जब भारत पहली बार क्रिकेट विश्व चैम्पियन बना

कपिल देव 1983 क्रिकेट विश्वकप

25 जून 1983. उस दिन शनिवार था. लॉर्ड्स के मैदान पर बादल छाए हुए थे. जैसे ही क्लाइव लॉयड और कपिल देव मैदान पर टॉस करने आए सूरज ने बादलों को पीछे ढकेला और दर्शकों ने ख़ुशी से तालियाँ बजाईं.

कपिल टॉस हारे और लॉयड ने भारत से पहले बैटिंग करने के लिए कहा. एंडी रॉबर्ट्स ने बिग बर्ड जॉएल गार्नर के साथ गेंदबाज़ी की शुरुआत की. राबर्ट्स ने भारत को पहला झटका दिया जब दो के स्कोर पर दूजों ने सुनील गावसकर को कैच कर लिया.

दसवें विश्व कप की सुनहरी यादें

उनकी जगह आए मोहिंदर अमरनाथ ने एक छोर संभाल लिया. दूसरे छोर पर श्रीकांत तूफ़ानी मूड में थे. पहले उन्होंने गार्नर को 4 रनों के लिए स्लैश किया, फिर उन्होंने रॉबर्ट्स की गेंद को मिड विकेट पर बाउंड्री के बाहर किया और छोड़ी देर बाद उन्हें 6 रन के लिए हुक कर दिया.

श्रीकांत बैटिंग करते हुए काफी रिस्क ले रहे थे और उधर लॉर्ड्स की मशहूर बालकनी पर बैठे हुए भारतीय खिलाड़ियों की दिल की धड़कनें बढ़ रही थीं.

स्वाभाविक खेल

Image caption भारतीय क्रिकेट के लिए 1983 का विश्वकप एक ऐतिहासिक क्षण था.

लॉयड ने मार्शल को लगाया और आते ही उन्होंने श्रीकांत को चलता किया लेकिन श्रीकांत के बनाए गए 38 रन उस भारतीय पारी का सर्वाधिक स्कोर था. कुछ दिनों पहले जब मुझे उनसे बात करने का मौका मिला तो मैने उनसे पूछा कि जब आप क्रीज़ पर गए थे तो क्या सोच कर गए थे?

श्रीकांत ने जवाब दिया, "मेरी सोच यही थी कि वहाँ जा कर अपना स्वाभाविक खेल खेलो. अगर मार सकते हो तो मारो वर्ना वापस अंदर आओ."

मोहिंदर और यशपाल शर्मा ने बहुत धीमे धीमे 31 रन जोड़े लेकिन वेस्ट इंडीज़ के गेंदबाज़ एक कंप्यूटराइज़्ड रॉकेट की तरह बार-बार आक्रमण करते रहे. रॉबर्ट्स जाते तो मार्शल आ जाते.

विश्वकप से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

गार्नर जाते तो होल्डिंग गेंदबाज़ी संभाल लेते. यशपाल शर्मा और मोहिंदर दोनो जल्दी जल्दी आउट हुए. होल्डिंग ने मोहिंदर का ऑफ़ स्टंप उड़ा दिया. स्थिति उस समय और बिगड़ गई जब कपिल देव को उनके 15 के स्कोर पर गोम्स की गेंद पर होल्डिंग ने कैच कर लिया.

भारतीय खिलाड़ी यह तय करके आए थे कि वो गोम्स की गेंद पर अधिक से अधिक रन बनाएंगे लेकिन वो अपने उद्देश्य में कुछ हद तक ही सफल हो पाए. गोम्स ने ग्यारह ओवरों में 49 रन दिए लेकिन दो बहुमूल्य विकेट भी ले गए. भारत के 6 विकेट 111 रनों पर गिर गए थे.

आख़िरी चार विकेट

Image caption विश्वकप के साथ भारतीय क्रिकेट टीम.

लॉर्ड्स में मैच देख रहे भारतीय मूल के दर्शकों के बीच सन्नाटा छाया हुआ था. उधर भारत में क्रिकेट प्रेमी झल्ला कर अपने रेडियो और टेलीविजन सेट बंद कर रहे थे. लेकिन भारत के आख़िरी चार विकेटों ने करो या मरो की भावना को चरितार्थ करते हुए 72 रन जोड़े.

11 नंबर पर खेलने आए बलविंदर संधू ने बहुत बहादुरी का परिचय दिया. मार्शल ने उन्हें विचलित करने के लिए एक बाउंसर फेंका जो उनके हेलमेट से टकराया.

भारतीय टीम 183 रन बना कर आउट हुई और वेस्ट इंडीज़ की टीम इस तरह पवेलियन की तरफ भागी मानो विश्व कप उनकी झोली में हो.

मैंने उस मैच में भारत की ओर से विकेटकीपिंग कर रहे सैयद किरमानी से पूछा कि जब भारत की टीम 183 पर आउट हो गई तो उन्होंने क्या सोचा कि मैच किस तरफ जाएगा.

जब भारत ने जग जीता

किरमानी ने जवाब दिया, "हम तो यही समझे कि ये तो हमें ओपनिंग स्टैंड में ही खा जाएंगे और विवियन रिचर्ड्स की तो बारी ही नहीं आएगी. लेकिन हमने ये भी सोचा कि अपना हौसला हारेंगे नहीं और सबके सब पॉज़ीटिव माइंड के साथ खेलेंगे."

ऐतिहासिक कैच

Image caption कपिल देव ने फाइनल मैच का ऐतिहासिक कैच पकड़ा था.

वेस्ट इंडीज़ की ओर से हेंस और ग्रीनिज बैटिंग करने के लिए उतरे. चौथे ओवर में बलविंदर संधू की एक गेंद पर ग्रीनिज ने ये सोच कर अपना बल्ला ऊपर उठा दिया कि गेंद बाहर जा रही है. गेंद सहसा अंदर आई और ग्रीनिज का ऑफ़ स्टंप ले उड़ी.

बलविंदर संधू याद करते हैं, "गॉर्डन ग्रीनिज पहले भी दो बार मेरी इन स्विंग पर आउट हो चुके थे. मैंने तय किया कि मैं उन्हें इन स्विंग ही डालूँगा. पहले ओवर में मैंने जानबूझ कर इन स्विंग नहीं डाला. अगले ओवर में मेरा पहला इन स्विंग ही सही जगह पर गिरा. ग्रीनिज ने उसे छोड़ दिया और बोल्ड हो गए."

विव रिचर्ड्स क्रीज़ पर उतरे और ताबड़तोड़ चौके लगाते हुए आनन फानन में 33 पर पहुँच गए. रिचर्ड्स ने मदन लाल की शॉर्ट गेंद पर बल्ला घुमाया और गेंद बाउंड्री की तरफ़ उड़ने लगी.

विश्वकप क्रिकेट की दास्तां

शॉर्ट मिडविकेट पर खड़े कपिलदेव ने गेंद की उड़ान की दिशा में पीछे दौड़ना शुरू किया. बाउंड्री से 20 गज़ पहले कपिल को लगा कि गेंद उनके बांए कंधे की तरफ गिर रही है. वो थोड़ा धीमे हुए ओर उन्होंने गेंद को बिल्कुल अपनी उंगलियों के टिप पर कैच किया.

भारतीय क्रिकेट बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष राज सिंह डूंगरपुर उस समय लॉर्ड्स पर ये मैच देख रहे थे. उनकी मौत से कुछ दिनों पहले हुई एक मुलाकात में मैंने उनसे पूछा कि क्या आपको रिचर्ड्स का आउट होना याद है?

मोहिंदर का अंदाज

Image caption स्टेडियम में मौजूद भारतीय दर्शकों में गजब का उत्साह छा गया.

इस पर उन्होंने कहा, "‘बहुत अच्छी तरह से याद है. मदनलाल नर्सरी एंड से बॉलिंग कर रहे थे. उन्होंने विव को एक शॉर्ट बॉल फेंकी. गेंद थोड़ा धीमे आई. जब उन्होंने उसे हुक किया तो टॉप एज लग गया और कपिल देव ने काफी पीछे दौड़ते हुए एक अद्वितीय कैच लिया ग्रैंड स्टैंड के सामने से. शायद भारतीय क्रिकेट के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण कैच था."

अब भारतीय खिलाड़ियों के कदमों में तेज़ी आ गई थी. लॉयड ने बिन्नी को ड्राइव किया और शॉर्ट मिड ऑन पर खड़े कपिल देव के हाथों में करारा शॉट आ कर चिपक गया.

इसके बाद गोम्स और बैकस दबाव के चलते आउट हुए लेकिन इसके बाद दूजों और मार्शल जम गए और उन्होंने सातवें विकेट के लिए 43 रन जोड़े. कपिल ने मोहिंदर को लगाया और दूजों ने उनकी दूसरी गेंद को विकेट पर खेल दिया.

मोहिंदर इस सुस्त अंदाज़ में बॉलिंग किया करते थे मानो एक बुज़ुर्ग आदमी अपने जर्मन शेपहर्ड कुत्ते को शाम को चहलक़दमी कराने के लिए ले जा रहा हो.

उस टीम के सदस्य कीर्ति आज़ाद कहते हैं, "उस जीत में मोहिंदर का बहुत बड़ा हाथ था. उन्होंने बैट और बॉल दोनों से बहुत अच्छा प्रदर्शन किया. वो मोहम्मद अली की तरह कम बैक करने वाले व्यक्ति हैं. न जाने कितनी बार उन्होंने भारतीय टीम में कम बैक किए हैं. उनकी लाइन बहुत अच्छी रहती है. वो ज़्यादा कुछ एक्सट्रा करने की कोशिश नहीं करते. उनकी जो लिमिटेशन है उसके अंदर ही गेंदबाज़ी करते हैं."

तिरंगे ही तिरंगे

वेस्ट इंडीज़ की अंतिम जोड़ी गार्नर और होल्डिंग स्कोर को 140 तक ले गई लेकिन मोहिंदर ने तय किया कि अब बहुत हो चुका. होल्डिंग के आउट होते ही विश्व कप भारत का था. लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर चारों तरफ़ दर्शक ही दर्शक थे.

लॉर्ड्स की बालकनी पर कपिल ने शैम्पेन की बोतल खोली और नीचे नाच रहे दर्शकों को सराबोर कर दिया. ड्रेसिंग रूम के माहौल के बारे में मैंने स्वर्गीय राज सिंह डूंगरपुर से पूछा था.

उनका जवाब था, "ऐसा लग रहा था कि कोई शादी हो रही हो. लेकिन शादी में एक दूल्हा होता है लेकिन उस दिन भारतीय ड्रेसिंग रूम में 11 दूल्हे थे. मैं ये कभी नहीं भूल सकता कि भारतीय टीम को बधाई देने उसके ड्रेसिंग रूम में पूरी वेस्ट इंडीज़ की टीम आई सिवाए उनके चार फ़स्ट बॉलर्स के. उन्हें दुख इस बात का था कि उन्होंने तो अपना काम कर दिया दिया था लेकिन धुरंधर बल्लेबाज़ों के होने के बावजूद वेस्ट इंडीज़ की टीम 184 रन भी नहीं बना पाई."

भारतीय क्रिकेट के इतिहास का ये सबसे सुनहरा क्षण था. उस समय लॉर्ड्स के मैदान पर तिरंगे ही तिरंगे थे.

कीर्ति आज़ाद याद करते हैं, "आप मुझसे विश्व कप की बात कर रहे हैं और वह दृश्य बिल्कुल मेरे सामने आ गया है. मेरे शरीर में सिहरन दौड़ रही है और मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं. वो एक ऐसा अनुभव था जो मैं अपने जीवन में शायद कभी भी नहीं पा सकूँगा. कोई भी इंसान किसी भी खेल को खेले वो चाहता है कि वो इसके शिखर तक पहुँचे. वो दृश्य अभी भी मेरे सामने है कि हज़ारों प्रवासी भारतीय तिरंगे झंडे ले कर सामने खड़े हैं. ये एक ऐसा अनुभव है जिसे मैं शब्दों में बता नहीं सकता महसूस ज़रूर कर सकता हूँ."

( बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकतें हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार