उगते सूरज को तो सब सलाम करते हैं....

जूनियर महिला हॉकी टीम के सदस्य

"चढ़ते सूरज को सभी सलाम करते हैं, लेकिन जब टीम खराब प्रदर्शन करती है तो कोई दिलासा नहीं देता. अब जब मेडल आया है तो राज्य सरकारों को पुरस्कार की घोषणा करनी चाहिए. इसके साथ-साथ निचले स्तर पर खेल रहे खिलाड़ियों की मदद करनी चाहिए. वह आर्थिक रूप से बेहद कमज़ोर होते हैं. न जाने कैसे-कैसे हालात से निकलकर आते हैं. गांव के लोगों के लिए यहां तक का सफ़र आसान नही है."

ये कहना है पिछले दिनों जर्मनी में हुए जूनियर विश्वकप हॉकी टूर्नामेंट में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय महिला हॉकी टीम की तेज़-तर्रार फॉरवर्ड रानी रामपाल का, जिन्हे प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट भी घोषित किया गया.

महिला हॉकी टीम का सम्मान

रानी रामपाल और भारतीय हॉकी टीम की सभी सदस्यों को बुधवार को दिल्ली में एक पांच सितारा होटल में हॉकी इंडिया की तरफ़ से सम्मानित किया गया और उन्हें एक-एक लाख रुपए भी दिए गए.

इस मौके पर टीम की कप्तान सुशीला चानू भी बेहद ख़ुश नज़र आ रही थीं. वैसे तो भारत ने आठ बार ओलंपिक में हॉकी का स्वर्ण पदक जीता है, लेकिन विश्व कप हॉकी टूर्नामेंट में इससे पहले केवल एक बार 1975 में कप्तान अजीतपाल सिंह की कप्तानी में स्वर्ण पदक जीता था.

पुरुष वर्ग में भारत विश्वकप में इसके अलावा और भी कई पदक जीतने में कामयाब रहा है, लेकिन महिला वर्ग में चाहे वह जूनियर हो या सीनियर, यह उसका पहला पदक है.

'हमें लगा हम जीत सकते हैं'

सुशीला चानू ने बताया, "न्यूज़ीलैंड की टीम को हराने के बाद हमें लगा कि हम भी पदक जीत सकते हैं. इंग्लैंड के ख़िलाफ कांस्य पदक के लिए खेले गए मैच में जीतना आसान नहीं था क्योंकि पेनल्टी शूटआउट में कुछ भी हो सकता था."

रानी रामपाल हरियाणा के एक छोटे से शहर शाहबाद से आती हैं जहां हॉकी को लेकर बेहद जुनून है क्योंकि वहां द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित हॉकी कोच बलदेव सिंह हॉकी अकादमी चलाते हैं.

मगर मणिपुर से आने वाली सुशीला चानू बताती हैं कि वहां हॉकी को लेकर कोई सुविधा नहीं है. उनके कोच ख़ुद सारा खर्च उठाते हैं. अगर मणिपुर में हॉकी की सुविधाएं हों तो वहां भी हॉकी का स्तर ऊंचा उठ सकता है.

अब हर कोई इस भारतीय हॉकी के खिलाड़ियों से मिलना चाहता है.

'परिवार से दूरी खलती है'

Image caption मणिपुर से आने वाली सुशीला चानू बताती हैं कि वहां हॉकी की कोई सुविधा नहीं है. उनके कोच ख़ुद सारा खर्च उठाते हैं.

वहीं टीम के सदस्य अपने घर वालों से कितना मिल पाते हैं, इस बारे में सुशीला चानू ने बताया, ''बहुत कम मिल पाते हैं. पहले ग्वालियर में ट्रेनिंग के दौरान चार साल में हर साल सिर्फ़ कुछ दिन घर जाना होता था दस-पंद्रह दिनों के लिए. घर को बहुत मिस करते हैं. जब वापस आते हैं तो मम्मी-पापा, भाई-बहन सब रोते हैं.''

अब जूनियर टीम ने ही सही आखिरकार भारत को विश्वकप हॉकी टूर्नामेंट में कांस्य पदक दिला दिया है.

अब देखनेवाली बात ये होगी कि इस क़ामयाबी से प्रेरणा लेकर अब भारत की सीनियर महिला और पुरुष हॉकी टीम क्या करती है, जिनके सामने पहली चुनौती तो फिलहाल विश्वकप के लिए क्वालीफ़ाई करना है.

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