ना सहवाग बाहर होते ना शिखर को मिलता मौका

मोहाली के मैदान पर भारत और ऑस्ट्रलिया के बीच हो रहे तीसरे टेस्ट मैच के पहले दिन बरसात हुई और खेल नहीं हो पाया.

हालांकि जब इसी टेस्ट में भारत की बल्लेबाज़ी आई तब फिर बरसात हुई लेकिन ये बरसात चौकों की बरसात थी और बरसात करवाने वाले थे शिखर धवन.

शिखर धवन ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ अपने पहले ही टेस्ट मैच में 187 रन की पारी खेली और भारतीय खेलप्रेमियों को रोमांचित कर दिया.

धमाकेदार पारी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 187 रनों की इस पारी में 33 चौके और 2 छक्के शामिल थे.

शिखर धवन भारत के ही नहीं विश्व भर के पहले खिलाड़ी बन गए जिन्होंने अपने पहले ही टेस्ट मुकाबले में सबसे तेज़ शतक ठोक डाला.

लेकिन इतने प्रभावी खिलाड़ी को टीम में पहले जगह क्यों नहीं मिली?

अंडर 19 के हीरो

शिखर धवन के बल्ले की आग सबने देखी लेकिन बल्ले के सहारे मानो शिखर ने बताया हो कि इस दिन के लिए उन्होंने कितना इंतज़ार किया है.

शिखर ने 2004 में बांग्लादेश में हुए अंडर 19 विश्व कप में भारत की ओर से हिस्सा लिया. इसी अंडर 19 विश्व कप में उन्होंने 84.16 की औसत से सबसे ज्यादा 505 रन बनाए और वो प्लेयर ऑफ दी टूर्नामेंट रहे.

शिखर का दमदार प्रदर्शन भारत को उंडर 19 विश्व कप नहीं जिता पाया और इसका खामियाज़ा मानो शिखर को भुगतना पड़ा. शिखरे के शानदार खेल की चर्चा तो हुई लेकिन इतनी नहीं कि वो स्टार बन सके और चयनकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींच सके.

शिखर धवन घरेलू स्तर पर शानदार खेलते रहे और दिल्ली की टीम के दमदार चौकड़ी ( विरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, विराट कोहली और शिखर धवन) का हिस्सा रहे. लेकिन जब शिखर घरेलू मैदान पर अच्छा खेल रहे थे तब सहवाग भारत की टेस्ट टीम में शानदार खेल दिखा रहे थे.

ये वो ही 2004 था जब सहवाग ने पाकिस्तान के खिलाफ़ मुलतान में 309 रन बनाकर ‘मुलतान के सुलतान’ का खिताब अपने नाम किया था.

इसी साल रणजी में शिकर ने कदम रखा और दिल्ली की ओर से खेलते हुए अपने पहले सीज़न में 406 रन बनाए.

सहवाग का चरम

वो सहवाग का चरम प्रदर्शन था और ऐसे में शिखर जैसे खिलाड़ी के लिए ये सोचना की वो उनके स्थान पर ओपनिंग करे असंभव था.

सहवाग का प्रदर्शन उपर नीचे होता रहा, इस बीच कई और खिलाड़ी भी टीम में अंदर बाहर होते रहे, लेकिन शिखर पर चयनकर्ताओं का ध्यान नहीं गया.

शिखर घरेलू स्तर पर खेलते गए और अपने प्रयासों को जारी रखा.

शिखर के इंतज़ार का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि टेस्ट मैच में पहला मौका मिलने से पहले शिखर ने फर्स्ट क्लास के 81 मुकाबले खेले जिनमें 5679 रन बनाए,16 शतक और 24 अर्धशतक लगाए. इस दौरान उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर रहा 225 रन.

2007-2008 में दिल्ली को रणजी ट्रॉफी जिताने में शिखर ने अहम भूमिका निभाई और 8 पारियों में 570 रन बना डाले.

लगातार प्रदर्शन के बाद भी शिखर का इंतज़ार जारी रहा लेकिन जहां बाकी कई खिलाड़ी इस हताशा में खेल छोड़ देते हैं, शिखर ने उम्मीद नहीं छोड़ी.

खेल में निश्चय का पक्का होने के अलावा उम्मीद का पक्का होना भी बहुत मायने रखता है. शिखर ने दिखाया है कि वो निश्चय और उम्मीद दोनों में पक्के हैं.

संबंधित समाचार