धोनी की सफलता के पांच फॉर्मूले

  • 6 मार्च 2013

भारतीय क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी भारत के सफलतम टेस्ट कप्तान हो गए हैं.

हैदराबाद में ऑस्ट्रेलिया को हराकर उन्होंने सौरव गांगुली के 21 जीत के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है.

इसके साथ ही धोनी ने सिरीज़ में 2-0 की बढ़त ले ली है और चार टेस्ट मैच की ये सिरीज़ भारत कम से कम अब गंवा नहीं सकता है.

तो आखिर क्या हैं कैप्टन कूल के नाम से मशहूर धोनी की सफलता के पांच फॉर्मूले?

आक्रामक कप्तानी

कप्तान के तौर पर धोनी आक्रामक फैसले लेने से नहीं चूकते.

जब स्पिनर गेंद डाल रहे होते हैं तो स्लिप के अलावा सिली प्वाइंट और सिली मिडऑफ पर अकसर फील्डर तैनात रहते हैं.बल्लेबाज़ी के दौरान भी वो खुद तेज़ी से रन जोड़ते हैं और आक्रामक बल्लेबाज़ी पर जोर देते हैं.

हालांकि पिछले कुछ दौरों पर हारने के बाद धोनी की कप्तानी पर सवाल उठने लगे थे लेकिन ऑस्ट्रेलिया को हैदराबाद टेस्ट हराने के बाद सुनील गावस्कर ने भी कहा कि धोनी की कप्तानी में पैनापन वापस आ गया है.

खुद अपना प्रदर्शन बढ़िया

बड़े मैचों में धोनी का बल्ला खूब बोलता है.

चाहे वो एकदिवसीय क्रिकेट का वर्ल्ड कप फाइनल हो या फिर हाल ही में चेन्नई टेस्ट में उनका दोहरा शतक, धोनी ने न सिर्फ बड़ी पारियां खेली हैं बल्कि रन भी खूब तेज़ी से बनाए हैं.

बतौर कप्तान धोनी ने 22 टेस्ट मैच जीते हैं जिनमें बल्लेबाज़ी में उनका औसत 65 रन है.

इस प्रदर्शन की तुलना करे तो पाएंगे कि सौरभ गांगुली ने 21 मैच बतौर कप्तान जीते जिनमें उनका औसत 50 था जबकि अजहर ने 14 टेस्ट जीचे थे जिनमें उनका औसत 63 था.

युवाओं को बढ़ावा

Image caption धोनी युवा खिलाड़ियो को भरपूर मौका देते हैं. (तस्वीर बीसीसीआई)

धोनी जानते हैं कि भारतीय क्रिकेट का भविष्य युवाओं में है और ये उनकी रणनीति में भी दिखता है.

चाहे वो प्रवीण कुमार हो या सुरेश रैना, रवींद्र जडेजा हो या रवि अश्विन, धोनी ने युवा खिलाड़ियों पर पूरा भरोसा जताया है और उन्हें मौका भी खूब दिया है. युवा खिलाड़ी भी धोनी के भरोसे का जवाब अपनी तरफ से पुरज़ोर कोशिश करते हैं.

हाल ही में भारतीय टीम से द्रविड़ औऱ लक्ष्मण जैसे खिलाड़ी रिटायर हुए हैं जिसके बाद भारतीय टीम का प्रदर्शन बहुत हद तक युवा खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर निर्भर करता है.

धोनी ने सुनिश्चित कराया है कि युवा खिलाड़ी अपना पूरा दम दिखाए.

न ज़्यादा खुशी न ज़्यादा ग़म

धोनी को कैप्टन कूल कहा जाता है क्योंकि विपरीत परिस्थितियों में भी उनके चेहरे पर भाव पढ़े नहीं जा सकते हैं.

जब भारत ने उनकी कप्तानी में विश्व कप जीता था तब भी उनके चेहरे पर खुशी की अतिरेक नहीं देखी जा सकती थी.

वहीं जब उनकी टीम ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड में हार रही थी तब भी धोनी बहुत विचलित नहीं लग रहे थे.

क्रिकेट आलोचक मानते हैं कि उनकी यही विशेषता टीम को बुरे समय में भी संघर्ष करते रहने की प्रेरणा देती है.

कड़े फैसले लेना

Image caption सहवाग की वनडे टीम से छुट्टी हो गई है

टीम के हित में धोनी कड़े फैसले लेने से नहीं घबराते हैं.

टीम के चयन में वो प्रदर्शन पर नज़र रखते हैं और ये लिहाज़ नहीं रखते कि जिस खिलाड़ी को टीम से हटाया जा रहा है वो कितना बड़ा खिलाड़ी है.

जैसे सहवाग को वनडे टीम से हटाना, या फिर गंभीर को टेस्ट टीम में जगह न देना ये ऐसे चयन के फैसले हैं जिन्हें लेने के लिए कप्तान को सख्त होना ज़रूरी है.

वहीं अश्विन औऱ जडेजा जैसे खिलाड़ियों को लगातार चुनने में भी वो चयन बैठकों में आवाज़ उठाते रहे हैं.

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