ा.

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Image caption लंदन में ओलंपिक खेलों का शानदार समापन हुआ

निशानेबाजों की मौजूदा खेप भी लंबे समय तक खेल जारी रख सकती है. इसलिए आने वाले दिनों में गगन नारंग, विजय कुमार, मानवजीत संधू, रोंजन सोढ़ी के पास अभी समय है. जॉयदीप कर्माकर चौथे स्थान पर रहे जबकि 21 वर्षीया हिना सिद्धू के पास 10 मी. एअर पिस्टल में बढ़िया भविष्य है.

नाकाफी

लेकिन यदि 1.2 अरब की जनसंख्या को ध्यान में रखा जाए तो छह पदकों को नगण्य ही कहा जाएगा.

इसका मतलब तो यही हुआ कि भारत में हर बीस करोड़ की आबादी पर सिर्फ एक पदक हासिल हुआ.

अभी भी यह कहने से कोई गुरेज नहीं है कि भारत एक खिलाड़ी देश नहीं है. भारत एक ऐसा देश है जिसे अभी ओलंपिक पदकों से कहीं ज्यादा शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना की जरूरत है.

खिलाड़ी तभी बेहतर कर पाएंगे जब हम उन पर और अधिक पैसा खर्च कर सकेंगे. तभी वो दुनिया भर में भारतीयों का प्रतिनिधित्व कर सकेंगे.

लेकिन यदि इसे दूसरे तरीके से देखों तो यही पैसा कहीं और भी इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे लोगों को खाना, शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य मिल सकता है.

यदि स्वस्थ और शिक्षित बच्चे होंगे तो बाद में वो ही पदक हासिल करने की स्थिति में आ सकते हैं.

संस्कृति

दरअसल, खेल अभी भी हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है और अभी भी इसे लेकर ऊहापोह की स्थिति बनी रहती है. नेल्सन मंडेला के उस वक्तव्य की वास्तविकता से हम अभी भी दूर हैं जब उन्होंने एक बार कहा था कि खेलों में बदलाव की शक्ति होती है.

मंडेला ने आगे कहा था, “खेल में प्रेरणा देने की शक्ति होती है, इसमें लोगों को जोड़ने की शक्ति होती है, न सिर्फ लोगों को बल्कि देशों को भी.”

ग्रेट ब्रिटेन जैसे-जैसे एक के बाद एक पदक बटोरता गया और आश्चर्यजनक रूप से अमरीका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर आ गया, आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे इस देश ने एकता का जो अनुभव किया, वो इससे पहले कभी नहीं किया था.

खेलों की जैसे ही शुरुआत हुई, अर्थशास्त्रियों ने घोषणा कर दी कि ग्रेट ब्रिटेन वास्तव में खतरनाक दोहरी मंदी की चपेट में था.

फिर भी, सात साल से जब से लंदन में खेलों के होने की घोषणा हुई थी, पूर्वी लंदन के निवासियों को वो बदलाव देखने को मिला जो कि पिछले पचास साल में कभी नहीं मिला था.

खेल, हर उस सिक्के की तरह है जिसके दो पहलू होते हैं.

राष्ट्रमंडल खेल

दो साल पहले, तमाम स्कैंडल्स के चलते नई दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों को पटरी से उतारने की कोशिश की गई थी, बावजूद इसके एथलीट्स ने इसे अब तक का भारतीय खेलों का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन बना दिया.

न सिर्फ एक बेहतर शुभारंभ हुआ बल्कि 38 स्वर्ण पदक समेत कुल 101 पदकों के साथ भारतीय खिलाड़ियों ने जोरदार प्रदर्शन भी किया.

स्वर्ण पदकों की संख्या में भारत ने ग्रेट ब्रिटेन को भी पछाड़ दिया और ऑस्ट्रेलिया के बाद दूसरे स्थान पर रहा, जबकि कुल पदकों के लिहाज से उसे ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के बाद तीसरा स्थान हासिल हुआ.

निशानेबाजी, कुश्ती और बॉक्सिंग के क्षेत्र में न सिर्फ बेहतर प्रगति हुई है बल्कि पिछले तीन खेलों से इन क्षेत्रों में भारत को पदक भी मिले हैं.

टॉप-100

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Image caption योगेश्वर दत्त ने लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीता

बैडमिंटन में भी भारत के कम से कम दस खिलाड़ी ऐसे हैं जो कि सौ सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में गिने जाते हैं और दुनिया में छा जाने की उनमें क्षमता है.

केवल मलेशिया ही वो देश है जिसके दस खिलाड़ी टॉप सौ में शामिल हैं, जबकि डेनमार्क के नौ, इंडोनेशिया के सात और चीन के सिर्फ पांच खिलाड़ी ही टॉप सौ में शामिल हैं. चीन के ये सभी पांचों खिलाड़ी सर्वश्रेष्ठ बीस खिलाड़ियों में शामिल हैं.

लेकिन चीन हर दो-तीन साल में अपनी ताकत का मूल्यांकन करता रहता है.

भविष्य के लिए भारत को पदक जीतने पर ध्यान देने के लिए बेहतर करना होगा. इस मामले में ये कहना गलत नहीं होगा कि बॉक्सिंग की दस श्रेणियों में से भारत के सात खिलाड़ियों ने क्वालीफाई किया था. जबकि कुश्ती की सात श्रेणियों में से चार खिलाड़ियों ने क्वालीफाई किया था.

इसी तरह, निशानेबाजी की 15 प्रतिस्पर्धाओं में से भारतीय खिलाड़ियों ने 10 में क्वालीफाई किया था.

पदक जीतने की उम्मीद इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि इन दिनों ओलंपिक में भाग लेना प्रतियोगिता के जरिए ही तय होता है.

भारतीय खेल को राष्ट्रमंडल खेलों और लंदन में प्रदर्शन के आधार पर विकसित करने की जरूरत है.

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